udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news मानो या न माने लेकिन 33करोड़ देवी-देवता क्रौंच पर्वत में हैं तपस्यारत

मानो या न माने लेकिन 33करोड़ देवी-देवता क्रौंच पर्वत में हैं तपस्यारत

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लक्ष्मण सिंह नेगी

ऊखीमठ-चमोली जिले के विकासखण्ड़ पोखरी में आयोजित 9वें खादी पर्यटन औघोगिक किसान विकास मेले में प्रदेश के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने क्रौच पर्वत पर विराजमान भगवान कार्तिक स्वामी मंदिर को पर्यटन के मानचित्र पर लाने की घोषणा करते हुए सीएम ने कहा कि इस दिशा में भी भरसक प्रयास किये जाएंगे। इससे पर्यटकों का रूख कार्तिक स्वामी की ओर बढे़गा। जिससे क्षेत्र की आर्थिकी सुदृढ होने के साथ-साथ अन्य तीर्थ व पर्यटक स्थलों का समुचित विकास होने के अलावा स्थानीय बेरोजगारो को स्वरोजगार के अवसर प्राप्त होंगे आठ हजार पांच सौ तीस फीट की ऊंचाई व पट्टी तल्लानागपुर, दशज्यूला, चन्द्रशिला, तल्ला कालीफाट के शीर्ष पर विराजमान भगवान कार्तिक स्वामी 360 गांवों के कुल ईष्ट एवं भूम्याल देवता के रूप में पूजे जाते है। इस तीर्थ में प्रतिवर्ष जून माह में महायज्ञ व पुराण वाचन होता है, साथ ही बैकुंठ चतुर्दशी व कार्तिक पुर्णिमां को यहां लगने वाले मेले में सैकड़ों श्र(ालु पहुंचकर पुण्य अर्जित करते हंै। शिवपुराण के केदारखण्ड के कुमार अध्याय में वर्णित है कि जब शिव-पार्वती ने गणेश को प्रथम स्थान दिया था तो भगवान कार्तिकेय माता-पिता से रूष्ट हो गये और अपने शरीर का खून पिता व मांस माता को सौंपकर निर्वाण रूप लेकर क्रौंच पर्वत पर तपस्या में लीन हो गए थे।
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कई वर्ष व्यतीत होने के बाद पुत्र विरह में पार्वती ने भगवान शिव से कार्तिकेय से मिलने की बात कहीं। पार्वती को साथ लेकर भगवान शिव कार्तिक मास की बैकुंठ चतुर्दशी को कार्तिकेय से मिलने क्रौंच पर्वत पहुंचे, जब कार्तिक स्वामी ने माता-पिता को क्रौच तीर्थ में आते हुए देखा तो वे हिमालय की ओर कार्तिक स्वामी मंदिर से चार कोस आगे अग्रसर हो गए। पुराणों में वर्णित है कि जब भगवान कार्तिकेय माता-पिता से रूष्ट होकर क्रौच पर्वत आए तो देवताओं के सेनापति होने कारण 33करोड़ देवी-देवता भी क्रौंच पर्वत पर आकर पाषण रूप में तपस्यारत हो गए। क्रौच पर्वत पर 33 करोड़ देवी-देवताओं ने शिव पार्वती की रात भर पूजा-अर्चना की थी।

कार्तिक पूर्णिमां के पर्व पर भगवान शिव और माता पार्वती कैलाश के लिए रवाना हुए। उनके कैलाश रवाना होने के बाद भगवान कार्तिकय अपने तीर्थ पर पुनः तपस्यारत हो गए, तब से लेकर वर्तमान समय तक स्थानीय श्र(ालु बैकुंठ चतुर्दशी व कार्तिक पूर्णिमां के दिन दो दिवसीय मेले का आयोजन करते हैं। तीर्थटन व पर्यटन की अपार संभावाओं को अपने आंचल में समेटे कार्तिक स्वामी तीर्थ के दिन निकट भविष्य में बहुर सकते है। इस तीर्थ को पर्यटन मानचित्र पर लाने की कवायद की जा रही है। यदि ऐसा हुआ तो यहां पर्यटन को गति मिलेगी।
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स्थानीय व्यावसायियों का मानना है कि इस तीर्थ के विकसित होने से क्षेत्र के अन्य तीर्थ एवं पर्यटन स्थालों का समुचित विकास होने के साथ क्षेत्र की आर्थिकी मजबूत होगी और स्थानीय बेरोजगारों को स्वरोजगार के अवसर प्राप्त होगें कार्तिक स्वामी तीर्थ में सबसे पहले 1942 में महायज्ञ व पुराण वाचन का आयोजन किया गया जो कि हर तीसरे वर्ष आयोजित होता था। 1996 में क्षेत्रीय जनता द्वारा मंदिर समिति का गठन कर जून माह में प्रतिवर्ष महायज्ञ व पुराण वाचन का आयोजन किया जाता है। क्रौच पर्वत से निकलने वाली नीलगंगा में 360 कुंड माने जाते हैं।

