udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news चकाचौंध भरी जिदंगी मैं भौतिकवादिता की और अंधे होकर दोडते हम और हमारे नेता

चकाचौंध भरी जिदंगी मैं भौतिकवादिता की और अंधे होकर दोडते हम और हमारे नेता

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aswani

उत्तराखंड की राजधानी मैं अनियंत्रित रूप से बनते मकान,दुकान, होटलों ने देहरादून का या उत्तराखंड का कौन सा विकास कर दिया, ये चिंतनीय प्रश्न है।  एक और हम आज की चकाचौंध भरी जिदंगी मैं भौतिकवादिता की और अंधे होकर दौडे जा रहे है, तो दूसरी और हमारे प्यारे शांति के प्रतीक दून जैसे शहर मानव आबादी से खचाखच ठस्स भरते जा रहे है। आखिर ये विकास का पैमाना नही है जहाँ अंधाधुँध मानव बस्तियों की जमात बिना नक्शे के सजाई जाए। आए दिन हर किसी के मुँह से देहरादून के इर्द-गिर्द प्लाॅटिग की बात सुनकर समझ नही आता कि आखिर राज्य अलग  बनाने का सपना क्या हर गांव- मोहल्ले मैं जमीन के ठेकेदार पैदा करना था। आखिर इनको ठेकेदारी का लाइसेंस कौन मुहैया कराता है, और कैसे ये औने-पौने दाम पर उत्तराखंड की माटी की कीमतें निर्धारित कर उत्तराखंड को धर्मशाला बनाना चाहते है, मतलब कि न सिर्फ़ देहरादून बल्कि मसूरी, हल्द्वानी, श्रीनगर रिषिकेष, हरिद्वार, ऊधम सिंह नगर जैसे शहरों की आबो-हवा मे वो सुकून नही मिलता जिसके लिए ये जाने जाते थे। शांति योग के लिए फैमस मायानगरी हरिद्वार या संतनगरी-योगनगरी रिषिकेष की ही बात करे तो हमें लगता नही कि हम उत्तराखंड मैं है। पहाडों से उतरकर जब आम पहाड़ी अपने इन शहरों मैं पहुँचता है तो चोर डकैती लूटपाट अपराध के बीच उसे जाम  जैसी दुर्घटनाओं से जूझना पड़ता है।
और तो और इन शहरों की हवा मैं पता नही वो क्या चीज मिल गई कि हम अपनी बोली भाषा संस्कृति सभ्यता सब धत छोड़कर दूसरी बोली भाषा संस्कृति अपनाकर पाश्चात्य के पीछे भागते नजर आते है।
अभी हाल ही मैं मेरे एक परम मित्र भेजी सुनील प्रसाद मैठाणी जी से बात हुई तो एक बड़ा रोचक प्रसंग सामने आया- हुआ यूं कि जब मैठाणी जी संतनगरी मैं गये तो उन्हें सामने कुछेक अंग्रेज बैठे दिखे तो पहाड़ी भेजी ने तुरंत उन्हें देख कर थोड़ा अपना अंग्रेजी ज्ञान दिखाना चाहा तो मुँह से निकला “Hello Madam good evening,  हालाँकि वो आगे और भी कुछ वार्तालाप चाहते थे, पर इससे पहले ही वो अंग्रेज बोल पडे- “भेजी प्रणाम, कमण्या छिन” वो अवाक रह गए! बिल्कुल काची ठेठ गढवाली सुन कर पहले तो थोडा शर्मिन्दा हो गए, फिर वाकया यूँ हुआ कि अंग्रेज लेडी बोली “भेजी हमारी गढवाली सूणी आपतै आश्चर्य नी होणू( हम गढवाली बोल रहे है क्या आपको आश्चर्य नही हो रहा)
भेजी- अरे आश्चर्य कैसा, भला हम अंग्रेजी बोल सकते है तो आप गढवाली क्यों नही? हम जब इंग्लैंड जाते है तो अंग्रेजी सीखते है आप गढवाल आए हो तो गढवाली सीख रहे हो भला कौन सी बड़ी बात है!
