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ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य श्रीस्वामी माधवाश्रमजी महाराज ब्रहमलीन

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उदय दिनमान डेस्कः विद्वान संत, धर्म के मर्मज्ञ और बदरीकाश्रम ज्योतिर्पीठाधीश्वर माधवाश्रम जी महाराज वेद, धर्म के विद्वान होने के साथ ही जनसरोकारों से जुडे ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य श्रीस्वामी माधवाश्रमजी महाराज ब्रहमलीन हो गए हैं उन्होंने चंडीगढ में अंतिम सांस ली।इनका लंबे समय से स्वास्थ्य खराब चल रहा था।

 

आपको बता दें कि ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य श्रीस्वामी माधवाश्रमजी महाराजलंबे समय से बीमार चल रहे थे आजकल चंडीगढ प्रवास पर थे और चंडीगढ में ही उन्होंने अंतिम सांस ली। बताया जा रहा है कि वह लंबे समय से बीमार थे और स्वास्थ्य जांच के लिए चिकित्सको से परामर्श भी ले रहे थे। उनके ब्रहमलीन होने से समाज को काफी छति पहुची है।

 

भगवती पराम्बा के परमोपासक उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य श्रीस्वामी माधवाश्रमजी महाराज आज (20 अक्टूबर 2017) प्रातःकाल में भगवती के परमधाम के लिए गमन कर चुके हैं। कल (21 अक्टूबर 2017) दोपहर 12:00 बजे मायाकुण्ड (ॠषिकेश) स्थित ‘दण्डीवाड़ा — श्रीजनार्दन आश्रम’ में श्रीमहाराज के पार्थिवदेह को जलसमाधि दी जाएगी।

 

शंकराचार्य स्वामी माधवाश्रम जी महाराज भारत के उत्तरांचल राज्य में बद्रीनाथ तीर्थ के समीप जोशीमठ तीर्थ स्थित ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य हैं। यह आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठों में से एक है। स्वामी जी उत्तराखण्ड क्षेत्र से शंकरारार्य के पद पर सुशोभित होने वाले पहले संन्यासी थे। वे अखिल भारतीय धर्म संघ समेत विभिन्न धार्मिक संस्थाओं के अघ्यक्ष एवं सदस्य हैं।

 

स्वामी माधवाश्लम का जन्म उत्तरांचल के रुद्रप्रयाग जिले के अन्तर्गत बेंजी ग्राम में हुआ था। इनका मूल नाम केशवानन्द था। आरम्भिक विद्यालयी शिक्षा के पश्चात इन्होंने हरिद्वार, अम्बाला में सनातन धर्म संस्कृत कॉलेज, वृंदावन में बंशीवट में श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी के आश्रम एवं वाराणसीसमेत देश के विभिन्न स्थानों पर वेदों एवं धर्मशास्त्रों की दीक्षा ली।

 

विवाह के उपरान्त कुछ वर्ष पश्चात इन्होंने संन्यास ग्रहण किया। इनकी विद्वता को देखते हुए धर्म संघ के तत्वाधान में धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी के आशीर्वाद से जगन्नाथ पुरीपीठ के तत्कालीन शंकराचार्य स्वामी निरंजनदेव तीर्थ जी ने इन्हें ज्योतिष्पीठ का शंकराचार्य नियुक्त किया। तब से वे इस परम्परा का बखूबी पालन कर रहे थे। स्वामी जी धर्मप्रचार एवं गौहत्या विरोधी विभिन्न आंदोलनों एवं संगठनों से जुड़े थे।

 

73 वर्षीय विद्वान संत, धर्म के मर्मज्ञ और बदरीकाश्रम ज्योतिर्पीठाधीश्वर माधवाश्रम जी महाराज वेद, धर्म के विद्वान होने के साथ ही जनसरोकारों से जुडे संत हैं। उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन, शराबबन्दी आनदोलन और गैरसैंण राजधानी आन्दोलन में प्रत्यक्ष भाागीदारी करते रहे हैं। पिछले दिनों बे्रन हैमरेज के चलते उन्हें पीजीआई चंडीगढ में उपचार दिया गया था, जहां से महाराज जी ने कोटेश्वर आश्रम आने की इच्छा जताई थी।

 

