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करियर का 300वां वनडे खेलने की दहलीज पर युवराज

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बर्मिंगम। करियर के शुरुआती दौर से ही अपनी असाधारण प्रतिभा की बानगी देने वाले युवराज सिंह ने बीते 17 बरस में मैदान के भीतर और बाहर कई उतार-चढ़ाव झेले लेकिन हार नहीं मानी और अब 300वां वनडे मैच खेलने की दहलीज पर खड़े हैं।
युवराज को कुछ लफ्जों में बयां करना काफी कठिन है। वह मोहम्मद अजहरुद्दीन, सचिन तेंडुलकर, सौरभ गांगुली और राहुल द्रविड़ के बाद 300 वनडे खेलने वाले पांचवें भारतीय क्रिकेटर होंगे। अपने करियर में वह केवल 40 टेस्ट खेल सके जो उनकी प्रतिभा के साथ न्याय नहीं है। सीमित ओवरों में भारत के महानतम मैच विनर में से हैं युवराज और यह सूची ज्यादा लंबी नहीं है। वनडे में मैच विनर्स की बात करने पर उनके अलावा कपिल देव, तेंडुलकर और महेंद्र सिंह धोनी के नाम ही जेहन में आते हैं।
एक युवराज वह हैं जो 18 बरस की उम्र में ग्लेन मैकग्रा, ब्रेट ली और जासन गिलेस्पी जैसे गेंदबाजों से भी खौफ नहीं खाता। फिर वह युवराज जिसने क्रिकेट के मक्का लॉडर्स पर नेटवेस्ट फाइनल में मैच जिताने वाली पारी खेली। उस समय 2002 में 325 रन का लक्ष्य हासिल करना लगभग असंभव हुआ करता था। इसी युवराज ने सिडनी में ली, गिलेस्पी और एंडी बिकल जैसे गेंदबाजों के सामने 139 रन की पारी खेली।
एक वह युवराज भी है जो कभी टेस्ट क्रिकेट में अपनी प्रतिभा के साथ न्याय नहीं कर सका। कुछ लोग कहते हैं कि वह पांच दिनी क्रिकेट वाले तेवर ही नहीं रखता था तो कुछ का कहना है कि सौरभ गांगुली का पांचवें नंबर पर कब्जा होने के कारण उसे अधिक मौके नहीं मिले। उस समय गांगुली टेस्ट क्रिकेट में बेहतर खिलाड़ी थे।
कई मौकों पर युवराज ने अपनी प्रतिभा की झलक इस प्रारूप में भी दिखाई लेकिन सीमित ओवरों वाले तेवर नहीं दिखा सके। वह टेस्ट टीम में अपनी जगह पक्की नहीं कर पाए। सीमित ओवरों के क्रिकेट में भारतीय टीम के लिए उनका योगदान अतुलनीय है। वह दो विश्व कप में खिताबी जीत के नायक रहे। टी20 विश्व कप 2007 में स्टुअर्ट ब्रॉड की गेंद पर छह गेंद में लगाये छह छक्के कौन भूल सकता हैॉ।

 

आईपीएल में वह उस तरह का प्रदर्शन नहीं कर सके लेकिन जब तक टी20 क्रिकेट है, युवराज की गिनती इस प्रारूप के लीजैंडस में होगी।
इसके बाद 2011 विश्व कप आया जिसमें लोगों को फाइनल में धोनी का जड़ा छक्का याद होगा लेकिन भारत की खिताबी जीत का सेहरा युवराज के सिर ही बंधेगा जिसने 15 विकेट लेने के साथ 300 रन बनाये।

 

यह वही दौर था जब कैंसर के शुरुआती लक्षण नजर आने लगे थे। युवराज को खून की उल्टियां हो रही थी, वह खा नहीं पा रहे थे और उन्हें पता भी नहीं था कि उनके शरीर में क्या हो रहा है। कप्तान विराट कोहली ने सही कहा, वह प्रेरणास्रोत हैं।

 

मैदान के भीतर और बाहर चैपिंयन हैं और इसलिये उनके प्रति सम्मान उपजता है। कैंसर के खिलाफ जंग उनके जीवन की सबसे बड़ी जंग थी। ऐसे में कोई भी इसी से खुश हो जाता कि उसकी जान बच गई लेकिन युवराज फिर से खेलना चाहता था। उसने वापसी की लेकिन हर कामयाबी के बाद नाकामी आती है।