मैं एक आम आदमी हूँ और मेरी कोई औकात नहीं है

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उत्तराखंड एक पहाड़ी राज्य के साथ-साथ अत्यधिक संवेदनशील अन्तर्राष्ट्रीय सीमांत प्रदेश भी है, इसकी अनदेखी भारत के लिए न केवल पर्यावरणीय दृष्टि से, बल्कि देश की सुरक्षा के लिए भी घातक है। उत्तराखंड में भ्रष्टाचार में लिप्त जनप्रतिनिधियों, पूंजीपतियों और ठेकेदारों ने सरकारी तंत्र से मिलीभगत करके प्रकृति का घोर अनैतिक दोहन किया है।राज्य बने एक दशक से अधिक का समय हो गया, लेकिन राज्य का विकास आज भी नहीं हुआ। आम लोगों के मन में क्या तैर रहा है यह जानना जरूरी है। इसी कड़ी में प्रस्तुत है उत्तराखंड के एकआम आदमी के मन की बात। संपादक

भार्गव चन्दोला
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मैं एक आम आदमी हूँ और मेरी कोई औकात नहीं है। मगर यदि मैं उत्तराखंड का मुख्यमंत्री होता तो उत्तराखंड का ऐसा विकास करता….। हिमालयी बर्फ के ग्लेशियर न सिर्फ हिमालयी राज्यों के लिए बल्कि सम्पूर्ण भारत के लिए जीवन देने का काम करते हैं। इन ग्लेशियरों से निकलने वाली नदियाँ भारत के पर्यावरण संतुलन को बनाये रखने का काम करती हैं। सम्पूर्ण भारत की कृषि, वन, पशु-पक्षी, जीव-जन्तुवों का अस्तित्व इन्हीं नदियों के कारण है। ग्लेशियर नहीं होंगे तो भारत एक रेत के टीले में तब्दील हो जायेगा। जनप्रतिनिधि व लोकसेवक इसकी संवेदनशीलता नहीं समझ पा रहे हैं जिस कारण आज इन पर खतरा मंडरा रहा है।

उत्तराखंड एक पहाड़ी राज्य के साथ-साथ अत्यधिक संवेदनशील अन्तर्राष्ट्रीय सीमांत प्रदेश भी है, इसकी अनदेखी भारत के लिए न केवल पर्यावरणीय दृष्टि से, बल्कि देश की सुरक्षा के लिए भी घातक है। उत्तराखंड में भ्रष्टाचार में लिप्त जनप्रतिनिधियों, पूंजीपतियों और ठेकेदारों ने सरकारी तंत्र से मिलीभगत करके प्रकृति का घोर अनैतिक दोहन किया है।

बारूदी विस्फोटों से सड़कें, भवन और सुरंग का निर्माण पहाड़ी जिलों के लिए विनाशक साबित हुआ है। पहाड़ छलनी होकर दरक रहे हैं जिस कारण लगातार बादल फटने, भूस्खलन की घटनाएँ आम बात हो गई हैं और इसी का नतीजा है कि उत्तराखंड को इतनी बड़ी त्रासदी झेलनी पड़ी। आजीविका के लिए स्थानीय लोगों के पलायन के कारण पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ गया है।

उत्तराखंड में विकास का प्रारूप बदलना होगा
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उत्तराखंड की सरकारों ने जिसे विकास का रथ माना था वो आज न सिर्फ उत्तराखंड के लिए बल्कि देश के लिए भी विनाशक साबित हो रहा है। बड़ी-बड़ी बिजली परियोजना, डैमों का मलबा, अत्याधिक मानव दखल, तीर्थ यात्री, पर्यटक, गाडि़याँ, होटल, धर्मशालायें और उनसे निकलने वाला प्रदुषण, नदी का अतिक्रमण इस हिमालय के ग्लेशियरों का अस्तित्व खतम कर रहे हैं जो सम्पूर्ण भारत के लिये विनाशक हो रहा है। उत्तराखंड को प्लायन मुक्त बनाने और हिमालय को बचाने के लिए दूरगामी योजना होनी चाहिए। यहाँ मूलभूत सुविधाओं की कोई कमी न हो तभी रोजगार की अपार संभावनाओं का लाभ उत्तराखंड की आम जनता उठा सकती है व पलायन रुक सकता है।

