अब इससे अच्छे दिन और क्या हो सकते है

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वीर और करुण रस का अदुभुत संगम नोटबंदी को कामयाब बना सकता है. मोदी की चाल के आगे सब विवश है और यही कारण है कि बामपंथी और ममता एक साथ और भ्रष्टाचार की बाते करने वाला केजरीवाल लालू का साथ देगा कहने का भाव है कि नोटबंदी पर ये सभी लोग एकजुट होकर मोदी जी के फैसले का विरोध कर रहे है मोदी जी को प्रधानमंत्री बने अभी 3 साल भी नही हुए और देश के सारे दुश्मन एक हो गए है.

मोदी के आरे में यहां यह उललेख करना चाहूगा कि वे भाव भंगिमाएँ काफ़ी अहमियत रखते हैं, मोदी अपने शरीर पर उतना ही ध्यान देते हैं जितना किसी कबीले का सरदार किसी बड़े अनुष्ठान से पहले देता है.फिर बात आवाज़ की भी है, वो दोस्ताना तो हो ही, साथ में जनता को पसंद आने वाला हो.लोगों को अपने मुहल्ले में होने वाली बातों की झलक भी मिलनी चाहिए और लगना भी चाहिए कि देश की बात हो रही है जिसे वे जानते हैं.लेकिन इन सबसे बढ़कर है भावनाएँ, कई बार घटनाएँ उतनी अहम नहीं होतीं लेकिन भावनाएँ उनको यादगार बना देती हैं.

कुछ दिनों पूर्व एक आलेख में उनके बारे में छपा था कि जनता का दिल भर आया है, अब आप कहते रहिए कि ये तो किसी घटिया हिंदी फ़िल्म सरीखी नाटकीयता है, लेकिन असली बात तो यही है कि हम सब बी-ग्रेड हिंदी फ़िल्मों की भारी खुराक पर पले हैं. नीरस एकाउंटेंट, कड़क मैनेजर सब ये कहते मिल जाते हैं कि यही बेस्ट पीएम है, यही असली नेता है, वही हमें समझता है.जब पिक्चर हिट है तो क्रिटिक कुछ भी कहते रहें. जनता मान चुकी है कि मोदी का नोटबंदी का फ़ैसला महान और ऐतिहासिक है, जनता त्याग के लिए तैयार है.

अब यहां पर यह भी उल्लेख करना बनता है कि क्या कभी आपने इस बात पर गौर किया है 2014 में जब हमने नरेंद्र मोदी को वोट डाले थे तब आपके मन में ये विचार आया था कि मोदी जी को दिया हुआ वोट इतना अहम निकलेगा . आप लोग खुद ही ध्यान दीजिये मोदी जी से पहले कांग्रेस ने सालों तक भारत पर राज किया है और सिर्फ जनता को लुटा ही है आखिर उन्होंने दिया क्या है भारत को . और मोदी जी के आने से 70 सालो से देश की गरीबी भ्रष्टाचार,आतंकवाद ,बेकारी और कालेधन से देश मुक्त हो रहा है इतना ही नही मोदी जी ने अपना घर परिवार छोड़ दिया है केवल जनता और देश के लिए .अब आप सोचो कि अभी तो केवल मोदी जी को 3 साल ही हुए है और देश के दुश्मन अभी से परेशान हो गए है अगर आगे भी मोदी जी ही प्रधानमंत्री बने रहे तो इनका क्या हाल होगा और अब इससे अच्छे दिन और क्या हो सकते है .

नोटबंदी पर सारा विपक्ष अब सरकार के खिलाफ हो गया है.खासकर विपक्ष मोदी ने पीछे हाथ घोकर पड़ा है. विपक्ष नोटबंदी के फैसले को जैसे मोदी की नाकामी बता रहा है.बीते दिनों पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जब इस धर्म युद्ध में कूदे तो उन्होंने भी नोट बंदी को सरकार की नाकामी बताया है. मनमोहन सिंह ने बताया कि विश्व का कोई ऐसा देश नहीं होगा जहाँ लोगों को अपने जमा पैसे निकालने से रोका गया हो.वैसे सूत्रों की मानें तो बीजेपी भी अंदर से नोटबंदी के मुद्दे पर दो खेमों में विभाजित है.क्या कभी 2 मिनट के लिए बैठकर आपने ये सोचा है अगर नही तो हम बता देते है क्यूंकि इन सभी को मोदी जी से डर है और अकेले तो ये मोदी जी का बाल भी बांका नही कर सकते तो इन्हें लग रहा है ये सब मिलकर मोदी जी को हरा सकते है .

