udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news 16 साल का उत्तराखण्ड: सियासत और गैरसैंण !

16 साल का उत्तराखण्ड, सियासत और गैरसैंण !

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गौण हा चुका गैरसैंण पहाड़ के विकास का प्रेरणा स्थल- कुंजवाल

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अवधेश नौटियाल

बेदाग छवि, स्पष्टवादिता, जनहित के मुद्दों पर अपनी ही सरकार से सवाल करने की उनकी शैली की राज्य की जनता मुरीद है। उत्तराखण्ड विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल की पहचान आज एक गांधीवादी नेता के तौर पर सम्पूर्ण उत्तराखण्ड में है। संविधानिक पद पर होते हुए भी उन्होंने जनहित के मुद्दो पर सरकार से टकराव लेने से भी कभी परहेज नहीं किया।
यहां बात हो रही है गोविंद सिंह कुंजवाल कीI उनकी सोच और उनके स्पष्ट विजन के कारण ही राजनीतिक दलों के लिए गौण हा चुका गैरसैंण राजधानी बनने की ओर अग्रसर है। गैरसैंण में विधानसभा का भवन, सचिवालय, विधायक आवास सहित अन्य भवन बनकर तैयार हैं। कैबिनेट बैठक के साथ ही विधानसभा सत्र तक गैरसैंण में हो चुका है। राज्य से जुड़े कुछ सुलगते सवालों को लेकर हमने बात की विधानसभा अध्यक्ष गोंविद सिंह कुंजवाल से वरिष्ठ पत्रकार अवधेश नौटियाल ने की विस्तार से बातचीत
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बातचीत के अंक विस्तार से
16 सालों में प्रदेश में ढाचागत विकास बहुत हुआ है। इसको कोई व्यक्ति नाकार नहीं सकता है। चाहे सड़को का विकास हो, स्वास्थ्य सेवाओं का हो, तकनीकी शिक्षा का हो, छोटी प्रशासिनिक ईकाईयों का हो। मेडिकल कॉलेजों का हो, पॉलिटेक्निक हों, बिजली, पानी की व्यवस्था हो मुझे लगता है इस पीरियड में यह सबसे अधिक हुआ है। उसका लाभ आम जनता को मिल रहा है। इसके साथ ही जो बेरोजगार युवा हैं उनको रोजगार देने का काम सरकार ने किया है। नौकरी के अधिक से अधिक पद सरकार ने खोले हैं। इसके साथ ही जो बैकलॉग के पद थे सरकार ने उनको भी भरने का काम किया है। दूसरी तरफ हम यह कह सकते हैं कि जिस मंशा से हमने इस प्रदेश को मांगा था उन बिदुंओं का निराकरण आजतक नहीं हो पाया है। मुख्य रूप से हमारा जो पर्वतीय क्षेत्र है उस पर्वतीय क्षेत्र में आज जो पलायन लगातार हो रहा है। वह सबसे अधिक चिंता का विषय है। इस प्रदेश के लिए भी हमारे लिए भी। उसको रोकने के लिए किसी भी सरकार ने ठोस पहल नहीं की है। पांरपरिक फसल, कोदा झंगोरा, मंडुवे को लेकर कांग्रेस सरकार बात कर रही है। उससे थोड़ा बहुत फरक पड़ने की संभावना हो रही है उससे हमारे गांव थोड़ा खाली हो गए हैं। तो मेरा यह कहना है कि अब सरकार को एक तो यह कोशिश करनी चाहिए कि वहां जो शिक्षा व चिकित्सा के संस्थान खुले हुए हैं उनकी व्यवस्था ठीक हो। उसका लाभ आम जनता को मिल सके। रोजगार के अवसर पहाड़ों में हमें ज्यादा पैदा करने होंगे। चाहे एग्रीकल्चर, हॉल्टीकल्चर, के द्वारा रोजगार के पद आगे बढाने होंगे। ताकि लोगों को रोजगार के लिए बहार का रूख न करना पड़े। इसके साथ जो मेरा तीसरा मूल