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संसद शीतकालीन सत्र में 189 करोड़ रुपये खर्च और हाथ आया बस हंगामा

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लोकसभा की 21 बैठकों में महज 19 घंटे ही हो पाया काम
सरकार-विपक्ष की खींचतान में चर्चा को तरसी संसद
हंगामे से शुरू हुआ शीत सत्र हंगामे पर ही हुआ खत्म

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नई दिल्ली। प्रतिदिन 9 करोड़ खर्च करने वाली देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद शीतकालीन सत्र में 189 करोड़ रुपये खर्च कर हंगामे के अलावा कुछ और हासिल नहीं कर सकी। लोकसभा में सत्र की 21 दिनों की बैठक में महज 19 घंटे काम हुए तो राज्यसभा में पहले दिन नोट बंदी पर अधूरी चर्चा के अलावा किसी भी मुद्दे पर चर्चा नहीं हो सकी। इस दौरान नोट बंदी पर सरकार और विपक्ष की सियासी खींचतान के कारण महज दो बिलों को ही कानूनी जामा पहनने का मौका हाथ लगा। इसमें से एक बिल कराधान संशोधन बिल था तो दूसरा नि:शक्त व्यक्ति अधिकार बिल को शुक्रवार को किसी तरह आनन फानन पारित कराया गया। सत्र में एक देश एक कर के लिए वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से संबंधित तीन बिलों को लाया तक नहीं जा सका।
साल 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद संसद सत्र में कामकाज के घंटे में हुई उल्लेखनीय वृद्घि को वर्तमान शीत सत्र से पूरी तरह से धो कर रख दिया। पहले ही दिन से नोट बंदी पर सरकार और विपक्ष के बीच जारी खींचतान अंतिम दिन तक बनी रही। इस दौरान कई विपक्षी दलों ने दो बार राष्टï्रपति के समक्ष सरकार के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई तो सरकार भी विपक्ष पर लगातार वार करने से पीछे नहीं रही। अंतिम हफ्ते के बाकी बचे तीन दिनों के दौरान एकबारगी नोट बंदी पर चर्चा की संभावना तब बनती दिखी, जब विपक्ष ने मतविभाजन वाले नियम पर चर्चा की जिद छोडऩे की घोषणा की। हालांकि इसके बाद सरकार ने भी अचानक अपना स्टैंड बदलते हुए नोट बंदी से पहले अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले पर चर्चा की मांग कर दी।
एक भी मुद्दे पर चर्चा नहीं
संसद के दोनों सदनों की 21-21 बैठकों में एक भी मुद्दे पर चर्चा नहीं हुई। विवाद की वजह बने नोट बंदी के फैसले पर राज्यसभा में चर्चा अधूरी रही तो लोकसभा में एक भी सदस्य अपनी पूरी बात नहीं रख पाया।
आडवाणी की नाराजगी बनी चर्चा
शीत सत्र में भाजपा के वयोवृद्घ सांसद लालकृष्ण आडवाणी की बार-बार नाराजगी चर्चा का विषय बनी। पहले तो उन्होंने विपक्ष के साथ-साथ स्पीकर और संसदीय कार्य मंत्री के काम करने के तरीके पर सवाल उठाए। बाद में यहां तक कहा कि हंगामे के कारण उनका मन इस्तीफा देने का करता है।