इस सब के बाद अगर मोदी ने यह फैसले लिए तो क्या बूरा किया आप ही सोचिए

1. बीजेपी कार्यकर्त्ता घर-घर जायें और लोगों को समझाए

सूत्रों की मानें तो मोदी ने सभी नेताओं को सलाह दी है कि नोटबंदी के फायदे जनता को बताने जरुरी हैं. कार्यकर्ताओं का सबसे पहले शिविर लगाया जाए और इसके बाद इन्हीं कार्यकर्ताओं से घर-घर जाकर नोटबंदी के फायदे लोगों को बताने की अपील की जाये. इस तरह से मोदी सरकार सीधे जनता से संवाद की स्थिति में आ जाएगी.

2. विपक्ष को आंकड़ों के आधार पर घेरो

इस आपातकाल बैठक में फैसला लिया गया है कि विपक्ष इस समय आंकड़ों के आधार पर नहीं बल्कि हवाई शब्दों के आधार पर सरकार के इस फैसले का विरोध कर रहा है तो इसका तोड़ यह है कि मोदी सरकार आंकड़ों के आधार पर बात करे. नोटबंदी के बाद के कुछ ख़ास आंकड़ों को जुटाया जा रहा है.

3. बड़े कालाबजारी लोगों पर कार्यवाही करने का वक़्त आ गया है

जनता को अपने विश्वास में लेना ही मोदी का अहम उद्देश्य है. इस कार्य के लिए निर्णय लिया गया है कि कुछ बड़े काला धन जमा किये हुए लोगों पर एक बड़ी कार्यवाही कर दी जाए. ऐसी कार्यवाही के बाद जनता जरुर सरकार के साथ खड़ी हो जाएगी. कांग्रेस को नोटबंदी के फायदे बताने से अच्छा है कि कुछ बड़ी कार्यवाही करके कांग्रेस को जवाब दिया जाए.

4. तैयारी पूरी कर जनता को राहत जल्द से जल्द दी जाए

साथ ही मोदी ने कठोर शब्दों में सभी को बोला है कि किसी भी हालत में जनता को जल्द से जल्द राहत देनी होगी. बैंकों को अधिक काम करना पड़े तो भी कोई दिक्कत नहीं है. बस जनता का पैसा जो उनकी मेहनत का है वह जल्दी ही उनके बैंक अकाउंट में पंहुचा दिया जाए. साथ ही मोदी ने फैसला लिया है कि देश के एटीएम के साथ जो समस्या आ रही है उसे अगले दो दिन में सुलझाने का काम किया जाये.

5. कालेधन को लेकर अपनों के खिलाफ भी कार्यवाही होगी

सूत्रों की मानें तो इस बैठक में सबसे अहम फैसला लिया गया है कि बैंकों से उन लोगों की लिस्ट ली जाए जिन्होनें तय सीमा से अधिक पैसा अकाउंट में जमा कराया है. इस लिस्ट में अगर कोई अपना व्यक्ति भी है तो उसके खिलाफ भी कार्यवाही की जाये. इनकम टेक्स डिपार्टमेंट को बिना किसी दबाव के काम करने दिया जाए ऐसा भी पीएम ने फैसला लिया है.

सूत्रों की मानें तो प्रधानमंत्री नोटबंदी पर अब और भी कठोर निर्णय लेने वाले हैं. विपक्ष को आने वाले समय में और तकलीफ देना ही मोदी का उद्देश्य रहेगा.सालों बाद भारत में बनीं पूर्ण बहुमत वाली केंद्र सरकार के कार्यकाल के दो साल इस 26 मई को पूरे होने जा रहे हैं। पहली बार केंद्र में कोई सरकार जाति, धर्म और गरीबी हटाओ के नारे को छोड़ सबका साथ सबका विकास के नारे पर बनी है।