पर्यावरण संतुलित उत्तराखण्ड के विकास का प्रारूप

उत्तराखंड सरकार के पास प्रयाप्त बजट है जिससे उत्तराखंड का नव-निर्माण प्राकृतिक संतुलन के साथ-साथ जनहितकारी भी किया जा सकता है इसके लिए कम से कम न्याय पंचायत स्तर पर मूलभूत सुविधाओं और रोजगार का प्रारूप तैयार करना आवश्यक होगा। उत्तराखंड एक पहाड़ी राज्य है जहाँ छोटे छोटे गाँव हैं। पलायन के कारण परिवारों की संख्या बहुत कम है ऐसे में प्रत्येक गाँव में शिक्षा, चिकित्सा व वित्तीय सेवायें प्रत्येक गाँव में देना सम्भव नहीं है। इसलिए कम से कम प्रत्येक न्याय पंचायत स्तर पर विकास का प्रारूप खड़ा किया जायेगा। उत्तराखंड में कुल 670 न्याय पंचायतें हैं जिसमें एक न्याय पंचायत के अंतर्गत 10 से 15 ग्राम पंचायतें आती हैं। स्थानीय जनता एवं कर्मचारियों को पर्यावरणीय संतुलित मूलभूत सुविधाएँ और रोजगार के साधन न्याय पंचायत स्तर पर कैसे उपलब्ध होंगे?

शिक्षा का प्रारूप

स्कूल, कृषि, योग, संस्कृति, आयुर्वेदिक, उच्च, तकनिकी, आपदा प्रबंधन, खेल एवं चिकित्सा शिक्षा का समायोजन किया जायेगा और प्रदेश में जगह जगह स्थापित किये गए अनावश्यक स्कूल-कालेजों आदि को बंद कर आदर्श शिक्षा परिसर प्रत्येक न्याय पंचायत स्तर पर तैयार किया जायेगा व प्राइवेट स्कूलों से बेहतर गुणवता युक्त शिक्षा दी जाएगी, साथ ही निजी स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए निति बनाई जाय।

चिकित्सा का प्रारूपः

एलोपेथी, आयुर्वेदिक, होमोपैथी व यूनानी चिकित्सा पद्वती का समायोजन कर आधुनिक सुविधा यूक्त चिकित्सालय प्रत्येक न्याय पंचायत स्तर पर स्थापित किया जायेगा व प्राइवेट चिकित्सालयों से बेहतर चिकित्सा सुविधा दी जायेगी।
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रोजगार का प्रारूपः

स्थानीय उत्पादन उद्योग, सब्जी उत्पादन, जड़ी-बूटी उत्पादन, फलोत्पादन ;सेब, अखरोट, माल्टा, आडू, खुमानी, बुरांश, पुलम, चोलू, नाशपाती, आम, लीची, अमरुद, हिंसर, बुरांश, काफल, अन्नार, टिमरू आदि हेतु जलवायु मौजूदद्ध, दुग्ध डेरी, मधु-पालन, काष्ठ-कला, कंडी उद्योग, हथ-करघा उद्योग, भेड़ पालन, साहसिक एवं प्राकृतिक खेल, योग-ध्यान केंद्र, बिक्री केंद्र, पर्यटन हट-नुमा होटल, आवाजाही हेतु ट्रेवल सेवा, लोक कला-लोक फिल्म उद्योग, सूचना एवं साफ्टवेयर उद्योग, आदि का समायोजन कर प्रत्येक न्याय पंचायत स्तर पर रोजगार परिसर स्थापित किया जाय। बड़ी जल बिजली परियोजनाओं की जगह स्थानीय जनता की भागीदारी के साथ ‘रन आफ दा रिवर वाटर’ पर छोटी छोटी 10 मेगावाट तक की बिजली परियोजनायें लगाई जायेंगी व नियुक्ति न्याय पंचायत परिछेत्र से ही करके जवाब देही की जाय। आवश्यक हुवा तभी अन्य क्षेत्रों से नियुक्ति की जाएगी। किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाने पर या लापरवाही करने पर सेवा समाप्त व सम्पति जब्त करने तक का कढ़ा प्रावधान किया जायेगा।

वित्तीय सुविधाओं का प्रारूप

बैंक, सहकारी बैंक, ऐ.टी.एम., जीवन बीमा, चिकिस्ता बीमा, साधारण बीमा आदि का समायोजन कर प्रत्येक न्याय पंचायत स्तर पर एक वित्तीय परिसर तैयार करने के साथ इसमें सुधार किया जाए।
खेल का प्रारूपः कबडी, गिली-डंडा, पंच-पथरी, खो-खो, फुटबाल, बालीबाल, हाकी, क्रिकेट, बेड-मिन्टन, कुश्ती, बाक्सिंग, टेनिस, स्विमिंग आदि का समायोजन कर प्रत्येक न्याय पंचायत स्तर पर खेल परिसर व खेल मैदान बनें।

