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Panchkedar : भविष्य के सपने उखीड़ में बोये गये धान की गुड़ाई अब तो…

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जेपी मैठाणी

Panchkedar part-2

अरे हाँ एक बात आप लोगों को बताना तो मैं भूल ही गया – इस बार के मैराथन यात्रा के लिए बने व्हाट्सएप्प ग्रुप में पूरी यात्रा में उपयोग में आने वाले 20 से अधिक सामानों की लिस्ट भेजी थी। लेकिन यात्रा में आए विजयुडु और रोहित रंजन ने शायद उस लिस्ट की तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया। हम लोग ऋषिकेश से ब्यासी की तरफ बढ़ रहे थे, सोनू जो कि टाटा सूमो का ड्राइवर था पहाड़ी घुमावदार रास्ते पर ऋषिकेश-हरिद्वार के मैदानी भागों से शिवालिक पर्वत श्रृंखला से होते हुए बेल, पापड़ी, खैर, साल, सिल्वर ओक, अमलतास के पेड़ों को पीछे छोड़ते हुए शिवपुरी, ब्यासी, कौड़ियाला, तोताघाटी, डालघाटी, साकनीधार, पाली, बछेलीखाल होते हुए तीनधारा पहुँचे। सारे रास्ते पहाड़ों को बेतरतीब वर्टिकल काटकर नैशनल हाईवे के विस्तार का कार्य चल रहा है।

पहले इस सड़क पर जो घुमावदार बैंड थे ऐसा लग रहा है उन्हें अभी सड़क पर जगह-जगह खड़ी की गयी ठेकेदारों की जे सीबी और पोकलैण्ड मशीने निगल गयी हैं। बैण्डों के बीच के स्थान में डंपिंग जोन बनाकर सड़क निर्माण सामग्री, मशीनें, मजदूरों के आवास, क्रेशर की रोड़ी, भूस्खलन रोकने के लिए लगाई जाने वाली गैवियन चैक डैम्स के जालियों को रखने के लिए स्थान बनाये गये हैं। लेकिन जगह-जगह मलबा अलकनन्दा नदी की ओर ढाल पर फेंका जाना जारी है। इस मार्ग के दोनों ओर कई जगहों पर बहुत सुंदर पीपल, आम, बरगद, साल, पापड़ी आदि के बड़े-बड़े पेड़ थे जो अब दिखाई नहीं दे रहे हैं।

साकनीधार से ठीक पहले बांये हाथ पर एक अकेला आम का पेड़ था। जब मैं पहली बार अपने पैसों से खरीदी बजाज कैलिबर क्रोमा (नवम्बर 2001) से अक्सर पीपलकोटी घर आता-जाता रहता तो इस आम के पेड़ के नीचे जरूर 15-20 मिनट रूकता। जाड़ा हो या गर्मी हो, ये सिलसिला चलता रहा। अब ये सारे पेड़ जो रास्ते के लैंडमार्क थे गायब कर दिए गये हैं।

अरे मैं फिर भटक गया- सोनू सूमो चला रहा है, हम ट्रैक की बातें कर रहे हैं कमलेश और अतुल भाई ड्राईवर की बगल की सीट में बीच-बीच में मेरी तरह ऊंघने लगते हैं। बीच में मेरे बगल में बैठे बिहार के रोहित रंजन और शैलेन्द्र अब ट्रैक में ले जाए जाने वाले कपड़ों की चर्चा करते हैं। तो पता चलता है कि रोहित रंजन किसी भी प्रकार के गर्म कपड़े जैसे- जैकेट, स्वेटर, थर्मलवेयर, विंडचीटर आदि लेकर ही नहीं आए हैं। और अगर वो आए हैं तो मैराथन की 6 टी-शर्ट लेकर। और कह रहे हैं हम 3-4 टी-शर्ट पहन लेंगे, हमें पता है वहाँ ज्यादा ठंड नहीं होगी।

