ज्योतिष्पीठ बदरीकाश्रम के शंकराचार्य है स्वामी माधवाश्रम जी महाराज

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डाँ आलोक सेमवाल

उत्तराखंडः शंकराचार्य पीठ ज्यौतिर्मठ पर जो माननीय इलाहबाद हाईकोट का निर्णय है सरासर गलत है? क्यों कोट को इस विषय पर पहले तो कुछ इतिहास पता नही कोट ने दो शंकराचार्यों को पीठ की मर्यादाओं का उलंघन करते हुए अमान्य घोषित किया है। यह तो मर्यादित निर्णय कोट का है । पर कोट ने तीन बाते कह कर फैसला छोड दिया . कोट ने कहा कि तीन शंकराचार्य निर्णय करे। धर्म संघ महामण्डल निर्णय करे। काशी विद्वतपरिषद निर्णय करे ।

 

ज्यौतिषपीठ के नये शंकराचार्य बनाने की भूमिका का निर्वहन करे। अब में कोट से पहले तो यह पूछना चाहता हूँ कि प्रथम आप ने कहा कि तीन शंकराचार्य तीन कोन है तीसरा तो स्वयं द्विपीठाधिपत्तित्वदोष से निग्रहित है जो अपने आप को शारदापीठ तथा ज्यौतिर्मठ का शंकराचार्य मानते है एक ही आदमी कयी सालों से दावा कर रहा है कि में दो पीठ का शंकराचार्य हूँ। अब रही बात शारदापीठ की तो वहाँ भी तीन शंकराचार्य दावा कर रहे है हम यहाँ के शंकराचार्य है । तो यह नियम भगवत्पाद् आद्यगुरूशंकराचार्य जी के किसी भी ग्रन्थ या महानुशासन में उल्लेख नही है। और निर्विवाद शंकराचार्य पीठ दो ही है पुरी और श्रृंगेरी. दूसरी बात आप ने कहा कि धर्म संघ महामण्डल ।

 

अखिल भारतवर्षीय धर्म संघ महामण्डल तधा अखिल भारतवर्षीय गोरक्षा समिति के अध्यक्ष_ ज्यौतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी माधवाश्रम जी महाराज बद्रिकाश्रम है जिनको कि स्वामी निरंजनदेवतीर्थ जी तथा काशी के विद्वानों के समक्ष 26 नवम्बर 1993 में निर्विवाद शंकराचार्य बनाया गया था यह सब लिखित में है। जो कि पूर्व आचार्य ज्यौतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी कृष्णबोधाश्रम जी के सुयोग्य शिष्य है तथा स्वामी करपात्री जी महाराज के चरण चिह्नों का निरन्तर पालन करते आ रहे है।

 

सनातन धर्म का निनाद करते हुए अपनी परम्पराओं का निर्वहन करते हुए आ रहे है। तीसरी बात आप ने कहा कि काशीविद्वत परिषद् निर्णय करे । पहले तो यह जानना चाहता हूँ काशी विद्वतपरिषद् है कोन ? वो जिन्होंने इस परम्परा को धर्म संकट में डाल दिया है सभी शंकराचार्य काशी विद्वतपरिषद् के द्वारा ही बनाये गये है प्रमाणित कर सकता हूँ। अब आप ही बताये काशी विद्वतपरिषद् कोन है। हम मानते है उन विद्वानों का सम्मान करते है पर जिनका मन_वचन_कर्म _एक हो ।

 

पर मन वचन कर्म एक नही है। केवल शास्त्र रटने से कुछ नही होता अगर शास्त्रों की मर्यादाओं का उलंघन किया गया तो वे विद्वानों की श्रेणी में नही आते है और भगवत्पाद् आद्यगुरू शंकराचार्य जी के किसी भी ग्रन्थ या महानुशासन में नही लिखा कि काशीविद्वत परिषद् शंकराचार्य का निर्णय करेगी। फिर शंकराचार्य जो पीठ उत्तराखण्ड में है वहाँ के विद्वानों वहाँ के मठाधिपति तथा वहाँ के ब्राह्मणों का घोर अपमान है तथा पीठ की मर्यादायें तभी बनी रहेगी जब पहाड के परिवेश का ही शंकराचार्य हो ।

 

में माननीय इलाबाद हाईकोट से निवेदन करता हूँ कि आप एक बार पूरे प्रमाण के साथ पीठ की जानकारी से अपने आप को पुष्ट करें । और माननीय इलाहबाद हाईकोट ने कहा कि नया शंकराचार्य बनाये क्यों जब 26 नवम्बर 1993 को ज्यौतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी कृष्णबोधाश्रम जी महाराज के सुयोग्य शिष्य स्वामी माधवाश्रम जी को ज्यौतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य बनाया गया था।

 

तो वहाँ स्वामी निरंजनदेवतीर्थ जी महाराज काशी विद्वतपरिषद् तथा उत्तराखण्ड के मठाधिपति यों के सानिध्य में ही माधवाश्रम जी का अभिषेक काशी में किया गया था। स्वामी माधवाश्रम जी महाराज ज्यौतिष्पीठाधीश्वर बद्रिकाश्रम अपनी परम्पराओं का निर्वहन करते आ रहे है तो नया शंकराचार्य क्यों?

दीपक बेंजवाल की फेसबुक वाल से साभार