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‘ज्योतिर्मठ’ : 160 से भी अधिक वर्ष तक रहा था बिना शंकराचार्य के !

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अब फिर से ज्योतिर्मठ की शिथिल परम्परा एवं शंकराचार्य के अधिकार की समस्या का मूल

ब्रह्मलीन हुये शंकराचार्य माधवाश्रम महाराज के न रहने पर अब कौन होगा उनका उत्तराधिकारी !

करोड़ों मूल्य के आश्रमों , विध्यालयों का क्या होगा !ऋषिकेश आश्रम का कौन करेगा अब संरक्षण!

संतोष *सप्तॉशु*/राजेश बेंजवाल
उदय दिनमान डेस्कः ‘ज्योतिर्मठ’ : 160 से भी अधिक वर्ष तक रहा था बिना शंकराचार्य के !आपको यह जानकर अजीब लग रहा होगा, लेकिन यह सत्य है और इस इतिहास के बारे में अधिसंख्य विद्धान जानते है। अब ‘ज्योतिर्मठ’ के शंकराचार्य स्वामी माध्वाश्राम जी महाराज ब्रहमलीन हो गए तो फिर यह प्रश्न सभी के मन में कौंध रहा होगा कि कही फिर से यह मठ राजनीति का शिकार न हो जा जो धर्म की राह में सबसे बडा काटा होगा।’ज्योतिर्मठ’ के शंकराचार्य स्वामी माध्वाश्राम जी महाराज ब्रहमलीन होने के बाद सभी के मन में यह प्रश्न कौंध रहे होंगे कि कहीं यह मठ फिर से शंकराचार्य विहीन न रह जाए!ब्रह्मलीन हुये शंकराचार्य माधवाश्रम महाराज के न रहने पर अब कौन होगा उनका उत्तराधिकारी !करोड़ों रुपये मूल्य के आश्रमों , विध्यालयों का क्या होगा !ऋषिकेश दंडीवाडा  आश्रम का कौन करेगा अब संरक्षण!के साथ-साथ यह भी कि कहीं इस मठ पर राजनीति के कौंवों की नजर न पड जाए और अगर ऐसा होता है तो फिर…।

 

चलिए पहले आपको बताते हैं कि आदि शंकराचार्य अपने 109 शिष्यों के साथ जोशीमठ आये तथा अपने चार पसंदीदा एवं सर्वाधिक विद्वान शिष्यों को चार मठों की गद्दी पर आसीन कर दिया, जिसे उन्होंने देश के चार कोनों में स्थापित किया था। उनके शिष्य ट्रोटकाचार्य इस प्रकार ज्योतिर्मठ के प्रथम शंकराचार्य हुए। जोशीमठ वासियों में से कई उस समय के अपने पूर्वजों की संतान मानते हैं जब दक्षिण भारत से कई नंबूद्रि ब्राह्मण परिवार यहां आकर बस गए तथा यहां के लोगों के साथ शादी-विवाह रचा लिया। जोशीमठ के लोग परंपरागत तौर से पुजारी और साधु थे जो बहुसंख्यक प्राचीन एवं उपास्य मंदिरों में कार्यरत थे तथा वेदों एवं संस्कृत के विद्वान थे। नरसिंह और वासुदेव मंदिरों के पुजारी परंपरागत डिमरी लोग हैं। यह सदियों पहले कर्नाटक के एक गांव से जोशीमठ पहुंचे। उन्हें जोशीमठ के मंदिरों में पुजारी और बद्रीनाथ के मंदिरों में सहायक पुजारी का अधिकार सदियों पहले गढ़वाल के राजा द्वारा दिया गया। वह गढ़वाल के सरोला समूह के ब्राह्मणों में से है। शहर की बद्रीनाथ से निकटता के कारण यह सुनिश्चित है कि वर्ष में 6 महीने रावल एवं अन्य बद्री मंदिर के कर्मचारी जोशीमठ में ही रहें। आज भी यह परंपरा जारी है।

 

इतिहास दर्शाता है कि 160-70 साल पहले बद्रीनाथ जी से आय नहीं के बराबर होती ​​​थी। जो क्षेत्रिय लोगों से आमदानी होती ​थी उससे ही बद्रीनाथजी के खर्च का निरवाह होता था एवं बचे हुए पैसों से ज्योतिर्मठ मठ चलता था। बाद में टिहरी के राजा एवं बद्रीनाथ के पुजारियों में गठ बन्धन हो गया एवं जो अतिरिक्त राशि बचती थी वह दोनों में बंट जाता था एवं मठ को पैसा मिलना बन्द हो गया। अत: मठ चलाना सम्भव न होने से शंकराचार्य जी ने ज्योतिर्मठ का त्याग कर गुजरात जाकर परम्परा का निर्वाह करना शुरू कर दिया। इस प्राकर ज्योतिर्मठ की परम्परा शिथिल हो गयी।