मैं आश्चर्य से शैलेन्द्र का मुंह देखता हूँ। शैलेन्द्र कहते हैं- अरे! तुम मरवाओगे। पीछे विजयुडु हमारी बातें सुन रहे हैं लेकिन बोले कुछ नहीं। चढ़ाई पर चढ़ते हुए गाड़ी ने साकनीधार पार किया और अब हम बं्रच के लिए तीन धारा ढाबे पर उतर गये। ब्रंच करने के बाद जब हम आगे बढ़ते हैं तो देख रहे हैं सड़क के बायीं ओर के पहाड़ पूरे खोद दिए गये हैं। यहाँ तक कि तीन धारा का वो बड़ा बैंड जहाँ पर कुछ वर्ष पहले एक बस सीधे पहाड़ी पर लुढ़क गयी थी और उसमें सवार 30 से अधिक लोग मारे गए थे। सल्ला गाँव के एक परिचित सेमवाल भाई साहब भी इस दुर्घटना का शिकार हुए थे।

सड़क का यह पूरा बैंड काट दिया गया है। देवप्रयाग पहुँचकर ऊपर से भागीरथी और अलकनन्दा का संगम देख रहे हैं। सारे रास्ते सैकड़ों वाहन की आवाजाही है यात्रा पूरे शबाब पर है। ऊपर से आती अलकनन्दा हिंवाल का भूरा पानी यानि रेतीला सा पानी लाकर भागीरथी के साफ हरे पानी को सड़क की ओर धकेल रही है। और आ…गे… तक गंगा बनाकर बहा ले जाती है। दोनों नदियां पहाड़ से मैदान उतर रही है जैसे राज्य बनने के बाद यहाँ का भरापूरा समाज और युवा पीढ़ी सब लगता है मैदान की ओर बह रहे हैं। लेकिन हम वापस ऊपर पहाड़ की ओर बढ रहे हैं।

अब हम थोड़ी देर बाद देवप्रयाग पार करते हुए बागवान के बाद टिहरी की एक सर्वाधिक उपजाऊ कृषि भूमि माधो सिंह मलेथा के मलेथा गाँव पहुँचते हैं। यहाँ मैं सभी को माधो सिंह मलेथा की गूल की कहानी सुनाता हूँ। आजकल उस नहर के पानी में यात्री नहा धो रहे हैं। नीचे मलेथा के सेरे के एक कॉर्नर में शहतूत की बड़ी सी नर्सरी बना दी गयी है। पहले वहाँ पर गोविंद बल्लभ पंत इंस्टीट्यूट ऑफ़ हिमालयन एनवायरन्मेन्ट डेवलपमेंट का तकनीकी प्रसार केन्द्र था। सुना है अब इसी के आस पास से रेलवे लाईन कर्णप्रयाग तक जाएगी।

कीर्तिनगर में पुल पार करते हुए जब हम पहली बार अलकनन्दा को पार करते हैं गाड़ी रोकते हैं और चावल नदी में डाल देते हैं। इस बीच तय कर चुके हैं कि रंजन को श्रीनगर बाजार से स्वेटर या जैकेट दिलवाना बेहद आवश्यक होगा। श्रीनगर का विस्तार काफी हो गया है। पहले जहाँ गिने चुने दुपहिया दिखते थे। आजकल इन सड़कों पर सैकड़ों महिला-पुरूष धड़ल्ले से दुपहिया वाहन दौड़ा रहे हैं। रोडवेज़ के पुराने बसअड्डे पर अपनी गाड़ी खड़ी कर हम वहीं से नीचे बाजार में जा रहे हैं। बस अड्डे को सुधारा जा चुका है।

