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नया अध्याय : 52 नहीं 222 गढ़ों की धरती है गढ़वाल !

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देहरादूनः नया अध्याय : 52 नहीं 222 गढ़ों की धरती है गढ़वाल ! आप चौंक गए होंगे। क्योंकि आपने और हमने अभी तक सुना और इतिहास के पन्नों में पढ़ा था कि गढ़वाल 52 गढ़ों की भूमि है। अभी तक हमारे सामने जो इतिहास रखा गया था हम उसे ही सही मान रहे थे। लेकिन जब इतिहास के पन्नों को उकेरती कुछ नयी जानकारी मिले तो आश्चर्य होना लाजमी है। गढ़वाल के 52 गढ़ों पर खोज करने वालों की माने तो गढ़वाल में 52 नहीं 222 गढ़ हैं और इनकी संख्या ओर अधिक बढ़ सकती है। यहां हम इस पर विस्तार से जानकारी देने के साथ-साथ गढ़वाल के इतिहास पर भी नजरें दौढ़ाएंगे।

 

देवभूमि शब्द अपने आप में एक अलौकिक और रहस्यों से भरा हुआ है और जब इसके बारे में कुछ नयी जानकारी मिल जाए तो आपकी भी ईच्छा होगी कि इसके बारे में विस्तार से जाने। आज हम आपको ऐसा ही कुछ नया बताने जा रहे हैं जो अभी तक इतिहास में एक नया अध्याय है। जैसा कि आप अभी तक जानते है कि गढ़वाल की धरती को 52 गढ़ों की धरती कहा गया है। लेकिन उत्तराखंड का गढ़वाल 52 गढ़ों की धरती नहीं, अपितु 222 गढ़ों की धरती है। इनमें से एचएनबी केंद्रीय गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर का इतिहास एवं पुरातत्व विभाग अब तक 169 गढ़ों का मूल स्थान खोज चुका है। अभी तक 69 गढ़ों के अवशेष ढूंढ निकाले गए हैं। शेष 100 की अवशेषों की खोज जारी है। विभाग का मानना है कि गढ़ों की संख्या बढ़ भी सकती है।

प्राचीन धर्मग्रंथो में गढ़वाल को केदारखंड और कुमाऊं को मानसखंड कहा गया है। कालांतर में सुरक्षा की रणनीति के तहत केदारखंड में राज कर राजाओं ने सुरक्षा की रणनीति से गढ़ों या किलों (फोर्ट) की स्थापना की। इन गढ़ों की जिम्मेदारी गढ़पतियों को दे दी। गढ़ों से राजा को सामरिक मदद सहित कर व अनाज की प्राप्ति होती थी। इन गढ़ों में पूरी बस्ती बसा करती थी। राजा अजयपाल ने 52 गढ़ को जीतकर साम्राज्य की स्थापना की। तब से केदारखंड को गढ़वाल कहा जाने लगा। यहां 8वीं शताब्दी से ब्रिटिश काल तक गढ़ों का काल रहा।

गढ़ के बारे में हमेशा लोगों में उत्सुकता रही है। इसी को देखते हुए वर्ष 2011 में गढ़वाल विवि के इतिहास एवं पुरातत्व विभाग के शोधार्थी डा. नागेंद्र रावत ने गढ़ों को खोज निकालने का जिम्मा लिया। वर्ष 2001 से 2017 के बीच उन्होंने गढ़वाल के 7 जिलों का भ्रमण कर 69 गढ़ों के अवशेष खोजे। उन्होंने शोध के दौरान इतिहास व धर्मग्रंथों का अध्ययन और इतिहासकारों व लोगों से बातचीत कर 222 गढ़ों के नाम एकत्रित किए। इनमें से 169 गढ़ ऐसे हैं, जिनका स्थान आइडेंटीफाई किया जा चुका है।