कहा गया है कि जो भी श्र(ालु इन 360 कंुडों का दर्शन करता हैं, उसके जन्म-जन्मांतरों से लेकर कल्प-कल्पांतरों के पापों का हरण होता है। लोक मान्यता है कि कार्तिक स्वामी देवताओं के सेनापति होने के कारण कार्तिक स्वामी निर्वाण रुप लेकर क्रौंच पर्वत पर तपस्यारत हुए तो 33 करोड़ देवी-देवता क्रौच पहुंचे और पाषण रुप में तपस्यारत हो गये, इसलिए क्रौच के हर पत्थर को किसी न किसी आकृति में देखा जा सकता है। यहां से चैखम्बा का विहंगम दृश्य, अखंख्य पर्वत श्रंृखलाएं एवं हिमालय की श्वेत चादर, अलकनंदा-मंदाकिनी नदियों को एक साथ देखा जा सकता है। स्थानीय जनता का कहना है। कि कार्तिक स्वामी तीर्थ के पर्यटन मानचित्र पर आते ही तल्लानागपुर, दशज्यूला, चन्द्रशिला व तल्ला कालीफाट के पर्यटक एंव तीर्थ स्थलों का भी सर्वांगीण विकास होगा।
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कार्तिक स्वामी, रुद्रप्रयाग जिले के पवित्र पर्यटक स्थलों में से एक है। रुद्रप्रयाग शहर से 38 किमी की दूरी पर स्थित इस जगह पर भगवान शिव के पुत्र, भगवान कार्तिकेय, को समर्पित एक मंदिर है। समुद्र की सतह से 3048 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह स्थान शक्तिशाली हिमालय की श्रेणियों से घिरा हुआ है। पुराण कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव ने अपने दोनों पुत्रों से कहा कि वे पूरे ब्रह्माण्ड का चक्कर लगा कर आएं और घोषित किया कि जो भी पहले चक्कर लगा कर यहाँ आएगा वह माता-पिता की पूजा करने का प्रथम अवसर प्राप्त करेगा।भगवान श्री गणेश, जो कि शिव जी के दूसरे पुत्र थे, ने अपने माता-पिता के चक्कर लगाकर (श्री गणेश के लिए उनके माता-पिता ही ब्रह्माण्ड थे) यह प्रतियोगिता जीत ली, जिससे कार्तिकेय क्रोधित हो गए। तब उन्होंने अपने शरीर की हड्डियाँ अपने पिता को और मांस अपनी माता को दे दिया। ये हड्डियाँ अभी भी मंदिर में मौजूद हैं जिन्हें हज़ारों भक्त पूजते हैं। रुद्रप्रयाग – पोखरी मार्ग पर स्थित इस मंदिर तक कनक चौरी गांव से 3 किमी की ट्रेकिंग के द्वारा पहुंचा जा सकता है। कार्तिक स्वामी का मंदिर भगवान शिव के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय जी को समर्पित है। यह मंदिर उत्तराखण्ड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है, इस मंदिर तक पहुंचने के लिये कनकचौरी तक सड़क मार्ग है और उससे आगे तीन कि०मी० की पैदल यात्रा करनी होती है। यह मंदिर बारह महीने श्रद्धालुओं के लिये खुला रहता है, मंदिर के प्रांगण से चौखम्बा, त्रिशूल आदि पर्वत श्रॄंखलाओं के सुगम दर्शन होते हैं।
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समुद्रतल से 3048 मी. की उँचाई पर बना सुंदर मंदिर भगवान शिव के बड़े पुत्र कार्तिके जी को समर्पित है जहाँ वे एक छोटी शीला पर वास करते हैं. मंदिर के चारों ओर घंटियों की कतारें सी लगी थी जो इस बात की सूचक थी की ये तीर्थ एक मनोकामना सिद्धि स्थल है. कई हज़ार फीट गहरी खाईयाँ, हरी चादर ओढ़े परत दर परत फैली मनमोहक पहाड़ियाँ और स्तब्ध कर देने वाले हिम शिखर इस पावन धाम की पहरेदारी करते प्रतीत होते हैं. अगर आप भाग्यशाली हो और मौसम साफ़ हो तो इस पवित्र स्थल से बंदरपूंछ, केदारनाथ, सुमेरू, चौखंबा, नीलकंठ, द्रोनागिरी, नंदा देवी आदि पर्वत शिखरों के भव्य व मनोहारी दर्शन होते हैं. हम भाग्यशाली तो थे जो हमे इस तीर्थ के दर्शन करने को मिले, पर मौसम ने हमारा साथ नही दिया और घने बदल इन बर्फ़ीली चोटियों पर काफ़ी देर तक मंडराते रहे. मंदिर के कपाट अभी बंद थे और हम तीनो के सिवाय वहाँ कोई और मौजूद नही था, तो हम तीनो वहीं आस पास की जगह का मुआयना करने लगे. असीम शांति और खूबसूरत कुदरती नज़ारे पूरे माहौल को एक अध्यात्मिक व अलौकिक रूप दे रहे थे, वास्तव मे स्वर्ग जैसा.

