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शर्मनाकः  मुर्दा जिस्म गांव में सड रहा, शमशान घाट पहुंचाने के लिए चार कंधे भी मौजूद नहीं !

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पलायन के नाम पर बना दिया आयोग,उत्तराखंड में गांव के गांव हो गए खाली, आतमाएं भटक रही हैं बियाबान में ,सरकारें कर रही हैं मौज,गांव हुए भुतहा, पहाड़ी गांवों की सांसे भी उखडी !

उदय दिनमान डेस्कः शर्मनाकः  मुर्दा जिस्म गांव में सड रहा, शमशान घाट पहुंचाने के लिए चार कंधे भी मौजूद नहीं ! उत्तराखंड राज्य के एक गांव की यह हकीकत दांस्तान है। राज्य के एक गांव में एक व्यक्ति मर गया, लेकिन उसे शमशान घाट तक पहुंचाने वाला कोई नही और शव गांव में ही सड रहा है।

 

 

प्रदेश की सरकार पलायन रोकने के नाम पर आयोग आयोग बनाकर खानापूर्ति कर रहा है,उत्तराखंड में गांव के गांव हो गए  हैं खाली, और खाली गांवों में आत्माएं भटक रही हैं बियाबान में ,सरकारें कर रही हैं मौज.यह उत्तराखंड राज्य की कहानी नहीं बल्कि एक हकीकत है। यह कहा जाए कि गांव हुए भुतहा, पहाड़ी गांवों की सांसे भी उखडी ! तो इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

 

जैसा कि आप सब जानते हैं कि अपने पर्वतीय भूगोल और सांस्कृतिक पहचान की बदौलत उत्तराखंड को अलग राज्य बना था. लेकिन आज ये पहचान खतरे में है. गांव के गांव निर्जन हो रहे हैं और बड़े पैमाने पर लोग पलायन कर मैदानी इलाकों का रुख कर चुके हैं.पहाड़ी जीवन को गति देने के लिए, उसमें नई ऊर्जा भरने के लिए और गांवों को फिर से आबाद करने के लिए होना तो ये चाहिए था कि सरकारें बहुत आपात स्तर पर इस पलायन को रोकती.

 

दुर्गम इलाकों को तमाम बुनियादी सुविधाओं से लैस कर कुछ तो सुगम बनाती. खेत हैं लेकिन बीज नहीं, हल, बैल, पशुधन सब गायब. स्कूल हैं तो भवन नहीं, भवन हैं तो टीचर कम, पाइपलाइनें हैं तो पानी कम, बिजली के खंभे हैं तो बिजली नहीं. अस्पताल हैं तो दवाएं उपकरण और डॉक्टरों का टोटा. ये किल्लत भी जैसे पहाड़ की नियति बन गई है. ऐसा नहीं है कि उत्तराखंड में पलायन इन 16 वर्षों की ही समस्या है. काफी पहले से लोग रोजीरोटी के लिए मैदानों का रुख करते रहे हैं.

 

एक लाख सर्विस मतदाता इस राज्य में है. यानी जो सेना, अर्धसैनिक बल आदि में कार्यरत है. ये परंपरा बहुत पहले से रही है. युवा भी अपने अपने वक्तों में बाहर ही निकले हैं. लेकिन अगर वे इतने बड़े पैमाने पर गांवों के परिदृश्य से गायब हुए हैं तो ये सोचने वाली बात है कि क्या वे सभी उस सुंदर बेहतर जीवन को हासिल कर पाएं होंगे जिसकी कामना में वे अपने घरों से मैदानों की ओर निकले होंगे. इस मूवमेंट का, उसके नतीजों का अध्ययन किया जाना जरूरी है.