सबसे ज्यादा गढ़ पौड़ी में

सबसे ज्यादा गढ़ पौड़ी में है। इसकी वजह पौड़ी जिले का पहाड़ व मैदान में विभाजित होना है। सबसे बढ़ा गढ़ पौड़ी जिले का चौंदकोट गढ़ (विकास खंड एकेश्वर) है। यह 46.33 हेक्टेअर भूमि में फैला था और इसमें त्रिस्तरीय व्यवस्था थी। सबसे पहले सुरक्षा चौकी, दूसरा स्थानीय निवासियों के घर और तीसरा गढ़पति का किला।

 गढ़ों की स्थापना विशेष रणनीति

गढ़ों की स्थापना विशेष रणनीति के तहत की जाती थी। इसमें स्थानीय निवासियों का साक्षात्कार और भौगोलिक स्थिति का आकलन कर गढ़ खोजे गए। कुछ स्थानों में गढ़ मंदिरों में तब्दील हो गए हैं। जबकि कुछ स्थानों पर मध्यकाल की स्थापत्य कला के अवशेष मिले हैं।

जिलावार गढ़
जिला संख्या
पौड़ी 59
उत्तरकाशी 40
चमोली 21
टिहरी 20
रुद्रप्रयाग 9
देहरादून 9
हरिद्वार 3

गढ़ों के उद्भव को जाने के लिए प्रत्येक जिले में कम से कम एक गढ़ के उत्खनन होना चाहिए। इससे इनके स्थापना काल की जानकारी हासिल हो सकेगी। संरक्षण के अभाव पुरातात्विक महत्व की सामग्री नष्ट हो रहीे हैं।
डा. नागेन्द्र रावत, गढ़ों के खोजकर्ता

यह खोज मध्यकालीन इतिहास के नए अध्याय को खोलेगी। किस्सों-कहानी में पढ़े जाने वाले गढ़ों का वास्तविक इतिहास लोगों के सामने आएगा। गढ़ देश-विदेश के लोगों के सैलानियों का आकर्षण का केंद्र बन सकेंगे।

प्रो. विनोद नौटियाल, एचओडी इतिहास एवं पुरातत्व विभाग

केदारखंड के रूप में विभिन्न हिंदू ग्रंथों में उल्लेख

परंपरागत रूप से इस क्षेत्र का केदारखंड के रूप में विभिन्न हिंदू ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। गढ़वाल राज्य क्षत्रियों का राज था। दूसरी शताब्दी ई.पू. के आसपास कुनिंदा राज्य भी विकसित हुआ . बाद में यह क्षेत्र कत्युरी राजाओं के अधीन रहा, जिन्होंने कत्युर घाटी, बैजनाथ, उत्तराखंड से कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्र में 6 वीं शताब्दी ई. से 11 वीं शताब्दी ई. तक राज किया, बाद में चंद राजाओं ने कुमाऊं में राज करना शुरू किया, उसी दौरान गढ़वाल कई छोटी रियासतों में बाँट गया, ह्वेनसांग, नामक चीनी यात्री, जिसने 629 ई. के आसपास क्षेत्र का दौरा किया था, ने इस क्षेत्र में ब्रह्मपुर नामक राज्य का उल्लेख किया है।

 

823 ई. में जब मालवा के राजकुमार कनकपाल बद्रीनाथ मंदिर की यात्रा पर आये, तब राजा भानु प्रताप, जोकि चाँदपुर गढ़ी के मुखिया थे, से मुलाकात के बाद स्थापना हुयी . बाद में राजा भानु प्रताप ने राजकुमार से अपनी बेटी से शादी की और बाद में अपना राज्य, किले, शहर इत्यादि कनकपाल को सौंप दिए. कनकपाल और पंवार शाह के वंशजो ने धीरे – धीरे सभी स्वतंत्र (गढ़) के 52 छोटे सरदारों पर विजय प्राप्त की है और अगले 915 वर्षों गढ़वाल राज्य पर 1803 ई. तक शासन किया।