शिवावतार श्रीमज्जगदगुरु आदि शंकराचार्य अद्वैत वेदांत के प्रणेता

शिवावतार श्रीमज्जगदगुरु आदि शंकराचार्य अद्वैत वेदांत के प्रणेता थे। उनके विचारोपदेश आत्मा और परमात्मा की एकरूपता पर आधारित हैं जिसके अनुसार परमात्मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण दोनों ही स्वरूपों में रहता है। स्मार्त संप्रदाय में आदि शंकराचार्य को शिव का अवतार माना जाता है। इन्होंने ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, बृहदारण्यक और छान्दोग्योपनिषद् पर भाष्य लिखा। वेदों में लिखे ज्ञान को एकमात्र ईश्वर को संबोधित समझा और उसका प्रचार तथा वार्ता पूरे भारत में की। उस समय वेदों की समझ के बारे में मतभेद होने पर उत्पन्न चार्वाक, जैन और बौद्धमतों को शास्त्रार्थों द्वारा खण्डित किया और भारत में चार कोनों पर ज्योति, गोवर्धन, श्रृंगेरी एवं द्वारिका आदि चार मठों की स्थापना की।

 

 

कलियुग के प्रथम चरण में विलुप्त तथा विकृत वैदिक ज्ञानविज्ञान को उद्भासित और विशुद्ध कर वैदिक वांगमय को दार्शनिक ,व्यावहारिक , वैज्ञानिक धरातल पर समृद्ध करने वाले एवं राजर्षि सुधन्वा को सार्वभौम सम्राट ख्यापित करने वाले चतुराम्नाय-चतुष्पीठ संस्थापक नित्य तथा नैमित्तिक युग्मावतार श्रीशिवस्वरुप भगवत्पाद शंकराचार्य की अमोघदृष्टि तथा अद्भुत कृति सर्वथा स्तुत्य है ।कलियुग की अपेक्षा त्रेता में तथा त्रेता की अपेक्षा द्वापर में , द्वापर की अपेक्षा कलि में मनुष्यों की प्रज्ञाशक्ति तथा प्राणशक्ति एवं धर्म औेर आध्यात्म का ह्रास सुनिश्चित है । यही कारण है कि कृतयुग में शिवावतार भगवान दक्षिणामूर्ति ने केवल मौन व्याख्यान से शिष्यों के संशयों का निवारण किय‍ा ।

 

 

त्रेता में नारायण अवतार भगवान दत्तात्रेय ने सूत्रात्मक वाक्यों के द्वारा अनुगतों का उद्धार किया । द्वापर में नारायणावतार भगवान कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने वेदों का विभाग कर महाभारत तथा पुराणादि की एवं ब्रह्मसूत्रों की संरचनाकर एवं शुक लोमहर्षणादि कथाव्यासों को प्रशिक्षितकर धर्म तथा अध्यात्म को उज्जीवित रखा । कलियुग में भगवत्पाद श्री शिवावतार शंकराचार्य ने भाष्य , प्रकरण तथा स्तोत्रग्रन्थों की संरचना कर , विधर्मियों-पन्थायियों एवं मीमांसकादि से शास्त्रार्थ , परकायप्रवेशकर , नारदकुण्ड से अर्चाविग्रह श्री बदरीनाथ एवं भूगर्भ से अर्चाविग्रह श्रीजगन्नाथ दारुब्रह्म को प्रकटकर तथा प्रस्थापित कर , सुधन्वा सार्वभौम को राजसिंहासन समर्पित कर एवं चतुराम्नाय – चतुष्पीठों की स्थापना कर अहर्निश अथक परिश्रम के द्वारा धर्म और आध्यात्म को उज्जीवित तथा प्रतिष्ठित किया ।

 

अपने अधिकार क्षेत्र मे परिभ्रमण का उपदेश दिया

व्यासपीठ के पोषक राजपीठ के परिपालक धर्माचार्यों को श्रीभगवत्पाद ने नीतिशास्त्र , कुलाचार तथा श्रौत-स्मार्त कर्म , उपासना तथा ज्ञानकाण्ड के यथायोग्य प्रचार-प्रसार की भावना से अपने अधिकार क्षेत्र मे परिभ्रमण का उपदेश दिया । उन्होंने धर्मराज्य की स्थापना के लिये व्यासपीठ तथा राजपीठ मे सद्भावपूर्ण सम्वाद के माध्यम से सामञ्जस्य बनाये रखने की प्रेरणा प्रदान की । ब्रह्मतेज तथा क्षात्रबल के साहचर्य से सर्वसुमंगल कालयोग की सिद्धि को सुनिश्चित मानकर कालगर्भित तथा कालातीतदर्शी आचार्य शंकर ने व्यासपीठ तथा राजपीठ का शोधनकर दोनों में सैद्धान्तिक सामञ्जस्य साधा ।

 

भारतीय संस्कृति के विकास एवं संरक्षण में आद्य शंकराचार्य का विशेष योगदान रहा है। आचार्य शंकर का जन्म पश्चिम के इतिहासकार समुदाय के द्वारा वैशाख शुक्ल पंचमी तिथि ई. सन् ७८८ को तथा मोक्ष ई. सन् ८२० स्वीकार किया जाता है, परंतु महाराज सुधन्वा चौहान, जो कि शंकर के समकालीन थे, उनके ताम्रपत्र अभिलेख में शंकर का जन्म युधिष्ठिराब्द २६३१ शक् (५०७ ई०पू०) तथा शिवलोक गमन युधिष्ठिराब्द २६६३ शक् (४७५ ई०पू०) सर्वमान्य है। इसके प्रमाण सभी शांकर मठों में मिलते हैं।

