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इंटरनेट सेवा में अब नहीं हो सकेगा भेदभाव

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नई दिल्ली । टेलीकॉम रेगुलेटर ट्राई ने मंगलवार को नेट न्यूट्रैलिटी के पक्ष में फैसला सुनाया। ट्राई पहले से ही इसके पक्ष में था, लेकिन अब इस फैसले को उसकी अंतिम मुहर माना जा रहा है। फैसले के अनुसार टेलीकॉम कंपनियों को सभी वेबसाइट और सेवा को एक समान स्पीड देनी होगी। वे किसी वेबसाइट की स्पीड घटा या बढ़ा नहीं सकेंगी। वहीं टेलीकॉम रेगुलेटर ने कई सुझाव भी दिए हैं।

ट्राई ने सेवा प्रदाताओं के उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया, जिसमें वे समझौते करके इंटरनेट के कंटेंट के साथ भेदभाव कर सकती थीं। ट्राई ने एक मल्टी स्टेक होल्डर बॉडी बनाने का सुझाव दिया है, जिसमें टेलीकॉम, इंटरनेट सेवा प्रदाता, कंटेंट प्रदाता, सामाजिक संगठन और उपभोक्ताओं के प्रतिनिधि शामिल होंगे, जो उल्लंघनों की जांच और निगरानी करेगा। ट्राई ने कहा कि सेवा प्रदाता किसी तरह का समझौता, व्यवस्था और अनुबंध नहीं करेंगे, जिससे इंटरनेट पर मौजूद किसी भी तरह की सामग्री के साथ कोई भेदभाव हो। साथ ही लाइसेंस रेगुलेशन में भी बदलाव का सुझाव दिया गया है।

पूरी दुनिया में हो रही बहस
ट्राई के सुझाव उस समय आए हैं, जब पूरी दुनिया में नेट न्यूट्रैलिटी पर बहस हो रही है। अमेरिकी रेगुलेटर फेडरल कम्युनिकेशन कमीशन ने हाल में कहा है कि उसकी योजना नेट न्यूट्रैलिटी को वापस लेने की है, जिसे 2015 में अमेरिका ने अपनाया था और इस साल दिसंबर में इस मुद्दे पर मतदान होगा।

उपभोक्ताओं को होगा फायदा
अगर ट्राई नेट न्यूट्रैलिटी का समर्थन नहीं करता तो टेलीकॉम कंपनियां उनसे किसी वेबसाइट के ज्यादा तो किसी के कम डेटा चार्ज वसूलतीं। इससे वाइस कॉलिंग जैसी सेवाएं महंगी होतीं।

कंपनियों को नुकसान होगा
वाट्सएप और स्काइप जैसी सेवाओं से टेलीकॉम कंपनियों की एसएमएस और कॉलिंग सेवा पर असर पड़ रहा है। नेट न्यूट्रैलिटी लागू होने से कंपनियां इन सेवाओं के ज्यादा चार्ज नहीं वसूल पाएंगी। इन्हीं कारणों से ट्राई का फैसला आने के बाद टेलीकॉम कंपनियों के शेयर गिर रहे हैं।

इंटरनेट कंटेंट भेदभाव का अर्थ
ट्राई के मुताबिक कंटेंट से भेदभाव का अर्थ है कि किसी सामग्री को अवरुद्ध करना, किसी की गति तेज, धीमी करना या किसी को तरजीह देना। नेट न्यूट्रैलिटी के समर्थकों का तर्क है कि पूरा इंटरनेट ट्रैफिक सभी के लिए बराबरी से एक जैसी की शर्त पर मौजूद होना चाहिए। सेवा प्रदाता अपने व्यवसाय के हिसाब से उनमें बदलाव न करें।

पिछले साल फरवरी से उठा मुद्दा
पिछले साल फरवरी में फेसबुक, इंटरनेट ओआरजी और एयरटेल जीरो ने कुछ वेबसाइटों को मुफ्त में चलाने की सुविधा दी थी। ट्राई ने कंपनियों को ऐसा करने से रोक दिया था। इसके बाद इस साल जनवरी में ट्राई ने परामर्श पत्र लाकर उपभोक्ताओं से नेट न्यूट्रैलिटी पर राय मांगी थी।

क्या है नेट न्यूट्रैलिटी
नेट न्यूट्रैलिटी (इंटरनेट तटस्थता) वह सिद्धांत है, जिसके तहत माना जाता है कि इंटरनेट सेवा प्रदाता या टेलीकॉम कंपनी को हर तरह के डाटा को एक जैसा दर्जा देना होगा। अलग-अलग वेबसाइट, सेवा या इंटरनेट कॉलिंग के लिए अलग कीमत नहीं वसूली जा सकती है। कंपनियां न किसी सेवा को प्रतिबंधित करें। न किसी की स्पीड घटाएं या बढ़ाएं। इसे यूं समझें कि अलग-अलग ब्रांड की कार से पेट्रोल की कीमत अलग नहीं वसूली जा सकती है।

कंपनियों का तर्क
व्हाट्सएप जैसी सेवाओं ने एसएमएस को काफी नुकसान पहुंचाया है। इससे टेलीकॉम कंपनियों का राजस्व कम हो रहा है। वहीं स्काइप जैसी सेवाओं की वजह से कॉलिंग प्रभावित हो रही है। कंपनियों का यह भी कहना है कि उन्होंने हजारों करोड़ खर्च कर अपना नेटवर्क तैयार किया। वाट्सएप जैसी कंपनियां मुफ्त में वॉयस कॉल की सुविधा देकर उनके नेटवर्क का मुफ्त में फायदा उठा रही हैं। एक तर्क यह भी है कि सरकार को मुक्त बाजार के कामकाज में दखल नहीं देना चाहिए।

एयरटेल के कदम के बाद हुई बहस
पिछले साल दिसंबर में एयरटेल ने कहा कि वह इंटरनेट कॉल के लिए थ्रीजी यूजर से दस केबी के चार पैसे या दो रुपये प्रति मिनट की दर से शुल्क वसूलेगा। इंटरनेट पर एक मिनट के कॉल में करीब 500 केबी डॉटा खर्च होता है। इसके बाद ट्राई ने स्काइप, वाइबर, व्हाटसएप, स्नैपचौट, फेसबुक मैसेंजर जैसी सुविधाओं से संबंधित बीस सवालों पर उपभोक्ताओं से राय मांगी।