udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news पहाड़ी मूल के प्रथम शंकराचार्य स्वामी माधवाश्रम जी की अदभुत जीवन यात्रा !

पहाड़ी मूल के प्रथम शंकराचार्य स्वामी माधवाश्रम जी की अदभुत जीवन यात्रा !

Spread the love

हाथ में शंकराचार्य रुप वाला दंड , दूसरे हाथ में कमंडल  और मीठी सी मुस्कान आज भी हर किसी के ऑखों में है समाहित

संतोष *सप्ताशू*

उदय दिनमान डेस्कः हिमालय में जन्म , शिक्षा अर्जन के लिए विभिन्न स्थानों , गुरूओं का सानिध्य , नर्वदा के तट से लेकर फिर हिमालय में साधना विचरण जीवन के सार को खोजने , ब्रह्म को जानने के लिए चरैवेति चरैवेति सी निरंतर खोज ।आज ऐसे महान संत हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनकी ज्ञान की साधना की परिप्वकता के बाबजूद भी उनमे बाल स्वभाव की सी सरलता आज भी हर किसी के मन में वो छवि दुःख का अनुभव नहीं कराती बल्कि मानो कि ईश्वर साक्षात हमारे सामने हो, हो रही है। उनके मुखमंडल पर हमेशा वो चमक जिसे देखने और एक बार दर्शन के लिए हर कोई अभिभूत हुआ करता था। उनकी ऑखों की चमक और माथे पर चन्द्र सी शीतलता और तेज आज भी ऑखों के सामने आ जाता है।

 

शंकराचार्यों के इतिहास में यह पहली बार हुआ कि कोई पहाडी संत शंकराचार्य की पदवी पर पहुंचा और उस पद को आदिशंकराचार्य की तरह ही उस पद का निर्वहन करते रहे। पहाड़ी मूल के प्रथम शंकराचार्य स्वामी माधवाश्रम जी की अदभुत जीवन यात्रा !पर कुछ अज्ञानी रूप में उल्लेखित करना चाहता हू। उस परब्रहम के बारे में क्या लिखा जा सकता है जो स्वंय ब्रहम के समान हो फिर भी कुछ पक्तियां भक्तों और पाठकों के लिए लिखने की कोशिश कर रहा हूॅ । मैं भी उसी जन्मभूमि में पैदा हुआ जहां महान संत ने जन्म लिया और देश-विदेश में सनातन धर्म की जोत को जलाए रखा अपने जीवन के अंतिम दिन तक। मानव जीवन के अंतिम दिनों पंजाव और हरियाणा की राजधानी चंडीगढ में धर्म की जोत को जलाए रखते हुए इस धरा से मनुष्य रूपी शरीर को त्याग पर परब्रहम में समाहित हुए।

 

सरलता , विनम्रता, अदभुत प्रतिभा के धनी यह संत बचपन से ही किसी चमत्कार से कम नहीं थे।देवभूमि उत्तराखंड वास्तव में देवभूमि है और यहां साक्षात देवता वास करते हैं। यहां निवास करने वाले लोगों के देवताओं से रिस्ते हैं इसके कई उदाहरण आज दिन तक सामने आ चुके है और हमारे पुराणों, वेदों में भी लिखे हुए हैं। इसी उत्तराखंड राज्य के रूद्रप्रयाग जनपद में स्थित बेंजी गांव आज पहचान के लिए मौहताज नहीं है। सदियों से इस गांव को ज्योतिष, शिक्षा, धर्म और आत्मीयता के साथ यहां के वासियों की विश्व के पटल पर दस्तक अपने आप में एक अनोखी मिसाल है।

 

इस गांव के इतिहास में कई ऐसे उदाहरण है जो इतिहास के पन्नों में है। आज हम अन्य पर बात न करते हुए परमब्रहम के सानिध्य में शरणगत स्वामी माधवाश्रम जी के बार में बात करेंगे।कहते हैं कि इंसान कर्मो के लिए चाहे जहां भी चला जाए, लेकिन मात्भूमि की याद उसे सदा आती है और हर व्यक्ति यही चाहता है कि उसकी मौत के बाद उसे जहां भी दफनाया जाए या जलाया जाए उस समय उसके मातृभूमि की मिटृटी की सुगंध उसे मिल जाए तो वह स्वर्ग अवश्य ही जाएगा।क्योंकि जीते जी हर दिन कम से कम एक बार मॉ और जन्मभूमि की याद सभी को आती है चाहे वह खुद ईश्वर ीाी क्यों न हो यह हमारे पुराणों में भी लिखा है।

