udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news श्रीलंका की स्मृतियों में भारत की चेतना के प्रभु श्रीराम की पत्नी मां सीता सुरक्षित !

श्रीलंका की स्मृतियों में भारत की चेतना के प्रभु श्रीराम की पत्नी मां सीता सुरक्षित !

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उदय दिनमान डेस्कः श्रीलंका की स्मृतियों में भारत की चेतना के प्रभु श्रीराम की पत्नी मां सीता सुरक्षित !हम सभी ने रामायण देखी और सुनी है और भगवान राम और सीता की अग्निी परीक्षा से लेकर हर किस्से का आज भी देश के अलग-अलग कौनों पर अलग-अलग माध्यमों से वर्णन किया जाता है। माता सीता श्रीलंका में कितनी सुरक्षित थी यह आज भी प्रांसागिक है। चलिए जानते है इसके बारे में विस्तार से-

 

 

जैसा कि आप सभी जानते हैं कि पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने पर लोगों ने अपने घरों में रोशनी जलाकर उनका स्वागत किया था, भले भारत की चेतना में प्रभु श्रीराम बसे हैं, श्रीलंका की स्मृतियों में भी मां सीता सुरक्षित हैं। नुवारा एलिया के घुमावदार ऊंचे पहाड़ों की घनी हरियाली में ही कहीं अशोक वाटिका थी, दो दिशाओं में आधे आसमान तक ऊंचे ऐसे ही एक पहाड़ी के कोने में मां सीता का मंदिर है।

 

इस इलाके में तो कई मंदिर हैं, लेकिन वानर सिर्फ मां सीता के मंदिर में ही नजर आए। मंदिर में प्रवेश द्वार से लेकर भीतर कर वीर योद्धा के रुप में हनुमान की कई प्रतिमाएं रखी रखी है, किंवदती है कि मंदिर के पीछे एक चट्टान पर हनुमान के चरण चिन्ह भी हैं, इसके साथ ही एक खास किस्म के अशोक का पेड़ मां सीता के निवास के इसी दायरे में मिलता है।

 

ऐसा कहा जाता है कि लक्ष्मण जी को बचाने के लिये जब हनुमान संजीवनी बूटी के लिये पहाड़ उठा लाये थे, उसमें आई वनस्पतियों का ये ही ये विस्तार है, सिंहली आयुर्वेद में ये औषधियां आज भी वरदान मानी जाती है। अप्रैल में लाल रंग के फूल खिलते हैं।

 

देवुरुम वेला नाम के इस स्थान के बारे में कहा जाता है, कि यहीं मां सीता की अग्नि परीक्षा हुई थी, यहां की मिट्टी काली राख के परत जैसी है, कहावतों के अनुसार आग की वजह से यहां की मिट्टी झुलस गई है, जिससे वो राख जैसी हो गई है। जबकि श्रीलंका में भूरी और हल्के लाल रंग की मिट्टी पाई जाती है।

 

श्रीलंका के शिक्षा राज्यमंत्री वी. राधाकृष्णन मंदिर ट्रस्ट के चेयरमैन हैं, एक लीडिंग वेबसाइड से बात करते हुए उन्होने बताया कि रावण का लंका दहन यहीं हुआ था, मिट्टी में मोटी काली परत स्थानीय लोकमान्यता के अनुसार इसी दहन से जुड़ती है। माता सीता की स्मृतियों से जुड़ा ये स्थान अब पवित्र तीर्थ स्थल बन चुका है।

 

वनवास के 14 साल के दौरान भगवान राम और सीता ने कहां-कहां कितना समय गुजारा इस पर रामेश्वरम में रह चुके पंडित विष्णु शास्त्री ने कहा कि भगवान श्रीराम ने वनवास के दौरान 12 साल चित्रकूट में रहे थे, फिर एक साल पंचवटी में रहे, यहीं से माता सीता का हरण हुआ था, फिर यहीं से राम किष्किंधा की ओर गये, जहां हनुमान और सुग्रीव से उनकी दोसती हुई।

 

रामेश्वरम में जटायु के भाई संपाति ने माता सीता की तलाश में निकले वानरों को उनका पता बताया था, फिर श्रीराम का रामेश्वरम आना, सेतु बनाना और युद्ध लड़ने के लिये लंका जाने के प्रसंग हैं। एक अनुमान के मुताबिक लंका में माता सीता 11 महीने तक रहीं, कई मान्यताओं से भी इसकी पुष्टि होती है।

 

हर महीने श्रीलंका में पोएडे यानी पूजा का एक दिन तय है, माता सीता टेम्पल में उस दिन सबसे ज्यादा चहल-पहल होती है, सैकड़ों सैलानी सीता की कहानी सुनने यहां पहुंचते हैं, फिर माता के दर्शन के बाद बैठकर उनकी कहानी सुनते हैं। कहा जाता है कि जिस दिन हनुमान जी ने सीता जी से मुलाकात की थी, उसी दिन रिंग फेस्टिवल मनाया जाता है।

 

तमिल समाज के लोग जनवरी में पोंगल से एक महीने पहले ही गांव-गांव जाकर भजन गाते हैं, फिर 15 जनवरी को पूर्णाहुति पर शोभायात्रा निकालते हैं। ऐसी मान्यता है कि हनुमान जी ने यहां अशोक वाटिका में सीता जी से मुलाकात की थी।