बिन्दु है हमारे आंदोलनकारियों की भावना थी कि जब हमें अलग राज्य मिलेगा तो उसकी राजधानी गैरसैंण हों। उसका चयन भी हो चुका होता। तत्कालीन सरकार ने कौशिक कमेठी बनाकर पूरे पहाड़ की सर्वे भी कर ली गई थी। लेकिन राज्य देने वालों ने राजधानी के मुद्दे को उलझाकर रखा आज तक भी उसका निराकरण नहीं हो पाया। तो उसकी वजह से ज्यादा पलायन हुआ है। अगर राजधानी पहाड़ पर जायेगी तो निश्चित तौर पर जो लोग मैदानों पर आ गए हैं वह वापिस पहाड़ों का रूख करेंगे।
देखिए दो चींजे हुई। किसी सरकार को हम दोष दें में उसको उचित नहीं समझता। जो विकास इस प्रदेश में हुआ लोगों की पर कैपिटल इनकम भी बढी। वह आर्थिक रूप भी मजबूत हुई। मैदान की अपेक्षा पहाड़ में कठिनाईयां अधिक हैं इसी लिए लोग पलायन कर मैदानों की तरफ आ गए। लेकिन जो लोग मूलभूत पहाड़ो के रहने वाले थे और आज उन्हानें यहां मकान बना लिया है ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है। इससे एक बात तो साफ है कि राज्य मिलने के बाद हमारा आर्थिक विकास तेजी से हुआ है। हमारे पास जब पैसा आया तो तभी हमने अपनी सुविधाओं को देखते हुए शहरों का रूख किया। पहाड़ो से होता पलायन और शहरों में बढता घनत्व दोनों ही बड़ी चिंता का विषय है। सरकार को कोई ऐसी ठोस नीति बनानी चाहिए कि दुबारा से हम पहाड़ो की तरफ लौट सकें। और इसके लिए अगर सरकार पहाड़ पर राजधानी ले जाए तो काफी हद तक पलायन रूक जाए।
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में गांव का व्यक्ति हूं। राज्य बनने तक मेरे गांव में सड़क नहीं थी, बिजली नहीं थी। प्राइमरी स्कूल तक नहीं था आज वहां जूनियर हाई स्कूल है। आज हमारे गांव में बिजली, पानी सड़क टेलीफोन सब है। नजदीक में इंटर कॉलेज, महाविधालय है तहसील खुल गई है। और तब भी हमारे गांव वाले पलायन कर रहें हैं। तो आप ये कहेंगे कि सरकार ने क्यों दी ये चीजें बिना प्लान के। जो हमारी मूलभूत आवश्यकताएं हैं वो हमें देने पडे़गी ढांचागत विकास करना पडेगा। वो सुविधा होने के बाद अब ऐसी प्लानिंग सकरार को करनी चाहिए। तो में सोचता हूं ऐसी प्लानिंग सरकार करेगी। दूसरा प्रशन यह है कि सरकारी नौकरी में जो लोग हैं वो जाना नहीं चाहते पहाड़ों में। ट्रांसफर के बाद भी रूकाने का प्रयास करते हैं। उत्तर प्रदेश में रहते हुए भी मुनिश्यारी में दूर स्थान तक डॉक्टर रहता था। आज डॉक्टर का हम ट्रांसफर कर रहें हैं तो वह छुट्टी ले ले रहा है राजनीतिक दवाब बनाकर ट्रांसफर रूकवाने की कोशिश करता है। इस चीज को रोकने के लिए जब तक कठिन क्षेत्रों में प्रदेश का मुखिया और चीफ सेकेट्री रहना शुरू नहीं करेंगे। तो में सोचता हूं कि एक छोटा कर्मचारी भी क्यों कहे कि मैं वहां रहूं। उसके आधार पर हमें प्लान बनाना पड़ेगा।