 

” रामचरित मानस की वह पंक्ति ” संत हृदय नवनीत समाना … शंकराचार्य स्वामी माधवाश्रम महाराज में संत बनने से पहले ही यह सब थी। मेरे पिता के बडे भाई और सखा थे स्वामी जी तो पिताजी ने कुछ वर्ष पूर्व यह बतलाया था। आज वह प्रसंग याद आया। आपको बता दू कि काफी साल पहले पिताजी से स्वामी माधवाश्रम जी महाराज के बारे में चर्चा हुई थी। उस समय जो जानकारी पिताजी ने दी थी उसी के आधार पर यहां लिख रहा हू।आपको बता दू कि शंकराचार्य स्वामी माधवाश्रम महाराज की जन्म भूमि उत्तराखंड राज्य के रूद्रप्रयाग जिले में स्थित बेंजी गांव थी।

 

पिताजी के अनुसार, शंकराचार्य माधवाश्रम जी का नाम केश्वानन्द बेंजवाल था और वह बचपन्न से ही बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। ब्राहमण कुल में जन्म लेने के कारण कुशग्र बुद्धि औश्र ज्ञान का भंडार उनमें भी था। बच्पन्न से ही कुशाग्र बुधि थी और उनके चेहरे की वह चमक बचपन से लेकर उनके अंतिम यात्रा तक रहीं।बाल्यावस्था से लेकर प्रौढ तक जीवहन के हर रंग में रंगे रहे। सांसारिक जीवन में प्रवेश के कुछ समय बाद सांसारिक मायामोह को त्यागकर चले गए और काफी समय पर पता चला कि केश्वानन्द अब महान संत बन गए और अब स्वामी माधवाश्रम के नाम से प्रसिद्ध हुए। तो गांव वालों में  हर्ष की लहर दौढ पडी।

 

क्योंकि पिताजी बताते हैं कि ज्योतिष के विद्धान बडे बुर्जूगों ने पहले उनके संत बनते ही भविष्यवाणी कर दी थी कि वे एक महान संत बनेंगे और देश-विदेश में उनके हजारों अनुयायी होंगे। हुआ वहीं भी ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य बनने के साथ ही वह भविष्यवाणी भी साकार हुई और स्वामी जी धर्म के मार्ग के साथ राज्य आंदोलन और अनेक जनोपयोगी कार्यों में जग प्रसिद्ध हुए। शंकराचार्य पद पर विवाद करने वाले उनके विरोधी भी उनके पीछे उल्टा सीधा बोल लेते थे लेकिन उनके सामने कुछ नहीं कह पाते थं। क्योंकि उनके मुख की चमक के आगे सभी की आवाज बंद हो जाती थी। आज एसे महाप्रभु हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके मुख का तेज हाज भी हमारे ऑखों में वह चमक विखेर यह कह रहा है कि वह आज भी इसी धरा पर है सजीव और निर्जीव रूप में हर जगह हर स्थान पर।

 

 

बेंजी गाँव की मिट्टी संग भूसमाधि में प्रविष्ट हुऐ शंकराचार्य माधवाश्रम
बेंजी गाँव की मिट्टी के साथ आज सुबह मै भी महात्मा जी के अंतिम दर्शनो के लिऐ ऋषिकेश पहुचा। यह महज संयोग नही था बल्कि इस माटी का ही प्रताप था जो मुझ तुच्छ इंसान के मष्तिषक मे सदप्रेरणा भर कर गाँव की माटी ने अपने महान संत सपूत को श्रद्धाजंली अर्पित कर दी। भले ही संत समाज के नियम रिशते नातो की वर्जना को समाप्त करते हो लेकिन मानव शरीर के लिऐ जन्मभूमि का रिशता हमेशा की तरह अजर अमर होता है। आज जब यह दिव्य मूर्ति देह त्याग कर समाधिस्त होने जा रही है तब जन्मभूमि का यह सानिध्य उन्हे धराधाम की उस अनन्त यात्रा पर सुगमता प्रदान करे।