उसकी वर्तमान हालत देखकर थोड़ा ठीक लगा बीच में तो यह बस अड्डा आवारा पशुओं और शराबियों का अड्डा बन गया था। दो-तीन दुकान घूमने पर पता चलता है सब लाला कह रहे हैं, अब गर्मियों का सीज़न आ गया जाड़ों के कपड़े कहाँ से मिलेंगे। आखिर एक दुकान से रंजन के कपड़े ले लिए गये। मोलभाव हुआ लेकिन यहाँ पर भी विजयुडु बिल्कुल चुप हैं। थोड़ी देर में कुंवर सिंह जो कि हमारे साथ एक सहायक के रूप में होंगे, ने फ़ोन पर बताया कि मैं रूद्रप्रयाग में अगस्त्यमुनि जाने वाली सड़क पर खड़ा मिलूंगा।

धारी देवी के बाद उत्तराखण्ड के महत्वपूर्ण राजमार्ग के सबसे बड़े लैंडस्लाइड सिरौं बगड़ से होते हुए हम रूद्रप्रयाग पहुँचे। कुंवर सिंह से मिलते ही मुझे ऐसा लगा ये अधमने में है जैसे आधा यहाँ है और आधा जैसे गाँव में ही छूटा हुआ है। हाय हैलो के बाद हम अगस्तमुनि पहुँचे, सारा कस्बा बदला हुआ लग रहा है। कई नये भवन दुकानें, सरकारी बिल्डिंग बहुत कुछ बन गया है और बन रहा है। नीचे हल्की सी आवाज करती हुई मंदाकिनी नदी अलकनन्दा को मिलने के लिए बेताब है और रूद्रप्रयाग की तरफ भाग रही है। लेकिन केदारनाथ आपदा के समय की मंदाकिनी को याद करके रूह कांप उठती है।

मंदाकिनी के दोनों तटों पर 20-25 फीट के ऊपर पानी के बहाव और बाढ़ के निशान अभी भी दिखते हैं। नदी किनारे बहे खेत, नहर, पुल, सड़कें आज भी डरी सहमी लगती हैं। हम अगस्तमुनि बाजार में प्रवेश कर चुके हैं। तो मैंने ए टी एम जाना था लेकिन सारे उत्तराखण्ड की तरह बिना पैसे का ए टी एम उदास था। बगल में ब्रांच से आग्रह पर कार्ड स्वाइप कर पैसे लिए। अभी बमुश्किल दो-ढाई किमी0 चले होंगे कि सोनू की टाटा सूमो का एक्सल बोल गया। खड़-खड़ की आवाज के साथ गाड़ी खड़ी हो गयी। फटाफट उतरे धक्का मारकर गाड़ी को साईड लगाया।

ड्राइवर ने सूचना दी कि एक्सल टूट गया। जो हम 3-4 बजे गौरीकुंड पहुँचने वाले थे समझ गये कि अब रात हो ही जाएगी। सोनू फटाफट पैदल ही अगस्तमुनि की तरफ भागा और हमारे साथ के सहयात्री मंदाकिनी के साफ पानी की बहती जलधारा की ओर। कमलेश, रंजन, शैलेन्द्र, विजयुडु और अतुल देखते ही देखते मंदाकिनी के साइड की जलधारा में डुबकी लगाकर गर्म चट्टानों पर पसर गये। मैं काफी देर तक ऊपर से ही इस सारे क्षेत्र को देखता रहा।

तबाही के निशान देखकर मन अजीब हो गया। पहले मैंने इस क्षेत्र में हरे-भरे खेत, छोटी सुंदर पगडंडियां, एक-दो मछली के तालाब, लोगों को लाते ले जाते मजबूत पुल देखे थे। जो केदारनाथ की आपदा के बाद गायब हैं। 2013 के जून माह से 2018 के मई माह तक 5 साल बीत जाने पर भी ऐसा नहीं लगता कि जन-जीवन सामान्य हो गया हो। पूरे स्ट्रैच में दिख रहे नये मकान, दुकान, होटल, लाॅज इस बात का प्रमाण हैं कि पहले का कुछ बचा नहीं।