भ्रष्टाचार के मामले को लेकर मैने कई बार कहा भी में अनुभव भी करता हूं। भ्रष्टाचार की बात राजनैतिक दल तेजी से उठाते हैं। लेकिन उसको प्रमामिणत नहीं कर पाते। जब माननीय तिवारी जी इस प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। मैं उनकी कैबिनेट में था उस समय प्रतिपक्ष भारतीय जनता पार्टी ने 56 घोटालों की बात कही थी। बड़े जोर शोर से कहा था और ये भी कहा था कि अगर हम सत्ता में आए तो एक-एक कर दोषियों को जेल में ठूसेंगे। लेकिन पांच साल तक भाजपा सत्ता में रही उसने क्या किया। किसी को जेल नहीं हुई। यदि किसी को उसी टाइम जेल भेज दिया गया होता तो मैं समझता हूं आगे कभी घपले घोटाले न होते। भाजपा के शासनकाल में कांग्रेस ने भी कई आरोप लगाए। कुंभ घोटाला कर दिया, जमीन घोटाला कर दिया, जलविघुत परियोजना घोटाला कर दिया। हमको लगता था कि यदि कांग्रेस सत्ता में आयेगी तो कुंभ घोटाले को खोलेगी।
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दोषियों को दंडित करेगी। लेकिन कांग्रेस सरकार को पंाच साल पूरे होने को हैं लेकिन वो मुद्दे खो गए। घोटालों पर सिर्फ सियासत हुई है इनको लेकर दलों की सोच सही नहीं हैै। जब राजनैतिक दल सत्ता में आते हैं तो वह सब भूल जाते हैं ऐसा नहीं होना चाहिए। भ्रष्टाचार पर पूरे प्रमाण के साथ कार्रवाही होनी चाहिए। प्रदेश में भ्रष्टाचार को अनावश्यक रूप से बढावा मिल रहा है यह इस पर हल्ला हो रहा है।आरोप लगाना हो हल्ला मचाना राजनीति में बहुत आसान हो गया है। कहीं पर कोई पैंसा खा रहा है। और उस पर आरोप लग रहा है तो उस प्रमाण कर बताएं, उसे कटघरे में खड़ा करें। प्रमाण के साथ आएगें दोषी को पनिशमेंट होगा तो जो अगला आदमी आयेगा वो डरेगा। यह व्यवस्था इस प्रदेश में नहीं हो पाई जो होनी चाहिए थी। भ्रष्टाचार पर कार्रवाही के बजाय सिर्फ आरोप-प्रत्यारोपों की सियासत ज्यादा होती रही है। देखिए में इस विषय में ये कह सकता हूं कि हमारे प्रदेश में 1952 से चुनाव हुए हैं। और इस प्रदेश का मतदाता बहुत जागरूक और परिपक्व है।
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में ऐसा मानता हूं। लेकिन सरकार को बनाने की जिम्मेदारी मतदाता की होती है। हमारे इस छोटे से प्रदेश में अब तक तीन सरकारें बन चुकी हैं। तीनों सरकारों के कार्यकाल की समीक्षा करें तो उन नेताओं के कार्यों की विवेचना कर हमारा मतदाता सही निर्णय करता है तो प्रदेश सही दिशा में जायेगा। अगर मतदाता गलत निर्णय करेगा। धर्मवाद, शराब, जातिवाद की सोच रख कर वोट करेगा तो देश और प्रदेश का अहित होगा। सही काम और प्रदेश का हित देने वाले लोगों को भेंजेगे। हो सकता है उनमें मतदाओं ने कुछ कमी देखती होगी। उनमें विश्वास इस लिए नहीं किया होगा कि वो प्रदेश को चला पायेंगे या नहीं। या फिर में जो कह रहा हूं कि उन्होंने सही निर्णय न किया हो। दोनों बाते हों सकती हूं। मैं तो इस धारणा का हूं कि स्पष्ट बोलता हूं। में चार बार का विधायक हूं। तीन बार लगातार अपने क्षेत्र से विधायक रहा हूं। में अपने क्षेत्र के मतदाताओं से भी साफ कहना चाहता हूं कि गोविंद सिंह कुंजवाल ने अगर कोई कभी की हो अपने क्षेत्र के लिए और मुझसे अच्छा कोई आदमी वो चाहते हैं तो उसको लाएं अपने क्षेत्र का विकास करायें और लोगों का हित कराएं।

