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कोहिनूर जिसके पास गया उसका हुआ दर्दनाक अंत!

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लंदन। दुनिया के मशहूर कीमती पत्थरों का इतिहास काफी खूनी और दिल दहलाने वाला होता है। एक नई किताब की मानें, तो विश्व प्रसिद्ध हीरे कोहिनूर का इतिहास किसी भी दूसरे कीमती पत्थर की तुलना में सबसे ज्यादा डरावना रहा है। कोहिनूर फिलहाल ब्रिटेन के शाही मुकुट में जड़ा उसकी शान बढ़ा रहा है। कहते हैं कि कोहिनूर श्रापित है। यही कारण है कि साल 1901 में क्वीन विक्टोरिया की मौत के बाद से ही किसी भी ब्रिटिश राजा या रानी ने कोहिनूर को नहीं पहना है।
दुनिया का यह सबसे मशहूर हीरा भारतीय उपमहाद्वीप में कई साम्राज्यों के जन्म और औंधे मुंह नीचे गिरने का गवाह रहा है। अभी भी इसपर अधिकार के दावे को लेकर भारत और ब्रिटेन एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े हैं। ब्रिटेन के इतिहासकार विलियम डी कहते हैं, कोहिनूर की कहानी अविश्वसनीय तरीके से हिंसक है। इस हीरे पर जिसका भी अधिकार हुआ या जिसने भी इसे छुआ, उनमें से करीब-करीब हर किसी का अंत बेहद दर्दनाक तरीके से हुआ। विलियम ने पत्रकार अनीता आनंद के साथ मिलकर कोहिनूर: द स्टोरी ऑफ द वर्ल्ड्स मोस्ट इनफेमस डायमंड नाम की किताब लिखी है।
एएफपी को दिए गए एक इंटरव्यू में विलियम ने कहा, हम देखते हैं कि कोहिनूर पर जिस-जिसका भी अधिकार हुआ, उनके साथ कई तरह की खौफनाक वारदातें हुईं। किसी को जहर दिया गया, किसी को लाठियों से पीटा गया, तो किसी का सिर ईंट से फोड़ दिया गया। कई के ऊपर बहुत अत्याचार किए गए। एक शख्स को तो गर्म सुई से अंधा तक कर दिया गया। इस किताब में हमने इस पूरे इतिहास को बताया है। आपको इसमें इस तरह की कई दिल दहला देने वाली वारदातें मिलेंगी।
किताब में बताया गया है कि किस तरह एक ईरानी राजकुमार की आंखों में पिघला हुआ पारा डाल दिया गया, ताकि दर्द के कारण वह बता दे कि उसे कोहिनूर कहां रखा है। इतिहासकारों का कहना है कि यह हीरा मुगल शासन के दौर में सबसे पहले भारत के गोलकुंडा की खदान में मिला था। कोहिनूर का पहला रेकॉर्ड 1750 के आसपास मिलता तब मिलता है जब नादिर शाह ने दिल्ली पर हमला किया था। नादिरशाह ने दिल्ली में जमकर लूटपाट की और जाते समय अपने साथ मशहूर तख्ते ताऊस भी ले गया। इसी सिंहासन में कई और कीमती पत्थरों के साथ कोहिनूर भी जड़ा हुआ था। इतिहासकार विलियम बताते हैं, दुनिया में आजतक जितना भी फर्निचर बना है, उनमें सबसे आलीशान तख्ते ताऊस था। ताज महल को बनाने में जितनी लागत आई थी, उसका चार गुना इस सिंहासन को बनाने में खर्च हुआ था। पीढिय़ों तक मुगल राजाओं ने जो कीमती पत्थर जमा और हासिल किए थे, उनमें से सबसे कीमती पत्थरों को इस तख्त में जड़ा गया था। कोहिनूर उस समय इतना मशहूर नहीं था। मुगल रूबी जैसे रंगीन कीमता पत्थरों को ज्यादा तवज्जो देते थे। कोहिनूर को प्रसिद्धि तब मिली जब ब्रिटिश शासन ने इसे अपने कब्जे में किया।
विलियम बताते हैं, ब्रिटिश शासन ने इसे लेकर जितना हो-हंगामा किया, उसके कारण ही कोहिनूर इतना प्रसिद्ध हुआ। 1947 में आजादी मिलने के बाद से ही भारत लगातार कोहिनूर को वापस हासिल करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिल पाई है। हालांकि कोहिनूर पर दावा करने वालों में भारत अकेला नहीं है। ईरान, पाकिस्तान और यहां तक कि अफगान तालिबान ने भी इस पर दावा जताया है। 19वीं सदी के मध्य में यह हीरा ब्रिटिश हुकूमत के पास आया। पंजाब के राजा रणजीत सिंह की मौत के बाद 1839 में सिखों और अंग्रेजों की लड़ाई छिड़ गई। रणजीत सिंह के 10 साल के बेटे ने यह हीरा शांति समझौते के तहत अंग्रेजी हुकूमत को सौंपा। रणजीत सिंह को यह हीरा एक अफगान शासक के पास से मिला था। उसने रणजीत सिंह ने पनाह मांगी थी।