सरकार के मुखिया और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा की ओर से विकास पुरुष का चेहरा बने हुए हैं, लेकिन विकास के नाम पर आई दो साल पुरानी इस सरकार के कामकाज का सबसे अहम आधार देश का आर्थिक विकास है। यदि अर्थव्‍यवस्‍था ठीक है, तो देश में विकास की कल्‍पना की जा सकती है। विकास का नारा अर्थव्‍यवस्‍था के सही दिशा और गति से चलने पर निर्भर करता है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्‍या वाकई देश आर्थिक महाशक्‍ति बनने की स्‍थिति में है।

दरअसल कुछ सवाल आज भी भारत की अर्थव्‍यवस्‍था के संदर्भ में ऐसे हैं, जो भारत की वास्‍तविक आर्थिक स्‍थिति को बयां करते हैं। जाहिर है अर्थशास्‍त्र यदि आकंड़ों का विषय है, तो यहां सोचना होगा कि क्‍या आकंड़ों के हिसाब से ही हमारा देश आर्थिक महाशक्‍ति बनने की स्‍थिति में है?
हमें अक्‍सर यह बताया जाता है कि भारत की अर्थव्यवस्था वृद्धि के कुलाचे भर रही है। विश्व में सबसे तेज गति से विकास दर हासिल करने में भारत पहले पायदान पर है। हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था क्रय शक्ति के आधार पर दुनिया की तीसरे और सकल घरेलु उत्पादन में सातवी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। भारत की पिछले दशक की ग्रोथ रेट 7.7 प्रतिशत रही जो तीव्र वृद्धि दर थी।

इधर आजादी के बाद की आर्थिक पृष्‍ठभूमि पर नजर डालें तो भारत ने आजादी के बाद से आर्थिक नियोजन के लिए रूस का साम्यवादी आर्थिक मॉडल का अनुसरण किया और सन् 1990-91 के बाद अमेरिकी पूंजीवाद की तरफ कदम बढ़ाना शुरू किया, जिसके चलते आर्थिक उदारवाद के बाद हिन्दुस्तान की अर्थव्यवस्था ने तरक्की के कई सोपान पूरे किए जो निरंतर जारी है, जिसका आभास हमें बढ़ती विकास दर से कराया जाता है।लेकिन क्‍या आप यह जानते हैं कि यह एक अधूरा सच है, यानी कि यह सिक्के का एक पहलू है, जरा अब हम दूसरे पहलू पर कुछ आकड़ों के जरिये यह खोजते हैं कि क्या वास्तव में हमें जो सच्चाई का पाठ पठाया जाता रहा है, क्या वो वास्तव में अपनी जिरह में हकीकत को भी बयां करता है, या केवल श्ब्ब्दों का लब्बोलुआब भर है।

आइए जरा जानते हैं कि भारत की आर्थिक स्‍थिति वास्‍तव में कैसी है? और क्‍या वाकई भारत विश्‍व की आर्थिक महाशक्‍ति बनने की ताकत रखता है?

1-विश्व बैंक के अनुसार दुनिया की एक तिहाई गरीब आबादी को बसाये भारत पहले पायदान पर है, यानी 29.8 प्रतिशत देश की आवाम गरीबी रेखा के नीचे जीवन जीने को मजबूर है, जिसका मतलब है कि प्रति व्यक्ति कमाई एक डॉलर से भी कम है।
2- अंतर्राष्ट्रीय खाद्य अनुसंधान संस्थान के अनुसार वैश्विक खाद्य सूचकांक (2012) में भारत की 15.2 प्रतिशत रियाया भुखमरी की शिकार है, यानी हर पन्द्रह में से दो लोग भूखे मर रहे हैं, दुनिया का हर चौथा भूखा इन्सान भारत में रहता है।
2- संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के मानव विकास सूचकांक की ताजा आंकड़ों में भारत 188 देशों की सूची में 130वें स्थान पर है, यानी स्वस्थ्य जीवन, ज्ञान तक पहुंच और उपयुक्त जीवन स्तर में दीर्घकालीन प्रगति के आंकलन में भारत की स्‍थिति दयनीय है।