 

देवभूमि व तपोभूमि

पौराणिक ग्रन्थों में कुर्मांचल क्षेत्र मानसखण्ड के नाम से प्रसिद्व था। पौराणिक ग्रन्थों में उत्तरी हिमालय में सिद्ध गन्धर्व, यक्ष, किन्नर जातियों की सृष्टि और इस सृष्टि का राजा कुबेर बताया गया हैं। कुबेर की राजधानी अलकापुरी (बद्रीनाथ से ऊपर) बतायी जाती है। पुराणों के अनुसार राजा कुबेर के राज्य में आश्रम में ऋषि-मुनि तप व साधना करते थे। अंग्रेज़ इतिहासकारों के अनुसार हूण, शक, नाग, खस आदि जातियाँ भी हिमालय क्षेत्र में निवास करती थी। पौराणिक ग्रन्थों में केदार खण्ड व मानस खण्ड के नाम से इस क्षेत्र का व्यापक उल्लेख है। इस क्षेत्र को देवभूमि व तपोभूमि माना गया है।

मानस खण्ड का कुर्मांचल व कुमाऊँ नाम चन्द राजाओं के शासन काल में प्रचलित हुआ। कुर्मांचल पर चन्द राजाओं का शासन कत्यूरियों के बाद प्रारम्भ होकर सन् १७९० तक रहा। सन् १७९० में नेपाल की गोरखा सेना ने कुमाऊँ पर आक्रमण कर कुमाऊँ राज्य को अपने आधीन कर लिया। गोरखाओं का कुमाऊँ पर सन् १७९० से १८१५ तक शासन रहा। सन् १८१५ में अंग्रेंजो से अन्तिम बार परास्त होने के उपरान्त गोरखा सेना नेपाल वापस चली गयी किन्तु अंग्रेजों ने कुमाऊँ का शासन चन्द राजाओं को न देकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधीन कर दिया। इस प्रकार कुमाऊँ पर अंग्रेजो का शासन १८१५ से आरम्भ हुआ।

 

केदार खण्ड कई गढ़ों (किले) में विभक्त था
ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार केदार खण्ड कई गढ़ों (किले) में विभक्त था। इन गढ़ों के अलग-अलग राजा थे जिनका अपना-अपना आधिपत्य क्षेत्र था। इतिहासकारों के अनुसार पँवार वंश के राजा ने इन गढ़ों को अपने अधीन कर एकीकृत गढ़वाल राज्य की स्थापना की और श्रीनगर को अपनी राजधानी बनाया। केदार खण्ड का गढ़वाल नाम तभी प्रचलित हुआ। सन् १८०३ में नेपाल की गोरखा सेना ने गढ़वाल राज्य पर आक्रमण कर अपने अधीन कर लिया। यह आक्रमण लोकजन में गोरखाली के नाम से प्रसिद्ध है। महाराजा गढ़वाल ने नेपाल की गोरखा सेना के अधिपत्य से राज्य को मुक्त कराने के लिए अंग्रेजों से सहायता मांगी।

अंग्रेज़ सेना ने नेपाल की गोरखा सेना को देहरादून के समीप सन् १८१५ में अन्तिम रूप से परास्त कर दिया। किन्तु गढ़वाल के तत्कालीन महाराजा द्वारा युद्ध व्यय की निर्धारित धनराशि का भुगतान करने में असमर्थता व्यक्त करने के कारण अंग्रेजों ने सम्पूर्ण गढ़वाल राज्य राजा गढ़वाल को न सौंप कर अलकनन्दा-मन्दाकिनी के पूर्व का भाग ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन में सम्मिलित कर गढ़वाल के महाराजा को केवल टिहरी जिले (वर्तमान उत्तरकाशी सहित) का भू-भाग वापस किया। गढ़वाल के तत्कालीन महाराजा सुदर्शन शाह ने २८ दिसम्बर १८१५ को टिहरी नाम के स्थान पर जो भागीरथी और भिलंगना नदियों के संगम पर छोटा-सा गाँव था, अपनी राजधानी स्थापित की।

