udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news नैनीताल की झीलोंं के नाम बदलना चाहते हैं विधायक

नैनीताल की झीलोंं के नाम बदलना चाहते हैं विधायक

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देहरादून। अंग्रेजी के दिग्गज नाटककार शैक्सपीयर ने भले कहा हो कि नाम में क्या रखा है, गुलाब का नाम कुछ और रख देने से उसकी खुशबू थोडे ही बदल जायेगी, लेकिन नैनीताल के विधायक संजीव आर्य शैक्सपीयर के इस कथन से सहमत नही हैं ।

 

वे नैनीताल की कुछ झीलोंं के नाम तो बदलना ही चाहते हैं जिनके नाम अजीब से हैं। जेैसे यहां एक झील का नाम है-‘सुसाइड प्वाइंट’, तो दूसरी ‘फांसी गधेरा’ कहलाती है तो तीसरी सादिया (नष्ट हो रही ) ताल। आर्य इस बारे मेंं सरकार का पत्र लिख रहे है कि इन नामों के सुनने से पर्यटकों को धक्का लगता है। याद करेंं, पिछले साल भी कुमाऊ में ही चोरगलिया का नाम बदले जाने का अभियान चला था ।

 

आर्य का कहना है कि कुछ पर्यटक स्थलों के नामों का हर साल लाखों की संख्या में आने वाले पर्यटकों पर अच्छा असर नही पडता और उन्होने जनता से इन और ऐसे नामों की जगह वैकल्पिक नामों के सुझाव मांगें हैं । उनका कहना है कि इनमें बहुत से नाम तो अधिकृत भी नही हैं । जैसे कि सुसाईड प्वाइंट नाम तो कुछ गाइडोंं और घोडेवानों ने पर्यटकोंं के बीच केवल उत्सुकता पैदा करने भर को रख दिया और इसके समर्थन में ऊट पटांग कहानियां सुनानी शुरू कर दी ।

 

इसका कोई तुक या तर्क नही है। जबकि इस स्थल का नाम यहां की साहसिक संभावनाओं के दोहन को होना चाहिये । उन्होने बताया कि कुछ साल पहले जब सादिया ताल का सौन्दर्यीकरण किया गया तो इसका नाम सरिता ताल रखा गया था लेकिन प्रचलन में अभी सादिया ताल ही है। विधायक संजीव आर्य ने नगर पालिका से भी इनके नामकरण से संबंधित रिकार्ड खंगालने को कहा है ताकि इसके बाद मुख्यमंत्री और शहरी विकास मंत्री से इस बारे मे बातचीत की जा सके ।

 

अलबत्ता,इतिहास में रूचि रखने वाले अजय सिंह रावत का कहना है कि सुसाइड प्वाइंट नाम तो कभी अस्तित्व में ही नही रहा लेकिन बाकी दो का नाम इतिहास में है और उनका नाम न ही बदला जाये,तो अच्छा होगा । उदाहरण को फांसी गधेरा प्रथम विश्व युद्घ मेंं अंग्रेजों के रोहिलाओं को फांसी दिये जाने की याद दिलाता है जिन्होने 1857 में हल्द्वानी पर हमला किया था ! इसका नाम बदलने का अर्थ होगा,इतिहास का भुलाना । इसी प्रकार सादिया ताल मूलत: वेटलेैंड और क्षेत्र के जल प्रबंधन का हिस्सा है। यही पर कुमाऊ कमिश्नर सर हेनरी रैमजे ने पहली बार 1856 में आलू की खेती शुरू कराई थी ।