 

मै लोभवश यह कामना भी कर रहा हू कि हे जन्मदात्री पृथ्वी माँ ऐसी महान प्रतिभाओ को पुनः इस गाँव की भूमि में जन्म देना। जिसे मेरे गाँव, समाज और पहाड़ की यह भूमि धन्यभागी बने।हिन्दू धर्म के सबसे विशिष्ट सम्मानित पदवी शंकराचार्य अभिशिक्त होने पर स्वामी माधवाश्रम जी की जन्मभूमि भी धन्य धन्य हुई। ऐसी महान प्रतिभा पर सभी को गर्व होता है जो पूरे देश समाज के उत्थान के लिऐ कृत संकल्पित थे। धर्म, संस्कृति, शिक्षा, स्वास्थ की अविरलता के लिऐ महात्मा जी ने हमेशा बढ़ चढ़कर कार्य किया था। वे जनादंलनो मे भी सक्रिय रहे विशेषकर उत्तराखण्ड का पृर्थक पर्वतीय राज्य आदोलन, संस्कृत शिक्षा, गौरक्षा जैसे आन्दोलनो मे उन्होने समाजिक उत्थान को नयी दिशा दी थी।

 

पहाड़ के लिऐ भी महात्मा जी खास थे ईसलिऐ कि वो उत्तरभारत की इस ज्योतिषपीठ पर अभिशिक्त होने वाले पहाड़ी मूल के प्रथम शंकराचार्य थे। ज्योतिषपीठ उत्तराखण्ड में होने के बावजूद उनसे पहले कोई उत्तराखण्डी इस पद पर शुशोभित नही हो पाया था। संपूर्ण पहाड़ के लिऐ यह गर्व का विषय था। पहाड़ के समान उनकी जीवटता, मृदुभाषिता और विद्वता का हर कोई कायल था। यह दुर्लभ ही था कि उनके धुर विरोधी भी उनकी विद्वता के मुरीद थे। भक्तो, शिष्यो और विद्वत समाज की विशाल उपस्थिति के बीच पूज्यपाद प्रातःचिरस्मरणीय अन्नत विभूषित ज्योतिषपीठाधीश्वर जगदगुरू शंकराचार्य स्वामीटमाधवाश्रम जी को त्रिवेणी स्थित उनके जनार्दधन आश्रम में मंत्रोच्चार के बीच भूसमाधि दे दी गयी।मेरे गाँव बेंजी के समस्त ग्रामीणो की ओर से गाँव में जन्मी इस दिव्य मूर्ति को भावभीनी श्रद्धाजंली सादर अर्पित

शंकरं शंकराचार्यम केशवं वादरायणम |
सूत्र भाष्यकृतो वन्दे भगवन्तौ पुन: पुन: ||

दीपक बेंजवाल की फेसबुक वाल से साभार

 

 

ज्ञान और साधना के शिखर पर पहुंचने के बाद ” विनम्रता और सरलता विरले मनीषी में ही होती है ” “” ऐसे संत , साधक और ज्ञानी थे शंकराचार्य स्वामी माधवाश्रम महाराज ।

“” ज्ञान , साधना , पद , प्रतिष्ठा , के साथ साथ ” अंह या विकार स्वाभाविक रूप से आ जाता है । बडे बडे साधकों और ज्ञानी महाज्ञानियों को भी ” साधना का , ज्ञान का अंह अपनी चक्र में फंसा ही लेता है । या घोर साधक , ज्ञानी भी जाने अनजाने में इस भंवर में फंस ही जाता है । मगर महान साधक , ज्ञानी , संत ज्योतिषपीठाधीश्वर जगत गुरू शंकराचार्य स्वामी माधवाश्रम महाराज जैसे विरले ही तपस्वी इस धरा पर हुये होंगे , जो वेद , पुराण , शास्त्र , साधना , स्मृति , ब्याकरण , न्याय शास्त्र के मर्मज्ञ होने के बाबजूद भी ” निर्लिप्त , निर्विकार और सरलता के प्रतिमूर्ति थे ।