आवास का प्रारूपः

उत्तराखंड में सरकारी कर्मचारियों को मूलभूत सुविधा न मिलने के कारण हमेशा जनता को उसका फल भुगतना पड़ता है और कर्मचारी भी तनाव मेंरहते हैं जिस कारण सम्पूर्ण उत्तराखंड में सरकारी शिक्षा, चिकित्सा आदि धराशाई हो गई है और सरकार असफल प्रयोग कर जनता के धन का दुरूपयोग कर रही है द्य सरकार अपनी विफलता छुपाने के लिए पी.पी.पी. मोड लागू कर रही है जबकि पी.पी.पी. मोड में आम जनता एवं कर्मचारियों का शोषण होना सुनिश्चित है, जिससे पी.पी.पी. मोड के दूरगामी परिणाम घातक होंगे द्य कर्मचारियों को मूलभूत सुविधायें मिलेंगी तो वो अपने परिवार को साथ रख सकेंगे और जनता को तनावमुक्त होकर सेवा देंगे, इसलिए कर्मचारी आवास, छात्र-छात्रा आवास एवं आवासीय कालोनी प्रत्येक न्याय पंचायत स्तर पर बनाई जायेगी व सभी कर्मचारीयों की जवाबदेही तय की जाय।

सड़क और निर्माण का प्रारूप

सड़क निर्माण रोड मैपिंग के आधार पर किया जायेगाद्य किसी भी प्रकार के निर्माण कार्यों में विस्फोटकों का इस्तेमाल पूर्णतः बंद किया जायेगा द्य निर्माण करने के लिए स्टोन कटर तकनीक का इस्तेमाल करने के साथ-साथ मलबा किसी भी सूरत में पहाड़ों से नीचे न गिराया जाय, मलवा नीचे आने के कारण नदी का प्रवाह बाधित होता है और जहाँ नदी नहीं होती है वहां पेड़-पोधों को नुकसान करता है इसलिए सड़क कटान का मलवा जहाँ भरान की आवश्यकता है वहां भेजा जायेगा ताकि कृषि भूमि की मिट्टी को सुरक्षित रखा जा सके साथ ही प्रत्येक ग्राम को न्याय पंचायत व न्याय पंचायत को दूसरी न्याय पंचायत के प्रारूप को सड़क मार्ग से जोड़ा जाय।

चकबंदी कर कृषि, बागवानी, जड़ी-बूटी व वनों का प्रारूप

उत्तराखंड में जगह-जगह बिखरी खेती की चकबंदी की जायेगी व नदियों के पानी को ऊपरी हिस्से तक पहुंचाया जायेगा साथ ही बरसाती पानी का वाटर हारवेस्टिंग के जरिये वाटर बैंक बनाया जायेगा ताकि असिंचित भूमि पर फलदार वृक्षों, बागवानी व कृषि के लिए पानी की कमी न हो और पर्यावरणीय संतुलित रोजगार खड़ा किया जा सके। चीड़ के पेड़ पर्यावरण के लिए विनाशक बन गए हैं इसे फैलने से रोका जायेगा तथा दूरगामी लाभ-दायक और पर्यावरणीय संतुलन बनाने वाले फलदार एवं चौड़ी पत्ती के पेड़ों को गांवों से लेकर जंगलों तक लगाया जायेगा जिससे जंगली जानवरों को भरपूर पोषण जंगल में ही मिल जाये और वो आबादी वाली जगहों में न आये और भूस्खलन को रोकने और पानी के श्रोतों को जिन्दा रखने हेतु वृक्षारोपण और ढालदार जगह पर दूबघास रोपण आवश्यक है ताकि मिटटी को बांधा जा सके और भू-स्खलन रुके साथ ही किसानों को फसल का उच्चतम मूल्य एंव समय से भुगतान के साथ-साथ अन्य सुविधायें दी जायेंगीद्य वन विभाग, फल संरक्षण, वन-निगम व कृषि विभाग को पर्यावरण और जीव-जन्तुओं को ध्यान में रखकर वनों का विकास करना होगा।

ग्राम व वार्ड का पर्यावरणीय संतुलित रोजगार प्रारूप

उत्तराखंड एक ऐसा प्रदेश है जिसका 67 प्रतिशत भू-भाग वन क्षेत्र में आता है जिस कारण हिमालयी राज्यों पर पूरे देश की जीवन डोर टिकी है। पर्यावरणीय संतुलन बनाये रखने हेतु उत्तराखंड के गाँव में निवास करने वाले ग्रामवासियों को गाँव को हरा-भरा रखने के लिए लक्ष्य निर्धारित कर नियुक्त किया जायेगा ताकि गाँव के बेरोजगार युवाओं को आजीविका के लिए गाँव में ही रोजगार मिल जाये साथ ही पर्यावरण संतुलन भी बना रहे।