 

160 से भी अधिक वर्ष से ‘ज्योतिर्मठ’ में कोई धर्मार्चार्य नहीं हुये। अत: यहां की परम्परा लुप्त हो गयी। इतने समय तक उत्तर में शंकराचार्य परम्परा लुप्त होने से उत्तर में वैदिक परम्पराऐं भी उच्छिन्न होने लगी। जब कोई परम्परा लुप्त हो जाती है तो उसको पुन: उज्जीवित करने की विधा सार्वभौमिक नहीं होती। ज्योतिर्मठ का नाम तो बना रहा, किन्तु उसके स्थान एवं उसके चिह्न आदि सर्वथा नष्ट हो गये। उस समय भारत धर्म महामण्डल ने यह सोचकर कि एक पीठ की परम्परा लुप्त हो जाये यह उचित नहीं। पुन: वैदिक धर्म का प्रचार प्रसार हो सके इस उद्देश्य से ज्योतिर्मठ, जो कि जीमोंदोज था, उसे प्रयास करके खोजा गया।

 

पुन: इस परम्परा को उज्जीवित करने के लिए करपात्री महाराज जी से शंकराचार्य बनने का अनुरोध किया गया। करपात्री महाराज ने स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी का नाम सुझाया। इस प्रकार स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज को सब प्रकार से सुयोग्य और समर्थ जानकर उन्हें शङ्कराचार्य के पद पर सन् 1941 में अभिषिक्त किया और उन्हीं पर पीठ के पुनरुद्धार का महान् कार्य सौंपा गया। उस समय ब्रह्मानन्द सरस्वती जी को वहां अधिष्ठित करने के लिए जो विधा अपनायी गयी उस पर आक्षेप किये जा सकते हैं क्योंकि लुप्त हो गयी परम्परा को उज्जीवित करने की विधा सार्वभौमिक नहीं होती। आक्षेप भारत धर्म महामण्डल पर भी है कि क्यो वो शंकराचार्य चुनने के लिए अधिकृत है? आक्षेप यह भी है क्या यह एक स्वस्थ परम्परा मानी जायेगी? शंकराचार्य जो कि गुजरात चले गये थे, उनकी परम्परा के आगे के शिष्यों ने भी अपना मठ पर उत्तराधिकार बताना शुरू कर दिया। इस प्रकार इस पीठ के अधिकार को लेकर समस्याऐं उत्पन्न होने लगी।

 

उल्लेखनीय है कि जोशीमठ उत्तराखण्ड राज्य में स्थित एक नगर है। यहां ८वीं सदी में धर्मसुधारक आदि शंकराचार्य को ज्ञान प्राप्त हुआ और बद्रीनाथ मंदिर तथा देश के विभिन्न कोनों में तीन और मठों की स्थापना से पहले यहीं उन्होंने प्रथम मठ की स्थापना की। जाड़े के समय इस शहर में बद्रीनाथ की गद्दी विराजित होती है जहां नरसिंह के सुंदर एवं पुराने मंदिर में इसकी पूजा की जाती है। बद्रीनाथ, औली तथा नीति घाटी के सान्निध्य के कारण जोशीमठ एक महत्त्वपूर्ण पर्यटन स्थल बन गया है तथा अध्यात्म एवं साहसिकता का इसका मिश्रण यात्रियों के लिए वर्षभर उत्तेजना स्थल बना रहता है।

 

जोशीमठ में आध्यात्मिता की जड़े गहरी है तथा यहां की संस्कृति भगवान विष्णु की पौराणिकता के इर्द-गिर्द बनी है। प्राचीन नरसिंह मंदिर जो उन्हे समर्पित है – उन्हे नमन तथा उनकी लोकप्रियता को दर्षाती है – लोगों का सालोंभर यहां लगातार आना रहता है। ऐतिहासिक तौर पर, जोशीमठ सदियों से वैदिक शिक्षा तथा ज्ञान का एक ऐसा केन्द्र जिसकी स्थापना 8वीं सदी में आदी शंकराचार्य ने की थी। यहां शहर की परिवेश तथा जलवायु निश्चित रूप से धार्मिक मान्यताओं से अधिकांशतः प्राचीन तथा पूजित स्थल हैं। पांडुकेश्वर में पाये गये कत्यूरी राजा ललितशूर के तांब्रपत्र के अनुसार जोशीमठ कत्यूरी राजाओं की राजधानी थी, जिसका उस समय का नाम कार्तिकेयपुर था। लगता है कि एक क्षत्रिय सेनापति कंटुरा वासुदेव ने गढ़वाल की उत्तरी सीमा पर अपना शासन स्थापित किया तथा जोशीमठ में अपनी राजधानी बसायी।

