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गूगल युग में भी नारी तेरी यही कहानी ! आंचल में दूध,आँखों में पानी!

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सदियों से चली आ रही कुप्रथा: आज भी महिलाओं को पीरियड्स में गायों के बीच सोना पड़ता है?

गूगल युग में भी नारी तेरी यही कहानी ! आंचल में दूध,आँखों में पानी! पढ़कर अजीब लग रहा है इन लाइनों को। आप सोच रहे होंगे कि जहां यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:। यह कहावत तो बहुत पुरानी हो गयी है आज आज गूगल युग है और इस युग में ऐसी बात करना भी पाप के समान है। लेकिन जब महिलाओं के पीरियड के दौरान गायों के साथ सोने की बात के बारे में आप सोचेंगे और आपको यह पता चलेगा कि गूगल युग में आज भी महिलाओं को पीरियड के दौरान गोशालाओं में सोना पड़ता है तो आप चौक जाएंगे ही साथ ही आप खुद शर्मिंदगी महसूस करेंगे और यही कहेंगे कि  नारी तेरी यही कहानी ! आंचल में दूध,आँखों में पानी!

आप सदियों से चली आ रही इस कुप्रथा के बारे में जानेंगे तो आप भी हस्तप्रद हो जाएंगे कि महिलाओं को आज भी पीरियड के दौरान गायो के साथ गोशाला में सोना पड़ता है यह कहा का न्याय है और सरकार की कान तक इस बात की खबर क्यों नहीं लगी जो महिलाओं के लिए अनेको-अनेक घोषणाएं और अनेको ऐसे कार्य कर रही है जो आज विश्व के पटल पर उसकी चर्चा हो रही है। लेकिन इस समस्या जिस पर एक भी धन खर्च नहीं होना है के बारे में क्यों नहीं सोच रही। क्यों इस पर कानून नहीं बना लेती।

यहां मेरा ध्यान भी बीबीसी की एक खबर के बाद इस समस्या पर पड़ा और मैंने इसे साभार लेकर कुछ पक्तिंया इस पर लिखने की सोची। कि आज के गूगल युग में हम जहां बड़ी-बड़ी बाते करने के साथ वह कर रहे हैं जो नामुमकिन है फिर भी इसके बाद भी इस कुप्रथा पर हमार ध्यान क्यों नहीं गया। यहां बीबीसी में छपे लेख को साथार दे रहा हू ताकी आप पूरी कहानी समझ सके और देश में महिलाओं के साथ हो रहे इस भेदभाव के बारे में भी अपनी राय रखने के साथ देश में महिलाओं के लिए इस पर सरकार से कुछ करने की बात कह सके। इसके बाद की लाइने बीबीसी साभार लेकर हूबहू दी गयी हैं आप भी पढे़…

महिलाओं को पीरियड्स में गायों के बीच क्यों सोना पड़ता है?

कुल्लू: मैं सर्दी में गोशाला के भीतर सोती हूं, वरना बाहर. घर के भीतर नहीं जा सकते, रसोई में कदम नहीं रख सकते, मंदिर नहीं जा सकते. कभी-कभी भगवान से सवाल करती हूं कि ऐसा क्यों?”हिमाचल प्रदेश में कुल्लू के जाना गांव की बिमला देवी एक बच्चे की माँ हैं. मासिक धर्म के वक़्त वो अपने घर के भीतर कदम नहीं रखतीं. बच्चे और पति से अलग, घर के नीचे, गोशाला में सोती हैं .

कुल्लू-मनाली ऐसी जगह है जहां दुनिया भर से पर्यटक आते हैं और यहाँ की खूबसूरत वादियों का नज़ारा लेते हैं, लेकिन कुल्लू की ये एक दूसरी तस्वीर भी है.कुल्लू के पहाड़ों में बसे गांव में बहुत सी औरतें मासिक धर्म में गोशाला में सोती है. औरतों को परिवार से अलग गोबर की गंध के बीच सोना पसंद नहीं, लेकिन उनके पास दूसरा कोई चारा भी नहीं है.