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में कभी यह नहीं कहूंगा कि मुझे वोट दें तभी आपका क्षेत्र आगे बढेगा। यह मतदाताओं को तय करना है कि वर्तमान में आपके क्षेत्र से जो प्रत्याशी खड़े हो रहे हैं उनमें सबसे अच्छा प्रत्याशी कौन मिल सकता है किस पार्टी का मिल सकता है। और कौन क्षेत्र और प्रदेश को आगे बढाने के लिए काम कर सकता है तभी प्रदेश का हित होगा। एक दूसरे पर टीपा टिप्पणी करते रहें और क्षेत्रवाद, जातिवाद और धर्मवाद पर वोट देते रहें तो मैं समझता हूं प्रदेश का हित नहीं होगा। इसके लिए सब जिम्मेदार हैं। राजनेता भी पब्लिक भी और मतदाता भी । एक छोटे से प्रदेश में इस तरह की बात नहीं उठनी चाहिए। जिन्होनें उठाई वो सबसे बड़े इससे दोषी हैं। पहले तो हमारा देश एक है प्रदेश एक है। इब इस छोटे से प्रदेश को भी हम टुकड़ो में बांट देंगे। में यह समझता हूं कहां से प्रदेश का हित होगा। कहीं कहीं पर मीडिया का रोल भी नुकसान दायक होता है।
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मैं इस पर इसलिए कोई कमेंट नहीं करना चाहता क्योंकि में प्रदेश को लेकर कोई सोच रखता हूं। उस सोच के तहत में यह पाता हूं जिस समय इस राज्य की मांग उठी थी उस समय यह मांग उठाते समय आपको यह लगेगा जो पर्वतीय आठ जनपद हैं उन्हीं को देखते हुए हमने राज्य मांगा था। देने वालों ने उसमें क्षेत्रफल बढा दिया। हमने उसे स्वीकार कर दिया। कोई बड़ी बात नहीं है। स्वीकार करते समय जिन्होने राज्य को दिया उन्होंने सबसे बड़ी भूल करी जो राजधानी के मुद्दे को उन्होने हल नहीं किया और राजधानी घोषित नहीं की जिसकी वजह से यह मुद्दा आजतक इस उत्तराखण्ड में तैरता जा रहा है यदि उस समय कहीं पर भी वो कर देते, लोगों ने राज्य स्वीकार किया राजधानी भी स्वीकार कर लेते। लेकिन आज राजधानी का मुद्दा हल नहीं होने की वजह से मैं समझता हूं यह राजनैतिक दलों की गले की हडडी बन गया है। कोई भी राजनैतिक दल इतनी मजबूत इच्छा शक्ति वाला नहीं है कि जो वह स्थाई राजधानी की घोषणा कर सके। मैं तो थोड़ा बहुत धन्यवाद देता हूं 2012 से 2017 तक की सरकार को कि उन्होंने थोड़ी हिम्मत तो करी कि जो गैरसैंण विल्पुत हो गया था। उस गैरसैंण में फिर कैबिनेट करके वहां सत्र चलाकर करके वहां विधानभवन सचिवालय तैयार कराया । यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। अब इस बारे में आगे आने वाली सरकारों को निर्णय करना पड़ेगा।
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जो हमारी संसदीय प्रणाली है इस प्रणाली में पूरे देश के अंदर गिरावट आई है। जो चर्चाए जो चितंन पहले हुआ करते थे इन सदनों में उसमें कमी आई है। इस कमी को हमारे लोगों ने दूर नहीं किया तो निश्चित तौर पर यह लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। प्रजांतत्र के लिए नुकसान हो सकता है। उस पर हमें चिंतन करना चाहिए मनन करना चाहिए। मैं तो हमेशा कोशिश करता हूं कि जिस जनता ने चुनकर भेजा है अगर हम उस जनता की भावना के अनुरूप कर्तव्य का ठीक से पालन नहीं करते तो निश्चित रूप से जनता हमें कभी माफ नहीं करेगी। इस लिए सभी सदस्यों को गंभीरता से चिंतन और मनन करना चाहिए।