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माँ नंदा की लोकजात : कैलाशू पैटीग्ये नंदा का नेजा निसाण

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कुरूड़ गाँव: माँ नंदा की लोकजात को भेटने का कल सौभाग्य प्राप्त हुआ। जिस नंदा को मेरे पहाड़ ने धियाण ( बेटी ) माना है उसका मुल्क वाकई मे खूबसूरत है, नन्दाकिनी घाटी मे चारो ओर मीलो तक फैली हरियाली मानो नंदा के स्वागत के लिऐ बेसब्र हुई जा रही थी…कुरूड़ गाँव के बीचो बीच माँ नंदा का सबसे प्राचीन सिद्धपीठ है।

 

यही से नंदा की धाराऐ पूरे पहाड़ मे फैली, आस्था, विश्वाश, संस्कृति, परंपरा, मान्यता और गीतो के रूप मे। नंदा जहा पहुची वह क्षेत्र नंदामय बन गया, मानव, पशु, खेत खलिहान सब नंदा मे समाहित होते गए। बेटी का यह आगमन खुशहाली, सुख समॅद्धि का प्रतीक बनता गया और शायद ही पहाड़ का ऐसा कोई कोना हो जहा आज नंदा मौजूद न हो।

 

मान्यता है कि पहाड़ की हर बेटी के हृदय मे नंदा विराजमान है, वही उसे पहाड़ की विपरीत स्थितियो मे जीवंत रहना सीखाती है। गौरा, चंण्डिका, भगवती सभी उसी पराशक्ति के रूप मे यहा वहा स्थापित है। नंदा दिल मे बसी है वो आमखास हो या राजा महाराजा इसिलिऐ लोक ने उसे बेटी माना तो राजाओ ने उसे अपनी आराध्य ” राजराजेश्वरी ”

 

कुरूड़ मे नंदा का आविर्भाव स्वयंभू है, जो पाषाण शिलारूप मे है। यही मूल राराजेश्वरी है जिसे गढ़वाल के राजाओ द्वारा अपनी आराध्य कुलदेवी माना गया और इसी देवी से सुख समृद्धि की कामना के लिऐ 12 वर्ष बाद भव्य राजजात आयोजित करने का वचन दिया। इसी प्रकार क्षेत्र के कुशल मंगल के लिऐ प्रतिवर्ष आमजन भी नंदा की लोकजात आयोजित करते है।

 

यह नंदा के लोकोत्सव है जिनमे नंदा स्वंय अपने मैती मुल्कीयो को भेटती है। पाषाण शिला के साथ दो स्वर्ण मूर्तिया है जो क्रमशः दशोली और बधाण की नंदा कहलाती है। नंदा की 12 वर्ष बाद आयोजित होने वाली राजजात हो या प्रतिवर्ष होने वाली लोकजात यही दोनो मूर्तिया नंदा का प्रतीक बनकर मुल्क को भेटने निकल पड़ती है। इस वर्ष 13 अगस्त को कुरूड़ धाम से नंदा लोकजात की पूजा प्रारंभ हुई और कल 15 अगस्त को विधिवत नंदा की दोनो डोलिया छंतोलियो , नेजा निषाणो के साथ यात्रा पर निकल चुकी है।

 

दशोली नंदा डोली कल रात्रिविश्राम के चरबंग गाव और आखिर मे बालापाटा बुग्याल तक जायेगी वही बधाण की नंदा कल जाखणी रात्रिविश्राम कर बेदनी पहुचेगी जहा अनुष्ठानिक पूजाओ के बाद बधाण नंदा छ महीने के लिऐ देवराड़ा गाव जायेगी और दशोली नंदा अपने मूल मंदिर कुरूड़ लौटेगी। यह क्रम हर साल इसी रूप मे आगे बड़ता है।

 

नंदा पहाड़ के लिऐ आराध्य देवी भर ही नही है बल्कि वो एक पूरी परंपरा की सृजक है, एक जीता जागता इतिहास भी। इसीलिऐ वो हर दिन अनगिनत कंठो से गीतो के रूप मे स्फुटित होती है, यही नंदा की ताकत है कि वो आज भी दिलो को भावुक कर देती है, कल इसी जीवित नंदा के दर्शन हुऐ,तो मन भावविहल हो उठा और आँखे छलक उठी, समय थम सा गया और मै अबोध भाव से स्तब्ध। माँ नंदा में इस प्रकार एकाकार होना मुझे जैसे साधारण इंसान के लिऐ सौभाग्य जैसा था और वास्तव मे यही इस यात्रा की तृप्ति थी।

 

नंदा हमारी है और हम सब की नंदा का भाव लिऐ कल दिन भर नंदाभूमि मे चाचड़ी और मांगल लगते रहे। बहुत साधारण सी भावनाओ मे लोकमांगल्य की कामना भी दिख उठी

 

ह्येरी की जा फ्येरी की जा तू मैती मुल्क
धरती अन्न देई, मनखी देई बुद्ध
ग्वोरू दूध देई, निपूतो तै पूत

 

माँ नंदा की कृपा ही थी कि न बारिश का संकट हुआ न रास्ते की विकटता, सब सहजता से निभा यहा तक मै भूखा न रहू इसका प्रबंध भी माँ ने कर दिया। मै हृदय से आभारी हू नंदा के मैती पुजारी विपिन चन्द्र गौड़ का जिन्होने नंदा प्रसाद के लिऐ मुझे अपने घर आमंत्रित किया। उनके पिताजी और भाई इस समय बधाण की नंदा के साद जात मे सामिल है।

 

आईये माँ नंदा की जात मे सामिल होकर नंदामय हो जाऐ

दीपक बेंजवाल की वाल से साभार

Опубліковано दीपक बेंजवाल 16 серпня 2017 р.