 

आदिशङ्कराचार्य जी ने जो चार पीठ स्थापित किये,उनके काल निर्धारण में उत्थापित की गई भ्रांतियाँ–

1. उत्तर दिशा में बदरिकाश्रममें ज्योतिर्पीठ … स्थापना-युधिष्ठिर संवत् (Y.S.) 2641-2645 2. पश्चिम में द्वारिकाशारदा पीठ- यु.सं.(Y.S.) 2648 3.दक्षिण शृङ्गेरीपीठ- 2648 Y.S. 4. पूर्व दिशा जगन्नाथपुरीगोवर्द्धन पीठ2655 Y.S. आदिशंकर जी अंतिम दिनों में कांची कामकोटि पीठ2658 यु.सं. में निवास कर रहे थे । शारदा पीठमें लिखा है – “युधिष्ठिर शके 2631 वैशाखशुक्लापञ्चम्यां श्रीमच्ठछङ्करावतार: | ……तदनु 2663 कार्तिकशुक्लपूर्णिमायां ……श्रीमच्छंकरभगवत्पूज्यपादा…… निजदेहेनैव…… निजधाम प्राविशन्निति । अर्थात् युधिष्ठिर संवत् 2631 में वैशाखमासके शुक्ल पक्ष की पञ्चमी तिथि को श्रीशंकराचार्य का जन्म हुआ और युधि. सं.2663 कार्तिकशुक्ल पूर्णिमा को देहत्याग हुआ | [युधिष्ठिर संवत् 3139 B.C. में प्रवर्तित हुआ था] राजा सुधन्वा के ताम्रपत्र का लेख द्वारिकापीठके एक आचार्य ने “विमर्श” नामक ग्रन्थ में प्रकाशित किया है — ‘निखिलयोगिचक्रवर्त्ती श्रीमच्छंकरभगवत्पादपद्मयोर्भ्र मरायमाणसुधन्वनो मम सोमवंशचूडामणियुधिष्ठिरपारम्पर् यपरिप्राप्तभारतवर्षस्याञ्जलिबद्धपूर्वकेयं राजन्यस्य विज्ञप्ति:………युधिष्ठिरशके 2663 आश्विन शुक्ल 15 |

 

एक ं अन्य ताम्रपत्र संस्कृतचंद्रिका (कोल्हापुर) के खण्ड 14, संख्या 2-3 में प्रकाशित हुआ था। उसके अनुसारगुजरातके राजा सर्वजित् वर्मा ने द्वारिकाशारदापीठ के प्रथम आचार्य श्री सुरेश्वराचार्य (पूर्व नाम-मंडनमिश्र) से लेकर 29वें आचार्य श्री नृसिंहाश्रम तक सभी आचार्योंके विवरणहैं । इसमें प्रथम आचार्य का समय 2649 युधि. सं. दिया है । सर्वज्ञसदाशिवकृत “पुण्यश्लोकमञ्जरी” आत्मबोध द्वारारचित”गुरुरत्नमालिका” तथा उसकी टीका “सुषमा”में कुछ श्लोक हैं । उनमें एक श्लोक इस प्रकार है- तिष्ये प्रयात्यनलशेवधिबाणनेत्रे, ये नन्दने दिनमणावुदगध्वभाजि | रात्रोदितेरुडुविनिर्गतमंगलग्नेत्याहूतवान् शिवगुरु: स च शंकरेति।। अर्थ- अनल=3 , शेवधि=निधि=9, बाण=5,नेत्र=2 , अर्थात् 3952 | ‘अंकानां वामतोगति:’ इस नियमसे अंक विपरीत क्रम से रखने पर 2593 कलिसंवत् बना| [कलिसंवत् 3102 B.C. में प्रारम्भ हुआ ] तदनुसार 3102-2593=509 BC में शंकराचार्य जीकाजन्म वर्ष निश्चित होता है।

 