बिमला देवी बताती हैं, “हम किसी को छू नहीं सकते. उन दिनों औरतों को गंदा माना जाता है. अकेले रहना पड़ता है, तो अजीब लगता है.”यहां लोगों का विश्वास है कि पीरियड्स के दौरान अगर औरत घर के अंदर आई तो घर अपवित्र हो सकता है या देवता गुस्सा हो सकते हैं.

कुछ महीने पहले प्रीता देवी शादी करके कुल्लू के धर्मोट गांव में आई थीं. बीए पास प्रीता के लिए इस प्रथा का सामना करना आसान नहीं था.वो कहती हैं कि ये पुराने रीति रिवाज़ है, लेकिन हमें इनका पालन करना होगा.प्रीता कहती हैं, “पहले तो मैं ठीक से सो भी नहीं पाती थी. डर लगता था. लेकिन प्रथा का पालन भी करना होगा, वरना देवता गुस्सा होंगे.”

लेकिन, हिमाचल प्रदेश महिला कल्याण मंडल की मधुर वीणा मानती हैं कि बदलाव की ज़रूरत है.वो कहती हैं, “अगर बदलाव चाहिए तो वो एकदम से नहीं होगा. ये एक पुरुष प्रधान समाज है. बदलाव में वक़्त लगेगा. जागरुकता आएगी तो औरतें इस बारे मे मंथन करेंगी.”अब इस साल कुछ कोशिशें हो रही हैं कि इन औरतों को गोशाला में न सोना पड़े.

कुल्लू में सरकार ‘नारी गरिमा’ कार्यक्रम के ज़रिए जागरुकता लाने की कोशिश कर रही है.लोगों को ये समझाने का प्रयास हो रहा है कि गोशाला में रहने से कई बीमारियां हो सकती हैं.इस एक साल के कार्यक्रम में नुक्कड़ नाटक, लोक गीत और नृत्य के ज़रिए ऐसी कोशिशें हो रही हैं .

कुल्लू के डिप्टी कमिश्नर यूनुस भी मानते हैं कि लोगों की धारणा बदलना आसान नहीं है.यूनुस कहते हैं, “सम्मान से जीने का अधिकार सबको है. जिस गाँव में हम जागरुकता लाने की कोशिश करते हैं तो हम अपने साथ डॉक्टर्स की टीम और आंगनवाड़ी वर्कर्स लेकर जाते हैं. क्योंकि इससे लोगों की आस्था भी जुड़ी है तो हमने कुछ पुरोहित और पुजारियों से भी बात की और इनमें से कुछ ने हमारा साथ भी दिया.

“हम उस गांव में पहुंचे जहाँ से इस जागरुकता कार्यक्रम का आगाज़ जनवरी 2018 में हुआ था.बेशक अभी बहुत कुछ बदलना बाकी है, लेकिन गांव में इस बारे में बातचीत होने लगी है और मर्द भी इस पर खुलकर बात करने लगे हैं.जाना गांव के पुजारी जगत राम ने कहा “यहां इस बारे में जागरुकता है. जहाँ तक मंदिर जाने की बात है तो हम कहाँ तक रोक सकते हैं. जहां तक भगवान की बात है, तो उसके लिए सब समान हैं.

भगवान के दरवाज़े सबके लिए खुले हैं.”कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बदलाव नहीं चाहते. उसी गांव की बुद्धि देवी मानती है कि ये तो परंपरा का हिस्सा है और पीरियड्स के दौरान घर से बाहर रहना ठीक है.बुद्धि देवी कहती हैं, “हमें बदलाव नहीं चाहिए, हमें देवता को गुस्सा नहीं करना. ये हमारी रीति है.

“पार्वती देवी का एक बेटा है लेकिन उन्होंने तय किया है कि अगर उन्हें बेटी हुई या उनके घर जब बहू आएगी तो वो उन्हें गोशाला में नहीं रहने देंगी.यहां लोगों से बात कर ये पता चला कि लोगों की सोच को बदलने मे वक़्त लगेगा, लेकिन शुरुआत हो चुकी है.लोगों का मानना है कि नई पीढ़ी अपने साथ बदलाव लेकर आएगी.

सुमिरन प्रीत कौर
 कुल्लू (हिमाचल प्रदेश) से

इस आलेख में आंशिक शब्दों को जोड़ा गया है शेष यह आटिकल साभार- बीबीसी से लिया गया है।