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सियासत: यरां न बुबा न ब्याण अर न भुला न होण !

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 गैरसैण : देखते हैं अब , ” नव रात्रि ” में कितने दिन गैरसैण में सियासत 

बजट सत्र में खलल न हो इसके लिए पुख्ता इंतजाम भी हैं बल

उदय दिनमान डेस्कः चैत का महीना है । और नवरात्रि के पवित्र 9 दिन भी । कल 20 मार्च से गैरसैण में सरकार का बजट सत्र भी शुरु होगा । 7 दिन चलने का वायदा किया है । देखते हैं कितनेसदिन चलता है । अभी तलक तो गैरसैण में ” सत्रों ” के आयोजन के जो सियासती ड्रामें हुये हैं । उनमें क्या हुआ ? उससे क्या मिला ! कहने लिखने की जरूरत नहीं । सबसे जानते हैं । ड्रामा देखने वाली जनता भी । और ड्रामा करने वाली सियासत भी । जनता गैरसैण पर पर ” नाटक नहीं हकीकत ” देखना चाहती है । पर जिस तरह से गैरसैण के मामले में अब तक हुआ है । क्या कुछ ऐसा होगा गैरसैण में जो जनता की अपेक्षा है । सपना है । अभिलाषा है !

 

गैरसैण में अभी तक के ” न दिल से मुस्कुराने पर मुस्कुराने के गज़ब के सियासी अंदाज ” के खत्म न होने वाले नाटक को देख इस बजट सत्र में ” राजधानी ” के मसले पर कुछ ठोस होगा ?! नहीं लगता । जाने मन यही क्यों कहता है ” यरां आं आं ” दयेख्यूं मनखी क्या दयेखण अर ताप्यूं घाम क्य तापण । ( देखा हुआ आदमी क्या देखना और ताप चुके गर्मी को क्या तापना ?) नैराश्यता और विस्वास खो चुके अनुभव से जन्य इस कहावत से जुडी एक कहावत है ” यरां न बुबा न ब्याण अर न भुला न होण । ( न पिता ने गर्भ वान होना है और न भाई जन्मेगा ) ।
उत्तराखंड की जनता में 17 सालों की सियासत और सरकार के द्वारा गैरसैण के नाम पर जो हुआ उसे देख ” पहाड़ के घर गांवों मे कही जाने वाली उपरोक्त दोनो कहावतें चरितार्थ होती हैं ।

” गैरसैण के भरारी सैण विधान सभा भवन में कल 20 मार्च से शुरू होने वाला सत्र कितने दिन चलेगा ! सब जानते हैं । 7 दिन के तय वायदे पर यकीन करेंगे तो सिवाय आत्म मुग्धता के सिवा कुछ नहीं होने वाला । बजट सत्र की शुरूआत महामहिम के अभिभाषण से शुरू होगी । तय है कि उसके बाद सदन के सदस्य रह चुके थराली के विधायक स्वर्गीय मगन लाल जी के असामयिक निधन पर शोक प्रकट करने के बाद सदन पहले दिन समाप्त होगा । जो स्वाभाविक भी है और नियम व शिष्टाचार भी यही कहता है । बुद्धवार को बजट सदन के पटल पर रखे जाने के बाद और बाकी दिनो क्या होगा ! कितनी गाम्भीर्यता होगी । उत्सुकता और जिज्ञासा रहेगी । कितने दिन रुकती है । टिकती है हमारी सियासत गैरसेण में ! देखते हैं ।

अभी तक तो ” अनुभव यही रहा कभी ” माननीय हों . सरकारों हों या सियासत , गैरसैण में ” धूल उड़ाती तो पर धूल झोंक कर चली भी गयी । या फिर ” गैरसेण में ” घूमेंगे फिरेंगे … और क्या ! वालीवडी गाने तर्ज गुनगुनाती वापस चली गयी । अब तो भरारी सैण में विशाल विधान सभा भवन और शाही अंदाज़ के माननीयों के निवास भी बन गये हैं । ऐश आराम में कोई खलल न हो । इसके लिए सारे ? इंतजामात भी हैं । तब भी यदि सियासत के ” खूबसूरत . नाजुक और मुलायम पैर पहाड़ की जमीन पर इस डर से न पडे और कुछ देर इस डर से न टिकने का इरादा रखें कि ” ये पैर जमीन पर रखो कहीं पैर गंदे न हो जांय , मैले हो जायेंगे । तो खुदा खैर करे ।( पाकीजा फिल्म में शायद कुछ ऐसा ही एक चर्चित संवाद है ” अपने ये खूबसूरत पैर जमीन पर न रखिये मैले हो जायेंगे )