अचानक मैं देखता हूँ एक महिला मंदाकिनी के तट की ओर बढ़ रही है उसके पीछे 10-11 साल की एक लड़की और थोड़ी दूरी पर 7-8 साल का एक लड़का लाल टीशर्ट में जिसका दांया हाथ नहीं है उछलते-उछलते नीचे को भाग रहा है। उससे थोड़ी दूरी पर उसके पिताजी भी नदी की ओर चल रहे हैं। अरे ये कहीं वही लड़का तो नहीं, जो आपदा के समय ट्रॉली में फंस गया था और उसका दाहिना हाथ कट गया था साथ ही बांयी हाथ के बीच की दो उंगलियां ट्रॉली की गरारी में और तार में आ गयी थी।

मैंने मन बहादुर … आवाज लगाई वो झट पीछे घूम गया और नमस्ते दुआ सलाम हुआ। तब तक उसका बेटा वहाँ आ गया। रूद्रप्रयाग के पत्रकार मोहित डिमरी की वजह से इनसे मिला था। तब फेसबुक पर भी इस बालक जो उस समय 4 साल का रहा होगा के लिए मदद करने की गुहार की थी। मन बहादुर बताते हैं बेहद लिखा-पढ़ी के बाद बड़ी मुश्किल से सरकार ने 75 हजार रूपये दिए लेकिन मेरे बेटे का जीवन बर्बाद हो गया।

ये आपदा के द्वारा दिए गये जख्मों की कड़वी सच्चाई थी। अगर ये बेटा किसी नेता, अभिनेता या रसूखदार व्यक्ति का होता तो क्या उसको भी यही सब झेलना पड़ता जो आज तुलाराज और उसके परिवार को झेलना पड़ा। अब प्रकृति का अजीब इत्तेफाक देखिए गाड़ी यहीं आकर खराब हुई चर्चा के दौरान ही नदी में नहा आये संगी साथी चर्चा में शामिल हो गये और वो भी हतप्रभ थे कि ये कैसा इत्तेफाक हुआ।

तुला तीसरी कक्षा में पढ़ता है, दायाँ पूरा हाथ और बांयी हाथ की दो उंगलियां भी कट जाने की वजह से उसे लिखने में बहुत कठिनाई होती है। लेकिन वो स्कूल जाता है यह अच्छी बात है। मन भारी हो गया, पिता चिंतित है बड़े होकर इसका क्या होगा। बातचीत के बाद हम उसको विदा करते हैं। नहाने के बाद लोग भूखे हैं अब ढाबे की खोज शुरू हुई। कुंवर ंिसंह गाड़ी के पास सोनू का इंतजार कर रहा है।

हम लगभग एक किमी वापस रूद्रप्रयाग की ओर आकर एक नये बने होटल में खाना खाते हैं और लटकते -फटकते हैं। पता चला सोनू मैकेनिक के साथ पहुंच गया है और गाड़ी का काम चल रहा है। गाड़ी ठीक हुर्ह जय केदार बाबा बोलते हुए भीरी चंद्रापुरी पार ही किया था कि धुंआधार बारिश शुरू हो गयी। मैं पहले ही सोनू को कह चुका था कि बरसाती बांध दे पर उसने कहा अभी बारिश नहीं आती। अब उसे बारिश में भीगना पड़ रहा है। अभी हम कुंड नामक जगह के पास हैं, अचानक ठंड बढ़ गई है। रंजन बोल उठा- भाई साहब एक दर्जन टीशर्ट से भी कुछ नहीं होगा। विजयुडु की जैकेट निकल गयी। रात होते-होते हम सोनप्रयाग पहुँच गये।