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श्री शैलम (मल्लिकार्जुन) ज्योतिर्लिंग स्कंद पुराण में वर्णित कथा।
पित्रोश्च पूजनं कृत्वा प्रकान्तिं च करोति यः।
तस्य वै पृथिवीजन्यं फलं भवति निश्चितम्।।
शिव पार्वती के पुत्र स्वामी कार्तिकेय और गणेश दोनों भाई विवाह के लिए आपस में कलह करने लगे। कार्तिकेय का कहना था कि वे बड़े हैं, इसलिए उनका विवाह पहले होना चाहिए, किन्तु श्री गणेश अपना विवाह पहले करना चाहते थे। इस झगड़े पर फैसला देने के लिए दोनों अपने माता-पिता भवानी और शंकर के पास पहुँचे। उनके माता-पिता ने कहा कि तुम दोनों में जो कोई इस पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले यहाँ आ जाएगा, उसी का विवाह पहले होगा। शर्त सुनते ही कार्तिकेय जी पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए दौड़ पड़े। इधर स्थूलकाय श्री गणेश जी और उनका वाहन भी चूहा, भला इतनी शीघ्रता से वे परिक्रमा कैसे कर सकते थे। गणेश जी के सामने भारी समस्या उपस्थित थी। श्रीगणेश जी शरीर से ज़रूर स्थूल हैं, किन्तु वे बुद्धि के सागर हैं। उन्होंने कुछ सोच-विचार किया और अपनी माता पार्वती तथा पिता देवाधिदेव महेश्वर से एक आसन पर बैठने का आग्रह किया। उन दोनों के आसन पर बैठ जाने के बाद श्रीगणेश ने उनकी सात परिक्रमा की, फिर विधिवत् पूजन किया-
पित्रोश्च पूजनं कृत्वा प्रकान्तिं च करोति यः।
तस्य वै पृथिवीजन्यं फलं भवति निश्चितम्।।
इस प्रकार श्रीगणेश माता-पिता की परिक्रमा करके पृथ्वी की परिक्रमा से प्राप्त होने वाले फल की प्राप्ति के अधिकारी बन गये। उनकी चतुर बुद्धि को देख कर शिव और पार्वती दोनों बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने श्रीगणेश का विवाह भी करा दिया। जिस समय स्वामी कार्तिकेय सम्पूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके वापस आये, उस समय श्रीगणेश जी का विवाह विश्वरूप प्रजापति की पुत्रियों सिद्धि और बुद्धि के साथ हो चुका था। इतना ही नहीं श्री गणेशजी को उनकी ‘सिद्धि’ नामक पत्नी से ‘क्षेम’ तथा बुद्धि नामक पत्नी से ‘लाभ’, ये दो पुत्ररत्न भी मिल गये थे। भ्रमणशील और जगत का कल्याण करने वाले देवर्षि नारद ने स्वामी कार्तिकेय से यह सारा वृतान्त कहा सुनाया। श्रीगणेश का विवाह और उन्हें पुत्र लाभ का समाचार सुनकर स्वामी कार्तिकेय जल उठे। इस प्रकरण से नाराज़ कार्तिक ने शिष्टाचार का पालन करते हुए अपने माता-पिता के चरण छुए और वहाँ से चल दिये।
माता-पिता से अलग होकर कार्तिक स्वामी क्रौंच पर्वत पर रहने लगे। शिव और पार्वती ने अपने पुत्र कार्तिकेय को समझा-बुझाकर बुलाने हेतु देवर्षि नारद को क्रौंचपर्वत पर भेजा। देवर्षि नारद ने बहुत प्रकार से स्वामी को मनाने का प्रयास किया, किन्तु वे वापस नहीं आये। उसके बाद कोमल हृदय माता पार्वती पुत्र स्नेह में व्याकुल हो उठीं। वे भगवान शिव जी को लेकर क्रौंच पर्वत पर पहुँच गईं। इधर स्वामी कार्तिकेय को क्रौंच पर्वत अपने माता-पिता के आगमन की सूचना मिल गई और वे वहाँ से तीन योजन अर्थात छत्तीस किलोमीटर दूर चले गये। कार्तिकेय के चले जाने पर भगवान शिव उस क्रौंच पर्वत पर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हो गये तभी से वे ‘मल्लिकार्जुन’ ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध हुए। ‘मल्लिका’ माता पार्वती का नाम है, जबकि ‘अर्जुन’ भगवान शंकर को कहा जाता है। इस प्रकार सम्मिलित रूप से ‘मल्लिकार्जुन’ नाम उक्त ज्योतिर्लिंग का जगत में प्रसिद्ध हुआ ।