**** खैर बात बजट सत्र और यहाँ कितने दिन हमारी नाजुक पैरों वाली सियासत टिकती है की है । अबकी बार राजधानी के मसले को लेकर प्रदर्शन . धरना जो 103 दिनों से गैरसैण में जारी है । वह क्या रंग लायेगा ” अलग अलग स्थानो पर इस मुद्दे को लेकर प्रदर्शन हो रहे हैं । जमीन से लेकर मीडिया , सोसल मीडिया हर तरफ ” गैरसैण स्थाई राजधानी ” का मुद्दा जेरे बहस ही नहीं सडक और विभिन्न स्थानो पर दिख भी रहा है । कमोवेश ठीक वैसा ही जैसा राज्य निर्माण आन्दोलन के समय था ।

क्या होगा बजट सत्र में । क्या सिर्फ ” इतने हजार करोड़ रुपये ” का बजट हुआ पारित । ” अंकों के आंकड़े ” का बजट होगा कि बजट में ” चेतू . मंगसीरू फजीतू , सुजान सिंह राम प्रसाद . बीरा , बेलमती ( आम जनता के नाम प्रतीक ) की बात भी बजट में होगी । सबकी नजर और अपेक्षा होगी। यूं अभी तक का तकाजा है कि गैरसैण में विधान सभा सत्रों के आयोजन में जो शाही अंदाज में गरीब राज्य में हुये . उन पर कितना बजट खर्च हुआ उससे पहाड़ के उन गावों में डक बन सकती थी जिन गावों में सडक के अभाव में आज भी ” जिन्दगी मौत से पहले मर जाती है । सडक होती तो बीमार या पेडया चट्टान से गिरी जिन्दगी अस्पताल तक पहुंच सकती थी ।

खैर मोटे कलेजे की हो गई सूबे की सियासत को यह पीडा यह हकीकत ” चलता रहता है यार ” कह कर दुत्कारी जाय और जनता भी सह कर भी पढ कर भी इस पीडा को भुला दे । पर अब नजर बजट सत्र पर होगी । ” बडे बडे लोग प्रोटोकॉल के अनुसार आसमान की यात्रा से भरारी सैण के हैली पेड पर उतरेंगे । कुछ गोचर हैलीपैड पर । कुछ कारों से धूल उडाते आयेंगे । धूल हैली काप्टर भी उडायेंगे । कारें भी उडायेंगीं । धूल उडेगी भी और झोंकी जायेगी जैसा कि अब तक हुआ है ।

शाही बारात या पिकनिक ” बने माहौल मे ब्यंजन परोसे जायेंगे।.मेहमानों और बारात में शामिल किसी का स्वाद खराब न हो जाय इसका भरपूर ख्याल भी होगा ( यह बात अलग है कि अभी सरकारी गल्ले की दुकान से पिछले महीनों से न बी पी एल राशन आया न ए पी एल । पर यह भी भला सरकारों की चिंता का स्टेंडर्ड हुआ ठहरा । और अखबारों में जगह पा सकने वाली खबर । मरे तो मरे चेतू मंगसीरू )

बजट सत्र में खलल न हो इसके लिए पुख्ता इंतजाम भी हैं बल । ” बल से जनता की बात तो रोकी जा सकती है पर दबाई भी जायेगी । नही लगता ।खैर क्या होगा बजट सत्र में । उत्सुकता जिज्ञासा हमें भी रहेगी ” नवरात्र का पवित्र समय है । आशा की जानी चाहिए । कुछ रात्रि को जुगारें हमारे माननीय . सरकार . और सियासत गैरसैण में । जनता की सेवा की साधना और उपासना भी इस नवरात्रि में मां भगवती की उपासना अर्चना से कम न होगी । ऐसा न हो कि पिछले शीतकालीन सत्र की तरह हो । ” नौ दिन का वायदा किया था और ” दो ” दिन में ही रुखसत हो गयी थी सियासत गैरसैण से ।

” एक बात और । ये चेत का महीना है । देवी की भी पूजा का पवित्र समय । और वन देवियों और वन परियों की भी पूजा का समय । भरारी सैण विधान सभि भवन की कुछ दूरी पर ” भरारी देवी ” का छोटा सा मंदिर भी है । अत: हे सियासत दानों इतनी चालाकी न करना कि भरारी देवी भी नाराज हों । नवरात्र मे जनता की राज्य की सेवा हो , उपासना भाव हो ” सियासत की वासना ” के ठाठ में न रहना ।

इस चेत में आछरी के गीत होते हैं। ” न बासा घुघूती चेत की , खुद लगीं च मां मैत की । जैसे खुदेड और मन की टीस के गीत के गीत का समय भी है ये ।अत: ” कोई ऐसा काम न करना सियासत ! कि किसी के मन में ” टीस उभर जाय ‘! न जनता के । न मां भगवती के । न वन देवियों के । और न उत्तराखंड की उन मां बहिन रूपी देवियों के । जिनके संघर्ष से यह राज्य जन्मा ।

क्रांति भटृ वरिष्ठ पत्रकार की वाल से साभार