ठंड बहुत बढ़ गयी है पुलिस वालों ने गाड़ी रोक दी और कहा गौरी कुंड तो यहीं की फ्लीट जाएगी अन्य वाहन नहीं जा सकते। हमने चैकी इंचार्ज को चिट्ठी दिखाई और उनकी अनुमति के बाद हम आगे बढ़ गए। गौरीकुंड आते ही संगी साथी जो 6 टीशर्ट और सिर्फ बरमूडा लेकर आए थे, कांपने लगे हैं। रात का भोजन करने तक विजयुडु पास के दुकानों से लोअर का इंतजाम कर चुके हैं। मुझे ये बड़ा आश्चर्य हुआ कि एक तरफ तो ये जैकेट लेकर आए हैं और दूसरी तरफ किसी भी प्रकार का लोअर लेकर नहीं आए हैं। ये हिमालय में ट्रैकिंग का कौन सा काॅम्बिनेशन है। रंजन नई जैकेट में शायद उद्घाटन कर चुका था और खुश नजर आ रहा था।

और इससे आगे का किस्सा पहली किश्त में मैं बता चुका हूँ। चलो वापस चलते हैं कालीमठ …

केदारनाथ पहुँचकर जब ये पता चला कि केदारनाथ से खाममनड़ी होते हुए मदमहेश्वर भारी बर्फ की वजह से नहीं जा सकते तो कालीमठ से रांसी गौंडार होते हुए मदमहेश्वर जाने के दूसरे प्लान पर हमारी सहमति हुई। देर शाम कालीमठ पहुँचे हल्का अंधेरा छाने लगा। पास ही के छोटे होटल में खाने का आॅर्डर देकर हम मंदिर की तरफ भागते हैं। यहाँ पर भी जो नदी बह रही है उसको काली गंगा कहते हैं। दूसरी काली गंगा भारत-नेपाल के बीच कुमांउ क्षेत्र में बहती है। स्थानीय लोगों ने बताया शाम की आरती होने वाली है जल्दी-जल्दी आ जाओ।

पर हमें तो पहले रहने का ठौर-ठिकाना ढूंढना था। यहाँ कालीमठ के षटभुजाकार के मंदिर परिषद में सांसद निधि से बनी शानदार धर्मशाला है लेकिन उस पर ताला जड़ा रहता है, स्थानीय पुजारी ना तो उसे धर्मशाला के इंचार्ज के बारे में बताते हैं ना चाभी के बारे में। सूचना पट पर कोई जानकारी नहीं है। ये शायद इसलिए क्योंकि बगल में श्री हंस धर्मसभा की पैसे वाली धर्मशाला है। खै़र बुक नम्बर 7674 रसीद नं0 39 शैलेन्द्र सिंह बिष्ट के नाम से 700 रूपये में कटती है। बद्रीनाथ मंदिर समिति की सांसद निधि से बनी धर्मशाला सिर्फ एक ढकोसला है।

बल्कि ये कहें कि सरकारी जमीनों को धर्म के नाम पर बटोर लिया गया है। जब इन धर्मशालाओं में खाली होने पर भी किसी रहने की जगह नहीं मिलनी है, तो इनका औचित्य क्या है। मंदिर के बाहर ढोल बजने लगा, घंटियों की आवाज घाटी में गूंज रही है। ढोली रमेश जो गाइड का काम भी करता है अपनी जान-पहचान बढ़ाता है। और पुजारी भट्ट जी आरती प्रारंभ करते हैं। हम सारे के सारे अन्य 10-12 यात्रियों के साथ जो संभवतः देहरादून के थे काली मठ के श्रीयंत्र के चारों तरफ खड़े होकर पूजा में तल्लीन, वातावरण बेहद शांत है।

केदारनाथ से वापसी की थकान काफूर हो गई। आरती के बाद पंडित जी पास के अन्य मंदिरों में भी ले जाते हैं। सब अपनी-अपनी श्रद्धा के अनुसार नतमस्तक हैं। कमरे पर आकर फटाफट रात के खाने के लिए होटल की ओर जाने की जुगत है। कल सुबह इस यात्रा का सबसे लम्बा रास्ता तय करना है। गनीमत है कि मोबाइल का कोई ना कोई नेटवर्क मिलता है। यात्रा के अपडेट अनीता को भेजकर हम पसर जाते हैं और कब रात खर्राटों में बदल गयी ये सुबह साढे चार बजे कुंवर ंिसंह की चाय की आवाज के साथ जाग उठती है।

