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गंगा के पानी को जीवाणुओं से स्वच्छ करेगी सरकार !

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नई दिल्ली। स्वच्छ गंगा मिशन के नतीजों को सामने रखने को लेकर बढ़े दबाव के बीच भारत सरकार एक नई तकनीक पर काम करना चाहती है। दरअसल, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (एसटीपी) लगाने में काफी समय लग रहा है।

 

ऐसे में सरकार बैक्टीरियल बायॉरेमेडिएशन टेक्नीक के जरिए गंगा के पानी को स्वच्छ बनाना चाहती है। गौरतलब है कि एसटीपी के काम करने में 2 से 3 साल लग सकते हैं।इस बीच गंदगी खाने वाले जीवाणुओं (सीवेज-इटिंग माइक्रोब्स) के इस्तेमाल से बड़े पैमाने पर जैविक उपचार (बायॉरेमेडिएशन) कर कुछ हद तक गंगा नदी के पानी की गुणवत्ता को सुधारा जा सकता है।

 

इस बायॉरेमेडिएशन टेक्नीक के तहत ऐक्टिवेटेड माइक्रोब्स नदी के पानी में मौजूद प्रदूषकों जैसे तेल और ऑर्गैनिक मैटर को खा लेते हैं। सीवेज के ट्रीटमेंट में ये बैक्टीरिया महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। खास बात यह है कि ये बैक्टीरिया किसी प्रकार की गंध नहीं छोड़ते हैं। इस प्रक्रिया में नाले से आ रही बदबू भी घटती है।

 

ट्रीटमेंट की प्रक्रिया के दौरान भारी धातु और जहरीले रसायन जैसे प्रदूषक कम हो जाते हैं। इस टेक्नीक के तहत माइक्रोब्स की डोज सीवेज में मौजूद ऑर्गैनिक प्रदूषकों की मौजूदगी के आधार पर निर्धारित की जाती है। पटना के बाकरगंज नाले में इस टेक्नीक का सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया है। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) की ओर से हाल ही में दो और पायलट प्रॉजेक्ट्स को मंजूरी दी गई है। एक पटना में दूसरा इलाहाबाद में होगा।

 

इतना ही नहीं एनएमसीजी ने चार राज्यों- उत्तर प्रदेश (30), पश्चिम बंगाल (20), बिहार (3) और झारखंड (1) में 54 नालों की पहचान की है, जिस पर आगे काम शुरू किया जाएगा। इन 54 स्थानों पर बायॉरेमेडिएशन टेक्नीक के जरिए सीधे गंगा नदी में मिल रहे गंदे पानी को रोका जा सकता है।

 

एसटीपी में लगने वाले लंबे समय के संदर्भ में एनएमसीजी ने एक नोट में कहा, बीच की इस अवधि में गंदे नाले का पानी सीधे गंगा और सहायक नदियों में मिल रहा है। ऐसे में प्रदूषक तत्वों को रोकने की जरूरत है। दुनिया में कई नई तकनीक मौजूद हैं। वास्तविक स्थान पर होने वाला यह ट्रीटमेंट काफी सरल होता है और इसे आसानी से संचालित किया जा सकता है। इसके लिए ड्रेन में किसी बड़े बदलाव की भी जरूरत नहीं होती है।

 

एनएमसीजी ने कहा है कि बायॉरेमेडिएशन टेक्नीक काफी कम खर्चीली है और इसके शुरू होने में महज 6 से 8 महीने का ही समय लगता है। एनएमसीजी द्वारा निर्धारित किए गए प्रॉजेक्ट्स की लागत 7 लाख से 17 करोड़ रुपये आ सकती है। जल संसाधन मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया, इन लो-कॉस्ट प्रॉजेक्ट्स को प्राइवेट/पब्लिक कंपनियों की कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी से जुड़ी गतिविधियों के जरिए शुरू किया जाएगा। इससे संबंधित कई प्रस्ताव एनएमसीजी को मिले हैं और इस पर आगे काम चल रहा है।