udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news सर्कस की कहानी अब खत्म होने के कगार पर

सर्कस की कहानी अब खत्म होने के कगार पर

Spread the love

देहरादून । सैकड़ों साल पुराना अपना एक अनोखा इतिहास रखने वाले सर्कस की कहानी अब खत्म होने के कगार पर है। राजधानी देहरादून से लगे विकासनगर में एक बड़ा सर्कस तो चलता दिख रहा है लेकिन सरकार की अनदेखी की वजह से इस स्वच्छ मनोरंजन में कुर्सियां खाली दिखाई पड़ती हैं।

 

जीना यहां मरना यहां, इसके सिवा जाना कहां। 1970 में बनी फिल्म मेरा नाम जोकर का ये गीत राज कपूर पर फिल्माया गया था। उस दौर में भी राज कपूर पर फिल्माए गए इस गीत में सर्कस से जुदा होने का यही दर्द दिखाई देता था, जो आज सर्कस के प्रति बेइंतहा मोहब्बत के कारण बमुश्किल जिंदा रखने वाले सर्कस मालिकों का है। सर्कस में काम करने वाले कलाकारों और मालिकों के ऊपर रोजी रोटी का संकट गहराता जा रहा है।

 

जानकार बताते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी ने अपने दौर में जब एक बार करीब से सर्कस देखा तो कलाकारों की कड़ी मेहनत और खस्ताहाल में उनकी कम आमदनी से परेशान हो उठीं। उसी समय पूर्व प्रधानमंत्री ने स्वच्छ मनोरंजन कहे जाने वाले इस साधन सर्कस को पूरे देश में टैक्स फ्री करने के साथ-साथ एक आदेश ये भी लागू करा दिया था कि देश में जहां-जहां सर्कस चलेगा, प्रशासन इसमें भरपूर मदद करेगा।

 

लेकिन खत्म होने के कगार पर पहुंच चुके सर्कस को अब मोदी सरकार ने जीएसटी के दायरे में लाकर पहली बार टैक्स देने को मजबूर कर दिया है। सदियां बीत गईं और इस स्वच्छ मनोरंजन में बदलाव आते चले गए। जिन इंदिरा गांधी को सर्कस में जान डालने का श्रेय आज भी मिलता है, उन्ही की बहु और भाजपा नेता मेनका गांधी पर सर्कस की जान कहे जाने वाले जानवरों को सर्कस से छीनने का तमका भी लगा है।

 

पिछले 30 सालों से बमुश्किल चल रहे राजमहल सर्कस अब सरकार से ही रोजी रोटी के लिए गुहार लगा रहा है ताकि इन कलाकारों की जान सर्कस को बचाया जा सके। सर्कस मालिकों का दावा है कि अगर उन्हें कुछ जानवर दिए जाए तो करोड़ों खर्च करने के बाद भी जानवरों की संख्या न बढ़ा पाने वाली सरकार को जानवरों की संख्या बढ़ाकर दिखा देंगे।

 

सर्कस में नन्हे बच्चों के चेहरे आज भी जोकरों की हरकतों पर जमकर खिलखिलाते दिखाई पड़ते हैं। खासकर टीवी और फ़ोन से चिपककर अपना मनोरंजन करने वाले इस दौर में भी कुछ लोग हैं जो अपने परिवार को सर्कस दिखाने चले आते हैं और यकीन मानिये खुलकर इस मनोरंजन से लुफ्त उठाने वाले इन लोगों के दिल में भी इस बात की टीस है कि सरकार सर्कस के लिए कुछ करे और सर्कस को उसके असली साथी कलाकार यानि जानवर वापस मिल जाएं ताकि वही पुराना सर्कस एक बार फिर हमारे देश की धूमिल होती इस स्वच्छ मनोरंजन की संस्कृति को जिन्दा कर सके।

 

देश में दो अलग कानून
एक ही देश में दो अलग कानूनों से भी सर्कस मालिक परेशान हैं। जू और खतरे से भरे विदेशी खेलों में जानवरों को रखने की छूट और शांत सर्कस में केवल जानवरों के हंसाने वाले करतब पर रोक नाइंसाफी ही नजर आती है। तमिलनाडु में ऐसे ही खतरे से भरे एक खेल ने हाल ही में काफी इंसानी जिंदगियां ली लेकिन उसपर कोई रोक नहीं।

 

शायद इसलिए कि उन्हें चलाने वाले या तो बड़े विदेशी स्पॉन्सर हैं, या बड़े पूंजीपति लोग। आवाम के चेहरे पर खत्म होते इस सर्कस का गम साफ़ नजर आता है। सरकार से लोगों की अपील भी भरपूर है लेकिन सरकार तो सरकार है, जब मन होगा तभी फरयाद सुनेगी।