 

ये दलील बेतुकी है पहाड़ी इलाकों में सुविधाएं पहुंचाना दुष्कर काम है. उत्तराखंड के पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश का उदाहरण हमारे सामने है. उसने उन्हीं चीजों में अपनी पहचान और समृद्धि का निर्माण किया है जिनका संबंध विशुद्ध पर्वतीयता से है. जैसे कृषि, बागवानी, पनबिजली, पर्यटन, कला आदि. उत्तराखंड में क्या ये संभव नहीं हो सकता था? आज अगर बूढ़े अकेले छूट गए हैं या गांव भुतहा हो चले हैं तो इसकी जिम्मेदारी किस पर आती है. क्या उन जगहों को छोड़ कर जाने वालों पर या उन लोगों पर जो इस भूगोल के शासकीय नियंता और नीति निर्धारक चुने गए हैं.

 

आपको बता दें कि दो दिन पहले धनोल्टी विधानसभा क्षेत्र के गैर गांव में अकेले रहने वाले अतर सिंह की मौत भी सरकार को इसका मतलब नहीं समझा पाएगी। खबरों के अनुसार, अतर सिंह के प्राण तीन अक्टूबर को चले गए थे उसके मुर्दा जिस्म को शमशान घाट पहुंचाने के लिए चार कंधे भी गैरनगुण गांव में मौजूद नहीं हैं। अतर सिंह का गांव उसकी मौत पर मरघट बन गया है। बताया जा रहा है कि गांव की उस बस्ती में अतर सिंह अकेला था।

 

उत्तराखंड राज्य के गैर नगुण गांव का यह डरावना सत्य जानकर आपकी आंखों में आसू अवश्य आएंगे।यहां पिछले सत्रह सालों में सारी आबादी धीरे-धीरे गांव से निकलती गई और ताजा हालात ये हैं कि 65 साल के अतर सिंह का मुर्दा जिस्म सड़ने की कगार पर पहुंच रहा है। पलायन से तबाह हुए गांव के अतर सिंह का दु्र्भाग्य देखिए जिस पत्नी ने अंतिम वक्त पति के पास रहना था और जिस बेटे ने चिता को आग देनी थी दोनो देहरादून की जेल में अपने किए की सजा भुगत रहे हैं।

 

दरअसल अतर की बीवी इंद्रा देवी और उसका बेटा सते सिंह कत्ल की सजा भुगत रहे हैं। अपनी पत्नी को जान से मारने के गुनाह में बेटे सते सिंह और उसकी मां इंद्रा देवी को साल 2008 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। दोनों देहरादून की सुद्धोवाला जेल में बंद हैं, सूने गैर नगुण गांव में अतर सिंह का मुर्दा जिस्म गांव मे सड़ने को तैयार अंतिम संस्कार की राह तक रहा है।

 

हालांकि जिलाधिकारी के यहां से मामले की गंभीरता को देखते हुए सते सिंह और उसकी मां इंद्रा देवी के लिए पैरोल पर रिहा होने के आदेश हो गए हैं लेंकिन उनके गुनाह को देखते हुए अभी कमिश्नर के यहां से आदेश होना बाकी है। जिसके चलते अतर सिंह का मुर्दा देह के अंतिम संस्कार में देरी हो रही है।

 

बताया जा रहा है कि लाश की बदबू से आस-पास के ग्रामीण इलाकों में बचे खुचे लोगों का जीना मुहाल हो गया है।ऐसें में अतर सिंह के मुर्दा सड़ते जिस्म से परेशान गांव से सटी बस्ती के लोगों ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द इस समस्या का हल न निकाला गया तो अतर सिंह की लाश सड़क पर रख कर चक्का जाम किया जाएगा।

 

आज के समय में हम महानगरीय चकाचौंध तले हमारे देश का एक बड़ा तबका बड़े शहरों में अपना जीवन ज्यादा सुखी देखता है उत्तराखंड की हमारी आज की नौजवान पीड़ी अपने गावो से लगातार कटती जा रही है ।रोजी रोटी की तलाश में घर से निकला यहाँ का नौजवान अपने बुजुर्गो की सुध इस दौर में नहीं ले पा रहा है ।यहाँ के गावो में आज बुजुर्गो की अंतिम पीड़ी रह रही है और कई मकान बुजुर्गो के निधन के बाद सूने हो गए हैं ।