यह आंकड़े हमें जमीनी हकीकत से रूबरू कराते हैं, हालांकि इस बात से इंकारा नहीं किया जा सकता है कि आर्थिक विकास तो हुआ है, लेकिन सवाल यह उठता है कि इसका लाभ कुछ ही लोगों को क्‍यों मिला? जबकिआज भी आबादी का विशाल हिस्‍सा मुसीबतों और आर्थिक रूप से बदहाली में जीने को मजबूर है।
2- अब इधर, जरा ऑक्सेम की ताजा रिपोर्ट पर नजर डालते हैं, जिसके अनुसार भारत की कुल 70 प्रतिशत सम्पति देश के मात्र एक प्रतिशत यानी 2 लाख 36 हजार लोगों के पास है। एक तरफ दुनिया की एक तिहाई आबादी शुद्ध पानी, भोजन और घर जैसी जीवनयापन करने वाली मूलभूत अवश्यकतों से महरूम है, जो विश्व में सर्वाधिक है और दूसरी तरफ फोर्ब्स पत्रिका (2015) में दुनिया के 50 सबसे आमिर देशों की सूची में अमेरिका, चीन, जर्मनी के बाद भारत चौथे स्थान पर है।

एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 20 सालों में रईस लोगों की सम्पति में 45 प्रतिशत की वृद्धि हुई दूसरी तरफ गरीबों की आय में 41 फीसदी की कमी आई, जिस उदारवादी अर्थव्यवथा को गरीबी उन्मूलन और विकास के नाम पर लागू किया गया था, उसकी वास्तविकता यह है कि गरीबी विषबेल की तरह बढ़ती ही जा रही है और अमीर और अमीर होता जा रहा है।उदारवाद व्यवस्था के फलस्वरूप भारत को विकराल विषमताओं की खाई में बढ़ोतरी ही हुई, यानी एक तरफ तीव्र आर्थिक वृद्ध दर हासिल करते रहे और दूसरी तरफ गरीबी कम करने की तमाम कोशिशें नाकाम ही साबित हुई।

OECD (Organisation for economic co-operation and development) की रिपोर्ट के अनुसार 1990 में भारत की उच्च आय वाली 10 फीसदी आबादी निम्न आय वाली 10 फसदी आबादी में तुलना में 6 फीसदी ज्यादा थी जो 2011 में बढ़कर 12 फीसदी हो गई। एक तरफ दुनिया का नेतृत्व करने की महत्वाकांक्षा यानी विश्व गुरु बनने की इच्छा और दूसरी तरफ बड़ी आबादी आसमान के नीचे भूखे पेट सोने को मजबूर है। अब सवाल खड़ा होता है कि धर्म, जाति और संप्रदाय के नाम पर हंगामा करने वाली राजनितिक पार्टिया, विचारधारों के लिए आपस में लड़ने वाले कथित बुद्धिजीवी लोग इन विषम परिस्तिथियों को लेकर कोई हंगामा क्‍यों नहीं करते हैं?

इन तमाम बातों के बीच अहम सवाल यह उठता है कि आखिर क्यों धर्म और जाति की जगह भूख चर्चा का विषय नहीं हो सकती है? क्‍यों अमीरी-गरीबी की खाई को पाटने के लिए टीवी पर डिबेट नहीं होती है। यह अनदेखी केवल यही लोग नहीं करते जो देश का नेतृत्व करते है, बल्कि स्‍वयं रियाया क्यों इस मुफलिसी को अपना भाग्य मान बैठी है?

क्‍यों वो अपने अधिकार पाने के लिए विद्रोह नहीं करती है। कहा जाता है कि भारत के लोग दर्शन के आधार पर बड़ी से बड़ी समस्या को सह जाते हैं, पर हमें यह नही भूलना चाहिए सभ्य समाज के समानता को लोकतंत्र का आधार स्तम्भ माना जाता है, इसके बिना मजबूत लोकतंत्र की कल्पना करना बेमानी होगी।

पूर्ण बहुमत की सरकार का देश की बागडोर को संभालना भारत को राजनीतिक स्‍थिरता और मजबूती तो देता है, लेकिन अहम सवाल यह है कि क्‍या यह सरकार या कोई भी सरकार देश की बहुसंख्‍यक आबादी को अर्थव्‍यवस्‍था की मुख्‍यधारा में लाने का प्रयास करती है? केंद्र सरकार की आर्थिक वृद्धि की आंकड़ों की कहानी सिक्‍के का एक पहलू हो सकती है, लेकिन देश की अर्थव्‍यवस्‍था का यह भी एक पहलू है, एक असली तस्‍वीर है, जिसे मोदी सरकार को आने वाले तीन सालों में बिल्‍कुल भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, ताकि देश आने वाले तीन सालों में मजबूत और ठोस विकास के रास्‍ते पर चले।