कुछ वर्षों के उपरान्त उनके उत्तराधिकारी महाराजा नरेन्द्र शाह ने ओड़ाथली नामक स्थान पर नरेन्द्रनगर नाम से दूसरी राजधानी स्थापित की। सन् १८१५ से देहरादून व पौड़ी गढ़वाल (वर्तमान चमोली जिला और रुद्रप्रयाग जिले का अगस्त्यमुनि व ऊखीमठ विकास खण्ड सहित) अंग्रेजों के अधीन व टिहरी गढ़वाल महाराजा टिहरी के अधीन हुआ।

भारतीय गणतन्त्र में टिहरी राज्य का विलय अगस्त १९४९ में हुआ और टिहरी को तत्कालीन संयुक्त प्रान्त (उत्तर प्रदेश) का एक जिला घोषित किया गया। १९६२ के भारत-चीन युद्ध की पृष्ठभूमि में सीमान्त क्षेत्रों के विकास की दृष्टि से सन् १९६० में तीन सीमान्त जिले उत्तरकाशी, चमोली व पिथौरागढ़ का गठन किया गया। एक नये राज्य के रूप में उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन के फलस्वरुप  उत्तराखण्ड की स्थापना ९ नवम्बर २००० को हुई। अत: इस दिन को उत्तराखण्ड में स्थापना दिवस के रूप में मनाया जाता है।

सन् १९६९ तक देहरादून को छोड़कर उत्तराखण्ड के सभी जिले कुमाऊँ मण्डल के अधीन थे। सन् १९६९ में गढ़वाल मण्डल की स्थापना की गयी जिसका मुख्यालय पौड़ी बनाया गया। सन् १९७५ में देहरादून जिले को जो मेरठ प्रमण्डल में सम्मिलित था, गढ़वाल मण्डल में सम्मिलित कर लिया गया। इससे गढ़वाल मण्डल में जिलों की संख्या पाँच हो गयी। कुमाऊँ मण्डल में नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, तीन जिले सम्मिलित थे।

सन् १९९४ में उधमसिंह नगर और सन् १९९७ में रुद्रप्रयाग, चम्पावत व बागेश्वर जिलों का गठन होने पर उत्तराखण्ड राज्य गठन से पूर्व गढ़वाल और कुमाऊँ मण्डलों में छः-छः जिले सम्मिलित थे। उत्तराखण्ड राज्य में हरिद्वार जनपद के सम्मिलित किये जाने के पश्चात गढ़वाल मण्डल में सात और कुमाऊँ मण्डल में छः जिले सम्मिलित हैं। १ जनवरी २००७ से राज्य का नाम “उत्तरांचल” से बदलकर “उत्तराखण्ड” कर दिया गया है।

आन्दोलन के पश्चात भारत गणराज्य के सत्ताइसवें राज्य के रूप में

उत्तराखण्ड (पूर्व नाम उत्तरांचल), उत्तर भारत में स्थित एक राज्य है जिसका निर्माण ९ नवम्बर २००० को कई वर्षों के आन्दोलन के पश्चात भारत गणराज्य के सत्ताइसवें राज्य के रूप में किया गया था। सन २००० से २००६ तक यह उत्तरांचल के नाम से जाना जाता था। जनवरी २००७ में स्थानीय लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए राज्य का आधिकारिक नाम बदलकर उत्तराखण्ड कर दिया गया।