कुमारिल भट्ट जो कि शंकराचार्यके समकालीन थे , जैनग्रंथ जिनविजय में लिखा है – ऋषिर्वारस्तथा पूर्ण मर्त्याक्षौ वाममेलनात् । एकीकृत्य लभेताङ्क:क्रोधीस्यात्तत्र वत्सर: ।। भट्टाचार्यस्य कुमारस्य कर्मकाण्डैकवादिन: । ज्ञेय: प्रादुर्भवस्तस्मिन् वर्षे यौधिष्ठिरे शके।। जैन लोग युधिष्ठिरसंवत् को468 कलिसंवत् से प्रारम्भ हुआ मानतेहैं । श्लोकार्थ- ऋषि=7,वार=7,पूर्ण=0, मर्त्याक्षौ=2, 7702 अंकानांवामतोगति” 2077 युधिष्ठिर संवत् आया अर्थात् 557 B.C. कुमारिल 48 वर्ष बड़े थे => 509 B.C. श्रीशंकराचार्य जीकाजन्म वर्ष सिद्ध होता है । “जिनविजय” में शंकराचार्यजीके देहावसान के विषयमें लिखा है — ऋषिर्बाणस्तथा भूमिर्मर्त्याक्षौ वांममेलनात् | एकत्वेन लभेताङ्कस्ताम्राक्षस्तत्र वत्सर: || 2157 यु. सं. (जैन) 476 B.C. में आचार्यशंकर ब्रह्मलीन हुए ! बृहत्शङ्करविजय में चित्सुखाचार्य (शंकराचार्य जीके सह अध्यायी)ने लिखा है– षड्विंशकेशतके श्रीमद् युधिष्ठिरशकस्य वै। एकत्रिंशेऽथ वर्षेतु हायने नन्दने शुभे ।।

 

प्रासूत तन्वंसाध्वी गिरिजेव षडाननम्।। यहाँ युधिष्ठिर शक 2631 मे अर्थात् 508 ई. पू. में आचार्य का जन्म संवत् बताया गयाहै । वर्तमान इतिहासज्ञ जिन शंकराचार्यको 788 – 820 A.D. का बताते हैं वे वस्तुत: कामकोटि पीठके 38वें आचार्य श्री अभिनवशंकर जी थे | वे 787 से 840 ईसवीसन् तक विद्यमान थे | वे चिदम्बरम वासी श्रीविश्वजी के पुत्र थे । इन्होंने कश्मीर के वाक्पतिभट को शास्त्रार्थ में पराजित किया और 30 वर्ष तक मठ के आचार्य पद पर रहे। सभी सनातन धर्मावलम्बियों को अपनें मूल आचार्य के विषय में ज्ञान होना चाहिए । इस विषय में यह ध्यातव्य है कि पुरी के पूज्य वर्तमान शंकराचार्य जी ने सभी प्रमाणभूत साक्ष्यों को भारत सरकार को सौंपकर उन प्रमाणों के आलोक में ऐतिहासिक अभिलेखों में संशोधन का आग्रह भी किया है!

 

शिव गुरु तैत्तिरीय शाखा के यजुर्वेदी ब्राह्मण

शंकर दिग्विजय, शंकरविजयविलास, शंकरजय आदि ग्रन्थों में उनके जीवन से सम्बन्धित तथ्य उद्घाटित होते हैं। दक्षिण भारत के केरल राज्य (तत्कालीन मालाबारप्रांत) में आद्य शंकराचार्य जी का जन्म हुआ था। उनके पिता शिव गुरु तैत्तिरीय शाखा के यजुर्वेदी ब्राह्मण थे। भारतीय प्राच्य परम्परा में आद्यशंकराचार्य को शिव का अवतार स्वीकार किया जाता है। कुछ उनके जीवन के चमत्कारिक तथ्य सामने आते हैं, जिससे प्रतीत होता है कि वास्तव में आद्य शंकराचार्य शिव के अवतार थे।

 

आठ वर्ष की अवस्था में श्रीगोविन्दपाद के शिष्यत्व को ग्रहण कर संन्यासी हो जाना, पुन: वाराणसी से होते हुए बद्रिकाश्रम तक की पैदल यात्रा करना, सोलह वर्ष की अवस्था में बद्रीकाश्रम पहुंच कर ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखना, सम्पूर्ण भारत वर्ष में भ्रमण कर अद्वैत वेदान्त का प्रचार करना, दरभंगा में जाकर मण्डन मिश्र से शास्त्रार्थ कर वेदान्त की दीक्षा देना तथा मण्डन मिश्र को संन्यास धारण कराना, भारतवर्ष में प्रचलित तत्कालीन कुरीतियों को दूर कर समभावदर्शी धर्म की स्थापना करना – इत्यादि कार्य इनके महत्व को और बढ़ा देता है।

 

चार धार्मिक मठों में दक्षिण के शृंगेरी शंकराचार्यपीठ, पूर्व (ओडिशा) जगन्नाथपुरी में गोवर्धनपीठ, पश्चिम द्वारिका में शारदामठ तथा बद्रिकाश्रम में ज्योतिर्पीठ भारत की एकात्मकता को आज भी दिग्दर्शित कर रहा है। कुछ लोग शृंगेरी को शारदापीठ तथा गुजरात के द्वारिका में मठ को काली मठ कहते र्है। उक्त सभी कार्य को सम्पादित कर 32वर्ष की आयु में ब्रह्मलीन हुए।