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पिज्जा और चाउमीन वालो जरा कोंणी का राबड़ा और झंगोरे का छंसेड़ा को भी चखो !

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उत्तराखंड की पौराणिक और औषधी से पूर्ण यह पकवान फिर से लौटने लगे अपने स्वरूप में। वर्तमान पीढी भी जानना चाह रही इसके बारे में

उदय दिनमान डेस्कः पिज्जा और चाउमीन वालो जरा कोंणी का राबड़ा और झंगोरे का छंसेड़ा को भी चखो !वर्तमान युवा पीढी शायद इसके बारे में जानती भी नहीं है वह भी खासकर उत्तराखंड की। लेकिन देश के अन्य कौनों और विदेशी खासकर इसकी मांग यहां आकर करते हैं। इसके बारे में पिछली कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने जब इसके लिए पहल की थी तो उस समय शायद उत्तराखंड के उन लोगों को याद आयी इन सबकी जो खुद को पहाडी बोलने में शर्म करते हैं। आज के दौर में इसकी उपयोगिता और इसके औषधीय गुणों के बारे में बता रहे है वरिष्ठ पत्रकार हरीश मौखुरी का यह आलेख।

का राबड़ा और झंगोरे का छंसेड़ा

“कोंणि ” यही स्थानीय नाम है उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में उगने वाले इस पौष्टिक द्यान्न का। आज से करीब 50-60 साल पहले जब गेहूं चावल ना के बराबर होता था तब यही कोंणी , कोदा, झंगोरा, गहत , भट्ट भंगजीरा जैसे पौष्टिक अनाज पर्वतीय क्षेत्रों के मुख्य खाद्यान्न थे। कोंणी ना केवल एक पौष्टिक खाद्यान्न था बल्कि इस इसका भात खाने के बाद घंटों भूख नहीं लगती थी, गरीबी के दिनों में यही एक प्रमुख खाद्यान्न होता था।

डायबिटीज के मरीजों के लिए और दादरा नामक बीमारी में मेडिसन का काम भी करता था। मट्ठे के साथ मिलाकर पकाने के बाद कोंणी का राबड़ा और झंगोरे का छंसेड़ा हमने बचपन में छक खाया, और पाटी ग्वलख्या पकड़ी अर दौडे़ इस्कूल तब मिड डे मील नहीं मिलता था । यह खाना निरोगी बनाने के साथ-साथ पर्याप्त पोषण भी देता था जिससे बीमारियां नहीं होती थीं। इस राबड़े में चोलाई और मूली की हरी पत्तियां डाली जाती थी, बस यूं समझ लीजिए एक कंपलीट हेल्दी न्यूट्रिशियस डाइट बन जाता है। लेकिन आज कोंणी का अस्तित्व खतरे में है।

कोंणी उगना पिछले 20 सालों से पहाड़ में लगभग बंद सा हो गया है, यहां के किसान अब कोणी नहीं उगा रहे हैं । इसकी बालड़ी को तोता नामक पक्षी और बन्दर बहुत नुकसान पहुंचाते हैं, इसके स्वाद के कारण वे कोंणी वाले खेत की तरफ खिंचे चले आते हैं इससे कोणी की फसल को तो नुकसान होता ही है साथ ही किसानों की अन्य फसल भी बर्बाद हो जाती है।

कोंणी का नटा घास चारे के काम भी नहीं आता है, इस कारण किसानों ने कोंणी जैसी फसल की तरफ से उदासीनता बरत ली है, इसका खामियाजा यह हुआ कि इतनी सुंदर मेडिसन और पोस्टिक खाना हमारी थालियों से गायब हो गया। हरीश रावत सरकार कोदा, झकझोरा, मंडरा, भट्ट गहथ की तो बात करती है लेकिन कोंणी पर उनका भी ध्यान नहीं जा सका है।

दरअसल कोंणी पर रिसर्च की बहुत ज्यादा जरूरत है। कोणी व इसके के भात में ओमेगा-3 फैटी एसिड्स होता है जो हमारे हार्ट के लिए बहुत अच्छा होता है। पहाड़ पर एक “भंगजीरा” नामक फसल होती थी भंगजीरे के सेवन से कैंसर नहीं होता, लेकिन पहाड़ों से भंगजीरा और कोंणी की फसल तेजी से गायब हो रही है। हमारे बीज बचाओ आंदोलन के पुरोधा लगता है सिर्फ पुरस्कारों के लिए काम कर रहे हैं, वे तमाम पुरस्कार तो झटक लेते हैं, लेकिन किसानों के खेत में कोणी और भंगजीरा फिर से कैसे उगे, इसके लिए रीति नीति और विधि तय नहीं कर पाते।

उत्तराखंड का मतलब ही यह है कि यहां की कठिन परिस्थितियों में जीने के लिए प्रकृति ने इतने पौष्टिक और आरोग्य वर्धन करने वाले अनाज पैदा किए थे। जिन्हें हमने जाने अनजाने उपेक्षा के कारण खेतों और थाली से गायब कर दिया है। भविष्य में यदि कोई पीढ़ी कोणी झंगोरा और भांग पर शोध करेगी, तो पाएगी की कोणी हार्ट के लिए, झंगोरा डायबिटीज के लिए, भंगजीरा कैंसर के लिए और भांग स्किन डिजीज के लिए बहुत अच्छी खुराक है। इतनी कीमती फसलों की उपेक्षा और थाली से गायब करने में नई चाउमीन खाने वाली आलसी पीढ़ी की भी भूमिका रही,

पहली बात तो यह हुई कि कोंणी का टेस्ट है नई पीढ़ी को रास नहीं आ रहा। दूसरा इन अनाजों को मोटा अनाज, ग्रामीण अनाज, गरीब का अनाज समझ कर हेय दृष्टि से देखा जा रहा है। सरकार ने यह सराहनीय कदम उठाया है कि इन अनाजों की महत्ता और उगाने के लिए किसानों को पहली बार प्रोत्साहित किया जा रहा है। परन्तु हर हाल में यह निरन्तरता बनी रहे तभी ये प्रयास सफल हो सकते हैं ।

-डॉ हरीश मैखुरी

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