 

आज आलम यह है दशहरा , दीपावली ,होली सरीखे त्यौहार भी इन इलाको में उस उत्साह के साथ नहीं मनाये जाते जो उत्साह बरसो पहले संयुक्त परिवार के साथ देखने को मिलता था । हालात कितने खराब हो चुके हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है आज पहाड़ो में लोगो ने खेतीबाड़ी जहाँ छोड़ दी है वहीँ पशुपालन भी इस दौर में घाटे का सौदा बन गया है क्युकि वन सम्पदा लगातार सिकुड़ती जा रही है

 

और माफियाओ,कारपोरेट और सरकार का काकटेल पहाड़ो की सुन्दरता पर ग्रहण लगा रहा है ।पहाड़ो में बढ़ रहे इस पलायन पर आज तक राज्य की किसी भी सरकारों ने कोई ध्यान नहीं दिया शायद इसलिए अब लोग दबी जुबान से इस पहाड़ी राज्य के निर्माण और अस्तित्व को लेकर सवाल उठाने लगे हैं ।

 

यह हकीकत है कि विकास की किरण देहरादून, हरिद्वार,हल्द्वानी के इलाको तक सीमित हो गई है । नौकरशाही बेलगाम है तो चारो तरफ भय का वातावरण है । अपराधो का ग्राफ तेजी से जहाँ बढ़ रहा है वहीँ बेरोजगारी का सवाल सबसे बड़ा प्रश्न पहाड़ के युवक के सामने हो गया है । बिजली, पानी, सड़क जैसी बुनियादी समस्याओ से पहाड़ के लोग अभी भी जूझ रहे हैं ।

 

अस्पतालों में दवाई तो दूर डॉक्टर तक आने को तैयार नहीं है । वहीँ जनप्रतिनिधि इन समस्याओ को दुरुस्त करने के बजाए अपने विधान सभा छेत्रो से लगातार दूर होते जा रहे हैं । उन्हें भी अब पहाड़ी इलाको के बजाए मैदानी इलाको की आबोहवा रास आने लगी है और शायद इसी के चलते राज्य के कई नेता अब मैदानी इलाको में अपनी सियासी जमीन तलाशने लगे हैं ।राज्य में उर्जा प्रदेश, हर्बल स्टेट के सरकारी दावे हवा हवाई साबित हो रहे हैं ।

 

 

बेटे को मिली पिता के अंतिम संस्कार के लिए पैरोल
बहु की हत्या के आरोप में जेल में बंद मां-बेटे को पिता के अंतिम संस्कार के लिए तीन दिन की पैरोल पर छोड़ा गया है। तीन दिन पूर्व सत्ये सिंह के पिता की मौत हो गई थी। लेकिन पत्नी व बेटे के देहरादून जेल में बंद होने के कारण मृतक अतर सिंह का अंतिम संस्कार नहीं हो पाया था। थौलधार ब्लॉक के नगुण पट्टी के लोलदी गांव निवासी सत्ये सिंह व उसकी मां इंद्रा देवी को वर्ष 2010 में अपनी बहु की हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

 

तब से दोनों मां-बेटे देहरादून जेल में बंद है। गांव में अकेले रह रहे सत्ये सिंह के पिता अतर सिंह की 3 अक्टूबर को मृत्यु हो गई थी। लेकिन बेटे व पत्नी के जेल में होने के चलते मृतक का अंतिम संस्कार नहीं हो पाया। ग्रामीणों व मृतक के रिश्तेदारों ने बीते बुधवार को डीएम टिहरी सोनिका से मृतक के अंतिम संस्कार के लिए बेटे व पत्नी को पैरोल पर छोडऩे को लेकर अर्जी दी। डीएम ने गढ़वाल आयुक्त दिलीप जावलकर को मामले में अवगत कराया। जिस पर आयुक्त ने गुरुवार को सत्ये सिंह व इंद्रा देवी को तीन दिन के लिए पुलिस अभिरक्षा में पैरोल पर रिहा किया।