 

वासुदेव कत्यूरी ही कत्यूरी वंश का संस्थापक था। जिसने 7वीं से 11वीं सदी के बीच कुमाऊं एवं गढ़वाल पर शासन किया।फिर भी हिंदुओं के लिये एक धार्मिक स्थल की प्रधानता के रूप में जोशीमठ, आदि शंकराचार्य की संबद्धता के कारण मान्य हुआ। जोशीमठ शब्द ज्योतिर्मठ शब्द का अपभ्रंश रूप है जिसे कभी-कभी ज्योतिषपीठ भी कहते हैं। इसे वर्तमान 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य ने स्थापित किया था। उन्होंने यहां एक शहतूत के पेड़ के नीचे तप किया और यहीं उन्हें ज्योति या ज्ञान की प्राप्ति हुई। यहीं उन्होंने शंकर भाष्य की रचना की जो सनातन धर्म के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है।

 

मंदिरों के हर प्राचीन शहर की तरह जोशीमठ भी ज्ञान पीठ है जहां आदि शंकराचार्य ने भारत के उत्तरी कोने के चार मठों में से पहला की स्थापना की। इस शहर को ज्योतिमठ भी कहा जाता है तथा इसकी मान्यता ज्योतिष केंद्र के रूप में भी है। संपूर्ण देश से यहां पुजारियों, साधुओं एवं संतों का आगमन होता रहा तथा पुराने समय में कई आकर यहीं बस गये। बद्रीनाथ मंदिर जाते हुए तीर्थयात्री भी यहां विश्राम करते थे। वास्तव में तब यह मान्यता थी कि बद्रीनाथ की यात्रा तब तक अपूर्ण रहती है जब तक जोशीमठ जाकर नरसिंह मंदिर में पूजा न की जाए।आदि शंकराचार्य द्वारा बद्रीनाथ मंदिर की स्थापना तथा वहां नम्बूद्रि पुजारियों को बिठाने के समय से ही जोशीमठ बद्रीनाथ के जाड़े का स्थान रहा है और आज भी वह जारी है।

 

जाड़े के 6 महीनों के दौरान जब बद्रीनाथ मंदिर बर्फ से ढंका होता है तब भगवान विष्णु की पूजा जोशीमठ के नरसिंह मंदिर में ही होती है। बद्रीनाथ के रावल मंदिर कर्मचारियों के साथ जाड़े में जोशीमठ में ही तब तक रहते हैं, जब कि मंदिर का कपाट जाड़े के बाद नहीं खुल जाता।जोशीमठ एक परंपरागत व्यापारिक शहर है और जब तिब्बत के साथ व्यापार चरमोत्कर्ष पर था तब भोटिया लोग अपना सामान यहां आकर बिक्री करते थे एवं आवश्यक अन्य सामग्री खरीदकर तिब्बत वापस जाते थे। वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद यह व्यापारिक कार्य बंद हो गया और कई भोटिया लोगों ने जोशीमठ तथा इसके इर्द-गिर्द के इलाकों में बस जाना पसंद किया।

 

 

कहा जाता है कि 8वीं सदीं में सनातन धर्म का पुनरूद्धार करने आदि शंकराचार्य जब उत्तराखंड आये थे तो उन्होंने इसी शहतूत पेड़ के नीचे जोशीमठ में पूजा की थी। यहां उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई। कहा जाता है कि उन्होंने राज-राजेश्वरी को अपना ईष्ट देवी माना था और इसी पेड़ के नीचे देवी उनके सम्मुख एक ज्योति या प्रकाश के रूप में प्रकट हुई तथा उन्हें बद्रीनाथ में भगवान विष्णु की मूर्ति को पुनर्स्थापित करने की शक्ति तथा सामर्थ्य प्रदान किया। जोशीमठ, ज्योतिर्मठ का बिगड़ा स्वरूप है, जो इस घटना से संबद्ध है।अब यह पेड़ 300 वर्ष पुराना है तथा इसके तने 36 मीटर में फैले हैं। यह भी कहा जाता है कि यह पेड़ वर्षभर हरा-भरा रहता है एवं इससे पत्ते कभी नहीं झड़ते। पेड़ के ठीक नीचे आदि शंकराचार्य की गुफा है तथा इसमें आदि गुरू की एक मानवाकार मूर्ति स्थापित है।

ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य श्रीस्वामी माधवाश्रमजी महाराज ब्रहमलीन हो गए हैं उन्होंने चंडीगढ में अंतिम सांस ली।इनका लंबे समय से स्वास्थ्य खराब चल रहा था।