काला स्याह आसमान ऊपर चाँद का झांकना नीचे काली गंगा की आवाज ये सब आध्यात्मिक और अलौकिक था। हालांकि अलस्सुबह की पूजा में मैं और शैलेन्द्र शामिल नहीं हुए लेकिन अतुल भाई, कमलेश, रंजन और विजयुडु के साथ कुंवर सिंह शायद नहा धोकर पूजा में शामिल हुए। इस धर्मशाला की एक बात अच्छी थी। कमरे बेहद साफ-सुथरे, टाॅयलेट साफ-सुथरे थे और फ्री का गर्म पानी ये सब आनंद लेते हुए सुबह की देर वाली पूजा, ग्रुप फोटोग्राफी, चंद्रमोहन भट्ट पुजारी जी को एड्रेस और दुआ सलाम कर हम सुबह अंधेरे मुंह रांसी की ओर निकल पड़ते हैं।

कालीमठ में पी डब्ल्यु डी का आॅफिस है मुख्य बाजार के बाद सड़क से हमको सीधे ऊपर बांयी ओर चढ़ना है। सुबह-सुबह की ये थकान वाली चढ़ाई ढाई किमी तक छूटती ही नहीं है। नीचे घाटी में काली नदी छूट रही है। नदी के किनारे की काली सड़क छूट रही है। सुबह-सुबह का स्याह भरा काला माहौल छूट रहा है। ऊपर धार में आने से पहले हम ये सोच रहे हैं ये जो बेतरतीब सड़कें खोदी गयी हैं, ये कहाँ से शुरू हो रही हैं और कहाँ खत्म हो रही है पता ही नहीं चल रहा है।

क्योंकि कालीमठ बाजार से रांसी गाँव की ओर जो सड़क कटी है वो इतनी सीधी चढ़ाई वाली है कि जिस पर 13-14 किलो का बैग पीठ में लादकर मैराथन दौड़ने वाले या मैं खुद ही थक रहा था उस पर गाड़ियां चलेंगी कैसे। इस कमाल की इंजीनियरिंग पर हंसी आ रही थी पर हंसी के साथ अफसोस हो रहा था। ऊपर एक शानदार चीड़ का पेड़ मिला, शायद इस जगह का नाम उखतोली था। और ऊँचाई 1826 मीटर। आगे गाँव की बसाकत और सर्पीली सड़क के किनारे खेतों में पहाड़ की रीढ़ भविष्य के सपने उखीड़ में बोये गये धान की गुड़ाई के साथ विस्तारित हो रहे हैं।

थोड़ी देर बाद पानी के धारे गाँव की पगडंडियां पार कर जब सामने पहुँचते हैं तो मधुगंगा के उस पार ऊखीमठ, मनसूना वाली पूरी घाटी दिखाई दे रही है। और पता चलता है हम जग्गी बगवान पहुँच गये हैं। सुंदर सी एक छोटी चाय की दुकान में बैग नीचे रख दिए गये हैं, नाश्ता कुछ किया नहीं है 7-8 किमी0 चल चुके हैं। जो शैलेन्द्र ने पिंजरी की याद दिलाई, पिंजरी प्लेट में अभी रखी गयी है कि सिरे से गायब हो गई। ये आज सुबह का नाश्ता चाय के साथ।

रास्ता लम्बा है और किस्से कहानियां भी चलो वो तीसरे भाग में सुनते हैं…

अरे हाँ एक बात आप लोगों को बताना तो मैं भूल ही गया – इस बार के मैराथन यात्रा के लिए बने व्हाट्सएप्प ग्रुप में पूरी यात्रा में उपयोग में आने वाले 20 से अधिक सामानों