udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news सावधानः देहरादून में बड़े भूकंप की चेतावनी !  न इमारत न बचेगा जीवन !

सावधानः देहरादून में बड़े भूकंप की चेतावनी !  न इमारत न बचेगा जीवन !

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उत्तराखंड के देहरादून में आ सकता है सात से आठ रिक्टर स्केल का भूकंप,होगी भारी धन और जन की हानि! 

उत्तराखंड के देहरादून में धधक रही है ढाई सौ किलोमीटर जमीन, 18 मिलीमीटर की दर से सिकुड़ रही है जमीन!

डिजास्टर रेसीलेंट इंफ्रांस्ट्रक्चर इन दि हिमालयाज: ऑपोर्च्यूनिटी एंड चैलेंजेस वर्कशॉप में वैज्ञानिकों ने पेश की रिपोर्ट

उदय दिनमान डेस्कः सावधानः देहरादून में बड़े भूकंप की चेतावनी !  न इमारत न बचेगा जीवन !अगर वैज्ञानिकों की इस चेतावनी को नजरअंदाज किया गया तो उत्तराखंड की अस्थाई राजधानी देहरादून में आने वाले समय में न इंसान रहेंगे और न इंसानी विरासत। आने वाले समय में यहां एक ऐसा भूकंप आने वाला है जिसके बाद यहां कुछ भी नहीं बचेगा, न तो इमारत न ही जीवन.यह हम नहीं कह रहे हैं यह वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है।

 

नेशनल सेंटर ऑफ सिस्मोलॉजी के निदेशक डॉ. विनीत गहलोत ने इस शोध को देहरादून में आयोजित डिजास्टर रेसीलेंट इंफ्रांस्ट्रक्चर इन दि हिमालयाज: ऑपोर्च्यूनिटी एंड चैलेंजेस वर्कशॉप में पेश किया। इस रिपोर्ट में कई बड़ी और हैरान कर देने वाली बातें बताई गई हैं। इसलिए वैज्ञानिकों की चेतावनी को नजरअंदाज न करते हुए इस पर विचार करों और अीाी से संभल जाइए। यह कोई सनसनी नहीं बल्कि वैज्ञानिकों की ओर से चेतावनी है अर्थात भविष्यवाणी है। ऐसी ही चेतावनी नेपाल के लिए भी वैज्ञानिकों ने दी थी और नेपाल के काएठमाडू के हाल आप सभी ने देखे और पढ़ हैं।

 

उल्लेखनीय है कि देहरादून के बारे में हम सभी ने जो पढ़ा है उसके बारे में पहले यहां बता दू कि देहरादून एक घाटी में बसा शहर है और कहते हैं कि पहले यहां तालाव और चूने की खदाने थी। समय के साथ आज के दौर में यहां न चूने की खदाने दिखती हैं और न ही यहां तालाब ही दिखते हैं। ऐसे में अगर हम चूने के बारे में जाने तो सभी को पता है कि चूना घुलनशील है और यह आसानी से पानी में घुल जाता है। वैसे भी कुछ सालों में देहरादून की धरती पर इतना भार पैदा हो गया है जो आम जन भी सोच सकता है कि यहां कभी भी प्रलय मच सकता है।

 

आपको बात दें कि देहरादून के लिए भू वैज्ञानिकों की टीम ने बड़ी चेतावनी दी है। जी हां हाल ही में एक खुलासा किया गया है। इसमें बताया गया है कि देहरादून से टनकपुर के बीच ढाई सौ किलोमीटर क्षेत्रफल में जमीन लगातार सिकुड़ रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि एक साल में ये जमीन 18 मिलीमीटर के हिसाब से सिकुड़ रही है।अगर ऐस ही चलता रहा तो यह देहरादून के लिए अच्छी खबर नहीं है और आने वाले समय में इसके परिणाम गंभीर और घातक हो सकते हैं।

 

उल्लेखनीय है कि नेशनल सेंटर ऑफ सिस्मोलॉजी ने ये रिपोर्ट पेश की है। हम आपको पहले भी बता चुके हैं कि उत्तराखंड के लिए कई बार वैज्ञानिकों ने चेतावनी जारी की हैं। मंगलवार को नेशनल सेंटर ऑफ सिस्मोलॉजी के निदेशक डॉ. विनीत गहलोत ने इस शोध को देहरादून में आयोजित डिजास्टर रेसीलेंट इंफ्रांस्ट्रक्चर इन दि हिमालयाज: ऑपोर्च्यूनिटी एंड चैलेंजेस वर्कशॉप में पेश किया। इस रिपोर्ट में कई बड़ी और हैरान कर देने वाली बातें बताई गई हैं।इनकी बातों पर अगर गौर न किया गया तो यह आने वाले समय में हमारे और हमारी मानव संस्कृति के लिए एक गंभीर चुनौति के साथ मानव सभ्यता के लिए भी खतरा है।

 

डॉक्टर गहलोत की माने तो  साल 2012 से 2015 के बीच देहरादून के पास मोहंड से टनकपुर के बीच 30 जीपीएस यानी ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम लगाए गए थे। इस दौरान इसका बारीकी से अध्ययन किया गया। अध्ययन पर पता चला कि ये पूरा भूभाग 18 मिलीमीटर की दर से सिकुड़ता जा रहा है। इस सिकुड़न की वह से धरती के भीतर ऊर्जा का भंडार तैयार हो रहा है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी जारी की है कि कभी भी इस पूरे भू-भाग में सात से आठ रिक्टर स्केल का भूकंप आ सकता है।

 

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि एक वक्त ऐसा भी आएगा जब इस धरती की सिकुड़न आखिरी लेवल पर होगी। इसके बाद ये ऊर्जा भूकंप के रूप में बाहर निकल सकती है। इसी तरह की हरकत नेपाल में भी देखी गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि नेपाल में धरती के सिकुड़ने की दर इससे ज्यादा है।नेपाल में 21 मिलीमीटर के हिसाब से धरती सिकुड़ रही है। साल 2015 में भी नेपाल में 7.8 रिक्टर स्केल का बड़ा भूकंप आ चुका है। हालांकि वैज्ञानिकों ने ये भी कहा कि इस बात का अदाजा नहीं लगाया जा सकता है कि धरती का सिकुड़ना का आखिरी दौर कर होगा। लेकिन इतना जरूर है कि जीपीएस से धरती के बदलाव और भूकंप की आशंकाओं का अध्ययन किया जा रहा है।

 

नेशनल सेंटर फॉर सिस्मोलॉजी के निदेशक डॉ. विनीत गहलोत का कहना है कि करीब 250 किलोमीटर धरती का हिस्सा भूकंपीय ऊर्जा का लॉकिंग जोन बन रहा है। अब तक सबसे ज्यादा लॉकिंग जोन चंपावत, टिहरी-उत्तरकाशी और आगराखाल में पाए गए हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि धरती से लगातार खिलवाड़ हो रहा है और इसका नतीजा कुछ भी हो सकता है।इसके लिए अभी से अगर जागस्क नहीं हुए तो आने वाला समय बेहद गंभीर परिणाम लाकर सामने आयेगा।