नागरिक, सामाजिक व आपदा सुरक्षा व सहायता का प्रारूप

उत्तराखंड के अन्दर प्रांतीय रक्षक दल, होम गार्ड, एन.सी.सी.-एन.एस.एस. कैडेट, युवक मंगल दल, महिला मंगल दल, पूर्व सैनिक, अर्द-सैनिक, एस.एस.बी. द्वारा ट्रेंड गुरिल्लाओं की काफी संख्या पहले से मौजूद है और ये सभी स्थानीय निवासी होने के साथ-साथ भौगोलिक परिस्थति से भी अवगत हैं इन्हें और सक्षम बनाने हेतु एन.डी.आर.एफ. के माध्यम से कड़ा प्रशिक्षण दिलवाया जायेगा और न्याय पंचायत स्तर पर ‘स्टेट डिजास्टर एंड रिलीफ फोर्स’ की जगह ‘नागरिक, सामाजिक, आपदा एवं पर्यावरण सुरक्षा फोर्स’ के रूप में तैयार किया जायेगा।

हिमालयी राज्य उत्तराखंड का पर्यावरणीय संतुलन बनाये रखने हेतु बाहरी लोगों द्वारा बसागत रोकने के लिए भूमि की खरीद-फरोखत पर रोक लगाई जायेगी, आवश्यक हुवा तो मार्केट दर पर किराये पर जमीन या भवन दिया जा सकेगा। जनप्रतिनिधियों के लिए शिक्षा के मानक तय किये जायेंगे एवं ग्राम वार्ड मेंबर से लेकर जिला पंचायत तक को आजीविका के लिए सम्मानजनक मानदेय की व्यवस्था होने से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा। आंगनबाड़ी, आशा, भोजनमाता, पी.आर.डी.,उपनल, नरेगा में ठेकेदारी में नियुक्त कर्मचारियों को स्थाई किया जायेगा एवं आँगन बाड़ी केन्द्रों को गुणवतायुक्त बना कर उनके कार्यों की समीक्षा की जाएगी व कार्यों के लिए लक्ष्य निर्धारित करना होगा। छोटे से राज्य उत्तराखंड में अत्यधिक निगम, प्राधिकरण, विभाग, आयोग, निदेशालय आदि को सीमित कर समायोजित किया जायेगा एवं जनता पर अनावश्यक वित्तीय बोझ कम होगा। हिमालयी राज्य व सीमान्त प्रदेश होने के नाते आम जनता की आजीविका एवं मूलभूत सुविधाओं के लिए केंद्र सरकार से विशेष वित्तीय सहायता एंव कार्बन क्रेडिट के लिए ग्रीन बोनस की मांग पुरजोर तरीके से की जायेगी।

उत्तराखंड का पंचायती राजएक्ट बनाया जायेगा और संविधान का 73वां-74वां संसोधन लागू करना होगा। ग्राम स्वराज स्थापित कर प्रशासन की जवाबदेही जनता के प्रति तय की जाएगी एवं जनता को स्वराज का अधिकार दिया जायेगा। अल्प अवधि की परियोजनाओं के अलावा ठेकेदारी प्रथा बंद कर सीधी भर्ती के माध्यम से नियुक्तियां की जायेंगी एवं श्रमिकों के श्रम का उचित मूल्य निर्धारण करना होगा। सार्वजानिक वितरण प्रणाली खाद्यान ‘एलपीजी’ बीज-खाद आदि को टोटल आनलाइन किया जाना चाहिए। भ्रष्टाचार, कामचोरी व महिला उत्पीड़न रोकने के लिए थाना-चौकी, ग्राम, क्षेत्र, जिला पंचायत-पटवारी चौकी,डी.एम, सी.डी.ओ. आदि सभी सरकारी कार्यालयों एवं चौक-चौराहों में सी.सी.टी.वी. कैमरे लगाने के साथ-साथ आने-जाने के समय को दर्ज करने के लिए बायोमेट्रिक उपकरण लगाने व अधिकारियों के अलग से केबिन की प्रथा बंद कर बड़े-बड़े हाल बनाकर एक साथ हाल में कार्य करने के लिए व्यवस्था होनी चाहिए। उत्तराखंड के हर जिले में जनता के साथ मिलकर सर्वे करवाया होगा ताकी उत्तराखंड की स्थाई राजधानी, सचिवालय एवं विभागों के मुख्यालयों को उत्तराखंड की जनता की भावनाओं के अनुरूप एक ही परिसर में बनाया जायेगा, जिससे आम जनता को दर-दर न भटकना पड़े व जनता के कार्य समय से हो सकें साथ ही विभागीय कर्मचारी भी अनावश्यक दौड़ भाग में ही राजस्व एवं समय बरबाद न करें। उत्तराखंड राज्य आन्दोलन के दौरान हुए 1994 में मुजफरनगर कांड की जाँच कर दोषियों को सजा दिलवाने का कार्य भी करना होेगा।

राजराजेश्वरी विहार, लोवर नथनपुर, पो.औ. नेहरुग्राम देहरादून