udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news क्या यह चिंता की बात नहीं ?

क्या यह चिंता की बात नहीं ?

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देहरादून। मतदान के साथ ही अगले पांच सालों के लिए प्रदेश का भाग्य तय हो चुका है। लेकिन इस बार के मतदान से एक ऐसी महत्वपूर्ण बात निकलकर आई है जिस पर चर्चा करना बेहद जरूरी है। विचारहीन चुनाव से निकली इस बात को अगर हमारे नीति नियंता पकडऩे में कामयाब रहे तो राज्य के साथ ही उनके लिए भी यह बड़ी जीत होगी।

यूं तो इस बार प्रदेश में रिकार्डतोड़ मतदान हुआ है, जिसकी चारों तरफ सराहना भी हो रही है। होनी भी चाहिए, क्योंकि ज्यादा से ज्यादा मतदान लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत है। लेकिन इस रिकार्डतोड़ मतदान में विषमता का ऐसा आंकड़ा भी छुपा है, जो प्रदेश की एक बड़ी समस्या, पलायन की ओर हमारा ध्यान खींचता है। जरा गौर फरमाएं- एक तरफ प्रदेश के एक जिले उधमसिंह नगर में 76 प्रतिशत वोटिंग होती है और दूसरी तरफ एक जिला मात्र 53 फीसदी के आंकड़े पर सिमट जाता है।

क्या यह चिंता की बात नहीं ? इससे भी चिंता की बात यह है कि जिस जिले में सबसे कम मतदान हुआ वह मुख्यमंत्री हरीश रावत तथा नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट का गृह जिला अल्मोड़ा है। इसी तरह कम मतदान वाले अन्य जिलों की बात करें तो पिथौरागढ, पौड़ी, चमोली और टिहरी जिले में लगभग साठ फीसदी वोट पड़े। जब प्रदेश के बाकी जिलों में भारी भरकम मतदान हुआ हो तब इन जिलों में मतदान प्रतिशत कम रहना यही बताता है कि यह जागरूकता में कमी का नहीं बल्कि पलायन से जुड़ा प्रश्न है।

आने वाली सरकार, भले ही वो किसी भी दल की बने, के लिए यह बड़ी चुनौती है कि वह इस दिशा में सोचे। जिन जिलों में कम मतदान हुआ उनकी बात करें तो, ऐसा नहीं है कि वहां लोग वोट देने घरों से नहीं निकले, बल्कि वहां वोट इस लिए कम पड़े क्योंकि लोग गांवों में हैं ही नहीं। रोजगार की तलाश में वे अपने घरों से दूर हैं। दूसरी तरफ ज्यादा मतदान वाले जिलों की बात करें तो सबसे ज्यादा 76 फीसदी मतदान उधमसिंह नगर तथा हरिद्वार में 75 फीसदी मतदान हुआ।

इन जिलों में ज्यादा वोट पडऩे का सीधा संबंध यहां उपलब्ध रोजगार के अवसरों से है। राज्य गठन के बाद से अब तक रोजगार की दृष्टि से देखा जाए तो सबसे ज्यादा संभावनाएं इन दो जिलों में ही पैदा हुई हैं। इस तरह से देंखे तो इस मतदान ने सरकारों का सच भी खोला है। यह असमान मतदान इस बात का प्रमाण है कि सोलह सालों में प्रदेश में असंतुलित विकास ही हुआ।

जिन पहाड़ी जिलों में मतदान प्रतिशत कम रहा वे सरकार के एजेंडे में हाशिए पर रहे। इन जिलों की एक हकीकत यह भी है कि इनमें, अल्मोड़ा तथा पौड़ी में 35-35 हजार तथा चमोली में 18 हजार के लगभग घर खाली हो चुके हैं। ऐसा नहीं है कि सभी पहाड़ी जिलों में कम मतदान हुआ। उत्तरकाशी ऐसा जिला है जहां इस बार 73 प्रतिशत वोटिंग हुई। उत्तरकाशी प्रदेश का ऐसा पहाड़ी जिला है जहां कृषि औद्योगिकी के क्षेत्र में लोगों ने खूब तरक्की की है।

यही वजह है कि इस जिले से बाकी जिलों के मुकाबले कम पलायन होता है। ऐसे में आने वाली सरकार को इस दिशा में सोचने की जरूरत है।इस मतदान में एक बड़ा ‘मंत्र छुपा है। मंत्र यह कि सरकार को क्षेत्र विशेष के बजाय राज्य के समग्र विकास के लिए काम करना होगा। बढे हुए मतदान पर खुश होने के साथ ही इस संकट की तरफ यदि समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो, पहाड़ी राज्य की अवधारणा ही खतरे में आ जाएगी।