श्रीशैलम (श्री सैलम नाम से भी जाना जाता है) नामक ज्योतिर्लिंग आंध्र प्रदेश के पश्चिमी भाग में कुर्नूल जिले के नल्लामल्ला जंगलों के मध्य श्री सैलम पहाडी पर स्थित है। यहाँ शिव की आराधना मल्लिकार्जुन नाम से की जाती है। मंदिर का गर्भगृह बहुत छोटा है और एक समय में अधिक लोग नही जा सकते। इस कारण यहाँ दर्शन के लिए लंबी प्रतीक्षा करनी होती है। स्कंद पुराण में श्री शैल काण्ड नाम का अध्याय है। इसमें उपरोक्त मंदिर का वर्णन है। इससे इस मंदिर की प्राचीनता का पता चलता है। तमिल संतों ने भी प्राचीन काल से ही इसकी स्तुति गायी है। कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य ने जब इस मंदिर की यात्रा की, तब उन्होंने शिवनंद लहरी की रचना की थी। श्री शैलम का सन्दर्भ प्राचीन हिन्दू पुराणों और ग्रंथ महाभारत में भी आता है।
रावण का वध करने के बाद राम और सीता ने भी मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के दर्शन किए थे। द्वापर युग में युधिष्ठिर, अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव ने इनकी पूजा-अर्चना की थी। राक्षसों का राजा हिरण्यकश्यप भी इनकी पूजा करता था। कालांतर में सातवाहन, वाकाटक, काकातिय और विजयनगर के राजा श्रीकृष्णदेव राय आदि राजाओं ने मंदिर पुनर्निमाण कर इसका वैभव बढ़ाया। बाद के वर्षों में मराठा शासक शिवाजी द्वारा भी मंदिर के गोपुरम का निर्माण कराया। धर्मग्रन्थों में यह महिमा बताई गई है कि श्री शैल शिखर के दर्शन मात्र से मनुष्य सब कष्ट दूर हो जाते हैं और अपार सुख प्राप्त कर जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है अर्थात् मोक्ष प्राप्त होता है।

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