राज्य की सीमाएँ उत्तर में तिब्बत और पूर्व में नेपाल से लगी हैं। पश्चिम में हिमाचल प्रदेश और दक्षिण में उत्तर प्रदेश इसकी सीमा से लगे राज्य हैं। सन २००० में अपने गठन से पूर्व यह उत्तर प्रदेश का एक भाग था। पारम्परिक हिन्दू ग्रन्थों और प्राचीन साहित्य में इस क्षेत्र का उल्लेख उत्तराखण्ड के रूप में किया गया है। हिन्दी और संस्कृत में उत्तराखण्ड का अर्थ उत्तरी क्षेत्र या भाग होता है। राज्य में हिन्दू धर्म की पवित्रतम और भारत की सबसे बड़ी नदियों गंगा और यमुना के उद्गम स्थल क्रमशः गंगोत्री और यमुनोत्री तथा इनके तटों पर बसे वैदिक संस्कृति के कई महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थान हैं।

देहरादून, उत्तराखण्ड की अन्तरिम राजधानी होने के साथ इस राज्य का सबसे बड़ा नगर है। गैरसैण नामक एक छोटे से कस्बे को इसकी भौगोलिक स्थिति को देखते हुए भविष्य की राजधानी के रूप में प्रस्तावित किया गया है किन्तु विवादों और संसाधनों के अभाव के चलते अभी भी देहरादून अस्थाई राजधानी बना हुआ है। राज्य का उच्च न्यायालय नैनीताल में है।

राज्य सरकार ने हाल ही में हस्तशिल्प और हथकरघा उद्योगों को बढ़ावा देने के लिये कुछ पहल की हैं। साथ ही बढ़ते पर्यटन व्यापार तथा उच्च तकनीकी वाले उद्योगों को प्रोत्साहन देने के लिए आकर्षक कर योजनायें प्रस्तुत की हैं। राज्य में कुछ विवादास्पद किन्तु वृहत बाँध परियोजनाएँ भी हैं जिनकी पूरे देश में कई बार आलोचनाएँ भी की जाती रही हैं, जिनमें विशेष है भागीरथी-भीलांगना नदियों पर बनने वाली टिहरी बाँध परियोजना। इस परियोजना की कल्पना १९५३ मे की गई थी और यह अन्ततः २००७ में बनकर तैयार हुआ। उत्तराखण्ड, चिपको आन्दोलन के जन्मस्थान के नाम से भी जाना जाता है।

फूलों की घाटीविश्व धरोहर स्थल

फुरसती, साहसिक और धार्मिक पर्यटन उत्तराखण्ड की अर्थव्यस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जैसे जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान और बाघ संरक्षण-क्षेत्र और नैनीताल, अल्मोड़ा, कसौनी, भीमताल, रानीखेत और मसूरी जैसे निकट के पहाड़ी पर्यटन स्थल जो भारत के सर्वाधिक पधारे जाने वाले पर्यटन स्थलों में हैं। पर्वतारोहियों के लिए राज्य में कई चोटियाँ हैं, जिनमें से नंदा देवी, सबसे ऊँची चोटी है और १९८२ से अबाध्य है। अन्य राष्टीय आश्चर्य हैं फूलों की घाटी, जो नंदा देवी के साथ मिलकर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है।

मोक्ष और पाप शुद्धिकरण की खोज

उत्तराखण्ड में, जिसे “देवभूमि” भी कहा जाता है, हिन्दू धर्म के कुछ सबसे पवित्र तीर्थस्थान है और हज़ार वर्षों से भी अधिक समय से तीर्थयात्री मोक्ष और पाप शुद्धिकरण की खोज में यहाँ आ रहे हैं। गंगोत्री और यमुनोत्री, को क्रमशः गंगा और यमुना नदियों के उदग्म स्थल हैं, केदारनाथ और बद्रीनाथ के साथ मिलकर उत्तराखण्ड के छोटा चार धाम बनाते हैं, जो हिन्दू धर्म के पवित्रतम परिपथ में से एक है। हरिद्वार के निकट स्थित ऋषिकेश भारत में योग क एक प्रमुख स्थल है और जो हरिद्वार के साथ मिलकर एक पवित्र हिन्दू तीर्थ स्थल है।

 

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