 कौन होगा उत्तराधिकारी  (वरिष्ठ पत्रकार क्रांति भटृट जी की वाल से साभा.)
स्वंय को जीवन भर दो जोडी भगवा वस्त्र ( धोती . लंगोटी ) कंमडल और दंड धारण किये ब्रह्मलीन हुये शंकराचार्य माधवाश्रम महाराज के न रहने पर अब कौन होगा उनका उत्तराधिकारी !  शंकराचार्य पद्धति के अनुसार इस पद्धति और पद और प्रतिष्ठा रखने वाला ” ज्ञानी , संयमी , तपस्वी दंडी स्वामी कौन होगा जो महाराज माधवाश्रम का स्थान लेगा ! ।


अपने लिये तो महाराज साधक और तपस्वी का निर्लिप्त जीवन जिये । मगर समाज और वैदिक परम्परा को अक्षुण रखने के लिए जो आश्रम महाराज ने भिक्षा , दान / दानी लोगों की सहायता से स्थापित किये जो करोड़ों रुपये मूल्य के हैं । उनका अब क्या होगा ! विभिन्न स्थानों पर जो संस्कृ विध्यालय महाराज ने बनाये हैं अन्य विध्यालय बनाये हैं संचालित हो रहे हैं उनका अब क्या होगा !


कौन करेगा इनका निस्वार्थ संचालन और ” निर्लिप्त सम्पादन ।जोशीमठ मठांगन में करोड़ों की रुपये मूल्य के बने आश्रम पर कौन बिराजित होगा । कौन करेगा इसकी योग्य देख रेख । यहाँ वने भगवती पराम्भा की पूजा पद्धति को कौन सम्भालेगा । पूर्व में यह ” रावल निवास ” था । बदरी नाथ के पूर्व रावलों के वंशजों का निवास था ।

 

दिंवगत शंकराचार्य माधवाश्रम महाराज ने भिक्षा , दान और दानियों के सहयोग से इसे इस लिये खरीद कर भब्य रुप दिया । महाराज के रहते यहाँ पर बदरी आने वाले साधु संत रुकते थे । भोजन गृहण करते थे । यात्री भी रुकते थे । इस आश्रम में समय समय पर कथा , पुराण , यज्ञ , वेदिक धर्म पर चर्चा वार्ता होती रहती थी महाराज के जीवित रहते , अनुष्ठान हुआ करते थे ।

 

अब उनका क्या होगा । किसी और की तो नहीं है इस नजर । महाराज दो वर्षों तक अस्वस्थ रहे । वाणी अवरुद्ध हो गयी थी । बाद मेः भौतिक काया भी सक्षम नही थी । क्या सरल हृदय के महाराज शंकराचार्य की इस स्थिति में उनके संरक्षण में जुटी संम्पति को ” किन्ही मस्तिष्कों की चौकडी ” ने कुछ रुप देकर नया शगल तो नहीं दे दिया । महाराज के हस्ताक्षर करा के ।


दिल्ली के संस्कृत विध्यालय का क्या होगा जो महाराज के संरक्षण मे बना और आज भी चल रहा है । विध्यार्थी संस्कृति ज्ञान अर्जित कर रहे हैं । लुधियाना के संस्कृत विध्यालय को अब किसका आशीर्वाद और संरक्षण मिलेगा । हालांकि इस महाविद्यालय को विगत कई वर्षों से एक योग्य ब्रह्मचारी और संस्कृत के उदभट विद्वान संचालित कर कर रहे हैं वे ही प्रधानाचार्य भी हैं । पर मूल संरक्षण तो महाराज माधवाश्रम जी का ही था । अब उसका क्या होगा ।


महाराज माधवाश्रम ने रुद्रप्रयाग में एम्स की शैली में एक बडा अस्पताल बनाया है । अब कौन चलायेगा इसे ।दिल्ली सिविल लाईन में धर्म संघ का जो आश्रम है । जिसमे महाराज दिल्ली प्रवास के दौरान रहते थे। जो अखिल भारतीय ” धर्म संघ ” का है । महाराज माधवाश्रम जी धर्म संघ के अध्यक्ष भी थे । वर्तमान में अरबों की भूभि और भवन का अब क्या होगा ।हिमांचल कन्ना घाट के आश्रम का क्या होगा !
ऋषिकेश दंडीवाडा ” आश्रम का कौन करेगा अब संरक्षण । जहां पर महाराज ने भू समाधी ली ।


” स्वंय को तो महाराज एक निर्लिप्त , निष्काम योगी तपस्वी की तरह रहे ये संसाधन उनके प्रभा मंडल से जुटे पर अब क्या होगा .! कहीं कुछ सीमित लोगों के हाथ में न चली जाय ले वो सम्पति और पद जो समाज के लिए , धर्म कू लिए , शिक्षा के लिए , वैदिक परम्परा कै अक्षुण रखने के लिए महाराज ने जुटाये ।

 

इस आलेख के लिए विभिन्न वाल और साइटों से अंश साभार लिए गए हैं।