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सरकार जी, विपक्ष जी ! फुर्सत हो तो हमारे दर्द को देखने भी आना !

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क्रांति भटृट

भूकम्प , भूस्खलन , बाघ , भालू के हमले जिस पहाड की नियति बनी है । उस पहाड के चमोली के सुदर वर्ती गांवों में जहां हर बरसात की तरह इस बार की बरसात ने भी कहर मचाया हुआ है , के आपदा प्रभावित लोग दहशत में हैं । चमोली के घाट विकास खंड के मोख मल्ला बगड , कुंडी , धुर्मा , देवाल के रतगांव , प्राणमती , झलिया समेत अन्य गांवों के लोग आपदा से दहशत में हैं । पहाड के दर्द और उसके निवारण पर बडी बडी फसाकी मारने वाले क्या सत्ता पक्ष क्या विपक्ष , कोई भी नेता आपदा पीडितों के बीच नहीः आया ।

जनता कह रही है कहां हो हे पहाड के कमाल के नेताओं , जध प्रतिनियो , । अगर आपके कोमल और खूबसूरत पैरों को आपदा से आये मलवे में गंदे होने का खतरा न हो , और ” फुर्सत ” हो तो हमारा दर्द जानने और हाल देखने तो आइये , हुजूर ।सरकारी आंकड़ों ने अभी तक जिले में सिर्फ 9 पक्के मकान टूटे हैं इस आपदा में । कच्चे मकान , गौशालाओं , का आंकलन तहसील स्तर पर होगा । पर जमीनी हकीकत में नुकसान ज्यादा है ।

ढाढर बगड थराली में 10 दुकानें , अनेक वाहनों का पता ही नही चल रहा है , सोमवार की आपदा घटना में ये सब जमीदोज हो गये थे । पर ये कैसा रहे राज्य ! कैसे अपने जन प्रतिनिधि ! कैसा प्रतिपक्ष ! जो अपने ही गरीब गुरबा लोगों के दुख दर्द में शरीक नही हो सकते । उन तक नही पहुंच सकते । चार दिन हो गये अभी कोई बडा नेता आपदा के मारों के बीच नही आया । अलबत्ता थराली की विधायक मुन्नी देवी शाह कुंडी और ढाढर बगड पहुंची ।

उत्तराखंड को ” देवभूमि ” कहा जाता है । इसलिए लगता है यहां लोकशाही की सरकार और ब्यवस्था में लोगों को ब्यवस्था में भरोसा ही जाता रहा । और आपदा हो या रोज मर्रे के जीवन में दुख दर्द सहते लोंगो का ” भरोसा और विस्वास भगवान के सिवा और खुद सम्भल कर खडे होने के किसी पर रहा नहीं । आपदा के मारों के आगे छत का संकट, रोजी रोटी का संकट , हर दिन विपरीत परिस्थितियों में जीने की चुनौती है । पिंडर घाटी का अधिकांश हिस्सा सडक सम्पर्क टुटने से देश दुनिया से कटा है । उर्गम घाटी में पुल 2013 की आपदा से टूट गया था जो अभी बना नही ।

गांव के लोग उफनती नदी में मजबूरी में खुद के बनाये लकडी की बल्लियों और तख्तियों के पुल पर चलने को मजबूर हैं । बांज बगड के लोगों ने भी खुद की सामूहिकता से लकडी का अस्थाई पुल बनाया है । हर दिन आती बरसात लोगों को डरा रही है । जो स्वाभाविक ही है । ” पहाड में कहावत है ” जै का बाबू खुणि रिख्ख न गदोडी , उ कालू मूंडु से डोरी । ( जिसके पिता को काले भालू ने नोच डाला हो , उसके परिजन तो काले ठूंठ को ही देख कर डर जाते हैं सहम जाते हैं ) । बरसात की आफत में पहाड के लोग दहशत में हैं और जनप्रतिनिधि बरसात में पकौडों और चाय की चुस्कियों का लुत्फ देहरादून या अन्य सुरक्षित जगहों में ले रहे हैं ।

पता नहीं संस्करणीय संस्कृति में तखसीम ( बंटे अखबार देहरादून दरबार तक पहाड के दर्द की खबर को जगह दे पा रहे हों या नही ! अलबत्ता हम आपदा के मारे दर्द के मारे अपना पढ रहे हैं। काश सरकार हुजूर और कुर्ते पजामें कलफ लगा कर सियासत करने वाले विपक्ष किसी का भी नेता आपदा के मारों की सुनता । पर यहां क्या पक्ष क्या विपक्ष । आपदा के दौर में कोई आंसू पोछने के लिये आपदा पीडितों के बीच नहीं आ रहा है ।

क्रांति भटृट, वरिष्ठ पत्रकार की वाल से साभार