udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news चुनावी शोरगुल देखने और सुनने को नहीं मिल सका

चुनावी शोरगुल देखने और सुनने को नहीं मिल सका

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आदर्श आचार संहिता के मायने
देहरादून । प्रदेश में विधानसभा चुनाव की घोषणा के साथ ही आदर्श आचार संहिता लग चुकी है। पुलिस और प्रशासनिक मशीनरी निष्पक्ष और विवाद रहित मतदान सम्पन्न कराने के लिए पूरी तरह कमर कस चुकी है। चुनाव आयोग की ओर से चुनाव लडऩे वालों के लिए नियम कायदों की भरमार की हुई है।

यह पहली मर्तबा है कि चुनाव को एक माह के आसपास का समय बचा है और अभी तक चुनावी जनता को वह चुनावी शोरगुल देखने और सुनने को नहीं मिल सका है, जो कि पूर्व के चुनावों में देखा और सुना जाता था। जहां एक ओर टिकट के लिए राजनैतिक दलों में घमासान मचा हुआ है, वहीं निर्दलीय चुनाव लडऩे के इच्छुक लोग भी अभी तक अपना जोर मनमाफिक नहीं दिखा सके हैं।

चुनाव प्रचार प्रसार में खर्च की सीमा तय करने के साथ ही सोशल मीडिया के माध्यम से प्रचार प्रसार करने वालों पर भी चुनाव आयोग की नजर पैनी है। वहीं विरोधियों की नजर भी प्रतिद्वंदी पर गड़ी हुई है, कोई चूक हुई नहीं कि चुनाव आयोग को विरोधी की ओर से आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायत दी गई।

ऊ पर से पुलिस प्रशाासन की नजर अलग से। ऐेसे में जबकि चुनाव प्रचार प्रसार की होड़ लगने लगती थी, आज के समय चुनाव करीब होने के बाद भी जनता को चुनाव का अहसास नहीं होना, राजनीतिक परिपाठी के लिहाज से अच्छी बात नहीं कही जा सकती। चुनाव प्रक्रिया लोकतंत्र के लिए जरूरी है, मगर राजनैतिक दलों ने अपने स्वार्थ के चलते चुनाव प्रक्रिया का मजाक बनाकर रख दिया था। सही मायने में 2017 के विधानसभा चुनाव को इसलिए भी याद किया जा सकेगा, जबकि निर्वाचन आयोग की सख्ताई का सीधा असर राजनैतिक दलों और निर्दलीय प्रत्याशियों पर दिखाई दिया गया।