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शर्मनाकः पेशावर विद्रोह के अग्रदूत के परिवार को बताया अतिक्रमणकारी !

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‘राष्ट्रपिता’ महात्मा गांधी ने दी थी चंद्र सिंह भंडारी को आजादी की लड़ाई के दौरान गढ़वाली की उपाधि

स्वतंत्रता सेनानी चंद्र सिंह गढ़वाली के परिवार पर अतिक्रमणकारी होने का ठप्पा बिजनौर वन प्रभाग ने लगा दिया

स्वतंत्रता सेनानी को सम्मान में दी गई 10 एकड़ जमीन को वापस करने का नोटिस वन विभाग ने भेजा

देहरादून: शर्मनाकः पेशावर विद्रोह के अग्रदूत के परिवार को बताया अतिक्रमणकारी ! जी हां आपके शरीर के बाल भी यह पढ़कर खडे़ हो गए होंगे गुस्से सेद्ध जब सरकार में बैठे कुछ तथाकथित मानसिकता वाले अधिकारी ऐसा काम करेंगे तो कोई भी आग बबूला हो सकात हैद्ध चलिए आपको बताते है पूरी कहानी.

आपको बता दें कि पेशावर विद्रोह के अग्रदूत रहे स्वतंत्रता सेनानी चंद्र सिंह गढ़वाली के परिवार पर अतिक्रमणकारी होने का ठप्पा बिजनौर वन प्रभाग ने लगा दिया है। तत्कालीन यूपी सरकार द्वारा स्वतंत्रता सेनानी को सम्मान में दी गई 10 एकड़ जमीन को वापस करने का नोटिस वन विभाग ने भेजा है। यही नहीं, गढ़वाली के परिवार से कई गुना लीज रेंट भी मांगा गया है। ‘राष्ट्रपिता’ महात्मा गांधी ने चंद्र सिंह भंडारी को आजादी की लड़ाई के दौरान गढ़वाली की उपाधि दी थी।

बता दें कि संयुक्त यूपी के तत्कालीन सीएम हेमवती नंदन बहुगुणा ने गढ़वाली को घर बनवाने के लिए बिजनौर वन प्रभाग की कोटद्वार-भाबर के गांव हल्दूखाता से सटे वन क्षेत्र में 10 एकड़ जमीन दी थी। इस भूमि की लीज रकम गढ़वाली के वंशज जमा नहीं कर पाए। अब बिजनौर वन प्रभाग की ओर से गढ़वाली के वंशजों को अतिक्रमणकारी घोषित कर भूमि खाली करने के निर्देश दे दिए गए हैं।

90 साल के लिए लीज पर जमीन दी गई थी और हर 30 साल पर लीज रिन्यू कराने की शर्त थी। गढ़वाली के बेटे आनंद और खुशाल सिंह काफी कोशिशों के बावजूद लीज रिन्यू नहीं करा पाए। इस दौरान दोनों का निधन भी हो गया। अब आनंद की पत्नी कपोत्री देवी और खुशाल की पत्नी विमला देवी को यह जमीन खाली करने का सरकारी निर्देश मिल गया है।

 

30 अगस्त को गढ़वाली की दोनों बहुओं को नोटिस जारी किया गया है। यह भी कहा गया है कि वर्ष 1989 से 2004 तक लीज रेंट का भुगतान सुनिश्चित करने के साथ ही 2005 के बाद पहले 30 सालों के लिए लीज 50 फीसदी बढ़ोतरी के साथ निर्धारित की जाएगी।

 

गढ़वाली की दोनों बहुओं का कहना है कि उनकी आर्थिक हालत ऐसी नहीं है कि वे रकम जमा करा सकें। कई साल से लीज ट्रांसफर की मांग भी अनसुनी ही रह गई। उनका कहना है कि अगर दूधातोली की ही पैतृक जमीन वापस मिल जाए तो वे वहां चले जाएं, लेकिन उसका भी कहीं अता-पता नहीं है।

23 अप्रैल, 1930 को हवलदार मेजर चंद्र सिंह भंडारी के नेतृत्व में पेशावर गई गढ़वाली बटालियन को अंग्रेज अफसरों ने वहां खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व में भारत की आजादी के लिए लड़ रहे निहत्थे पठानों पर गोली चलाने का हुक्म दिया। लेकिन चंद्र सिंह ने इसे मानने से इनकार करते हुए कहा, हम निहत्थों पर गोली नहीं चलाते। गढ़वाली की बटालियन ने विद्रोह कर दिया।

 

इतिहास में पेशावर विद्रोह के नाम से जानी जाने वाली इस घटना के महानायक चन्द्र सिंह गढ़वाली ही थे। बगावत के जुर्म में गढ़वाली और उनके 61 साथियों को कठोर कारावास की सजा दी गई। साथ ही अंग्रेजी हुकूमत ने गढ़वाली के पैतृक गांव दूधातोली में उनकी जमीन और मकान भी कुर्क कर लिया। ‘राष्ट्रपिता’ महात्मा गांधी ने चंद्र सिंह भंडारी को गढ़वाली उपाधि दी थी। तब से उन्हें गढ़वाली कहा जाने लगा।