यहाँ पर इस प्रसंग को इसलिए छेडना पड़ा कि हम विदेशी के मुँह से गढवाली-हिन्दी सुनकर तालियाँ बजाते है, पर क्या अंग्रेज हमसे अंग्रेजी सुनकर भी इतनी खुशी दिखाते है? जी नही। तो यही है हमारा भाषाई विकास।  क्या हम वास्तव मैं विकास कर रहे है।
ईंट-सिमेंट के जंगल के जंगल खड़े कर दिए हमने अपने शहरों मैं, पर सारे बेतुके नक्शे जिसमें अगर थोड़ा सा भी बारिश हो जाए तो शहर की सडको में सब पानी मैं तैरने लगता है। मकानों के जाल ऐसे बिछाये है कि छत का पानी सीवर लाइन मैं जाता ही नही। और सडके भी सीवर के बेतहाशा पानी के
लिए छोटी पड़ जाती है।
पर्यावरण संरक्षण के नाम पर हमने उत्तराखंड की धरती मैं चिपको जैसे कई जल जंगल  जमीन के आंदोलन चलाए। पर क्या आज उत्तराखंड बनने के बाद हमने अपनी इन अमूल्य सम्पदा का संरक्षण किया है?
क्यों ऐसा नही किया जाता कि शहरों मैं मकान बिल्डिंग खड़ी करने के एवज मैं एक शर्त रखी जाए कि हर दो कमरों पर चार हरे भरे पेड़ लगाने अनिवार्य किए जाए। न सिर्फ़ पेड लगाए जाए बल्कि हर साल इनकी प्रोग्रेस भी नापी जाए।
ये पेड सजावटी आर्नामेंटल पेड के इतर हो जिनसे हवा पानी संरक्षित हो। आखिर शहर मै हरियाली बचाना सिर्फ़ नगरपालिका या नगर पंचायत या सरकार की ही जिम्मेदारी थोड़ी नही है।
अगर पेड़ के लिए जगह न हो तो सरकारी जमीन पर पेड़ को उक्त मकान मालिक द्वारा संरक्षित किया जाये।
मकानों के नक्शे आने वाले दस साल आगे के हिसाब से पास करवाए जाए ताकि सड़कों पर अतिक्रमण भी न हो और छत के पानी का उचित सीवरेज के माध्यम से अच्छी निकासी हो।
मकानो की हाइट का जरूर ध्यान रखा जाए। बिल्डिंगो से शहर की शोभा मैं चार चाॅद लगे न कि बेतुके आड़े तिरछे मकान शहर की शान मैं खलल डाले।
कुल मिलाकर हमारे शहर जनसंख्या, जनघनत्व मैं तो इन पंद्रह सालों मैं बेतुकी वृद्धि कर चुके है जबकि पहाड़ खाली हुए है तो फिर क्यों हमारा ध्यान इन चुनिंदा शहरों से हट कर डाॅडी काठ्यौं पर नही जाता?
क्यों हर ग्राम सभा मैं स्कूल के अलावा और विभाग नही खोले जाते।
हर ग्राम सभा मैं पशुपालन, बागवानी, मृदापरीक्षण, लघु उद्योग(अगरबत्ती, धूप, क्राकरी,हस्तशिल्प, इत्र इत्यादि ) मैं से कोई एक क्यों नही खोले जाते?
पहाडो की पारम्परिक खेती से इतर क्यों मशरूम, फूल जैसे ब्यवसायों को प्रोत्साहन नही दिया जाता।
कुछेक एनजीओ गांवों मे काम तो कर रहे है पर उनका उद्देश्य बस कागजी खानापूर्ति ज्यादा होता है, मेहनत तो वो खूब करवाते है पर सब्जी फसल उत्पादन के बाद मार्केट की क्या उनकी कोई जिम्मेदारी नही बनती?
उम्मीदों के उत्तराखंड मैं अभी बहुत कुछ विकास होना है पर तब जब हम सब निःस्वार्थ होकर अपनी उत्तराखंड की धरती को अपने अपने स्तर पर हरित, शिक्षित, सांस्कृतिक, जैविक, पर्यटक, धार्मिक प्रदेश बनाने की दिशा मैं सकारात्मक काम करेंगे।

अश्विनी गौड लोकभाषा आंदोलन रूद्रप्रयाग बिटि ।