 

 

हिमालय में जन्मे , ब्रह्म क्या है ! संसार क्या है ! जीवन का अर्थ क्या है ! मानव जीवन का उद्देश्य क्या है ! सनातन धर्म के सिद्धांत क्या हैं ! भगवान शंकर के अवतार ” आदि गुरु शंकराचार्य जी जिस खोज में निकले और अपने उद्देश्य मे सफल हुये । उसी मार्ग पर चले थे शंकरचार्य पद्धति के जिज्ञासु और ज्ञान विपासु साधक दंडी स्वामी शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज । अदभुत जीवन यात्रा रही महाराज माधवाश्रम महाराज की । हिमालय में जन्म , शिक्षा अर्जन के लिए विभिन्न स्थानों , गुरूओं का सानिध्य , नर्वदा के तट से लेकर फिर हिमालय में साधना विचरण जीवन के सार को खोजने , ब्रह्म को जानने के लिए चरैवेति चरैवेति सी निरंतर खोज ।

 

 

इतने ज्ञानी होने और साधक होने के बाबजूद भी जो अलग और विलक्षणता मै ने महाराज में देखी । वह थी उनकी सरलता , विनम्रता । सचमुच अदभुत । ” रामचरित मानस की वह पंक्ति ” संत हृदय नवनीत समाना … शंकराचार्य स्वामी माधवाश्रम महाराज पर शत प्रतिशत उत्तीर्ण हो जाती थी । ज्ञान की साधना की परिप्वकता के बाबजूद भी उनमे बाल स्वभाव की सी सरलता देखी है मै ने ।पुराणों पर इतना गहरा अध्ययन कि कथा करते हुये उन्हें ” सुखदेव ” जी की उपाधमिमिली थी । स्नातक कक्षा में पढता था मैं जब तब महाराज जी से पहली बार मिला । वे रुद्रनाथ की पहाड़ियों पर जाने के लिये आये थे गोपेश्वर । दिब्य आकर्षक गौर वर्ण ।

 

 

भगवे वस्त्र में . हाथ में शंकराचार्य रुप वाला दंड , दूसरे हाथ में कमंडल । और मीठी सी मुस्कान । मंदिर में आये गोपेश्वर । मेरा घर मंदिर के निकट है । स्नातक कक्षा में पढता था । हल्की सी वाम मार्गी ” हवा ” लग गयी थी । अति उत्साह में ” ईश्वर है या नहीं ! धर्म क्या है ” क्यों आवश्यक है ! अल्प अध्ययन के वशीभूत महाराज से सवाल कर बैठा । कुछ प्रश्न अज्ञानता वश धृष्टता से भी किये । डास कैपिटल ” द पूंजी ” को पढा था । कार्ल मार्कस की इस पुस्तक को हिन्दी में मेरे परिवार के बडे भाई जो तत्कालीन सोवियत संघ में इंटर पीटर थे ह उन्होंने ने ही ” डास कैपिटल ” को ” द पूंजी ” के नाम से हिन्दी में अनुवाद किया था ।

 

 

घर वर्षों बाद आये थे तो मुझे पढने को दी । उसी को पढकर और सब्य साची की पत्रिकाओं को पढकर मैं स्वामी माधवाश्रम महाराज से शास्त्रार्थ करने की अज्ञानता कर बैठा । मगर मेरे किशोर वय के अध्ययन पर अस्वीकृति के बाबजूद भी महाराज ने जिस शालीनता से ” सनातन धर्म , धर्म , ईश्वर , सृष्टि की उत्पति के सिद्धांत को जितने मीठे ढंग से समझाया उसने मेरा जीवन ही बदल डाला । भारतीय दर्शन , सिद्धांत कै जिस शालीनता से महाराज ने समझाया वह झंकृत कर गया

 

पत्रकार क्रान्ति भट्ट् जी की वाँल से साभार