udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news लखपत सिंह रावत को मिलेगा 7वां चन्द्रसिंह यायावर सम्मान

लखपत सिंह रावत को मिलेगा 7वां चन्द्रसिंह यायावर सम्मान

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नरभक्षी गुलदारों से मानव जीवन की रक्षा करने वाले गुरू व प्रसिद्ध शिकारी लखपत सिंह रावत को 7 वां चंद्र सिंह यायावर दिया जायेगा। प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता, राज्य आन्दोलनकारी, विचारक व ट्रेड यूनियन लीडर स्व चन्द्रसिंह यायावर की स्मृति में दिया जाने वाला यह 7वां सम्मान है। इससे पहले यह सम्मान हेम गैरोला को पर्यावरण, लक्ष्मण नेगी व नरेन्द्र चाकर को सामाजिक कार्य, घनश्याम ढोंडियाल को शिक्षा, महिला मंगल दल सिलंगा को शराबबंदी व सुरेन्द्र भण्डारी को खेल में उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया जा चुका है।
यायावर जन चेतना समिति के महासचिव डा सी एस भण्डारी ने बताया कि विकास खण्ड सभागार में 21 नवम्बर को होने वाले समारोह में दिया जायेगा। गौरतलब है की लखपत रावत उत्तराखण्ड में अब तक 50 से अधिक आदमखोर बाघो को निशाना बना चुके हैं। जब उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग में आदमखोर बाघो ने आतंक मचाया तो तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने आयरिश मूल के प्रकूति प्रेमी और शिकारी जिम कार्बेट को बुलाया।

कार्बेट ने १९२५ में रुद्रप्रयाग क्षेत्र में १२५ लोगों और सैकड़ों मवेशियों को निवाला बना चुके तेंदुए को मार गिराया। उन्होंने गढ़वाल और कुमाऊं में ऐसे कई आदमखोरों को अपनी गोली का निशाना बनाया। इसके लिए वह आज तक दुनिया भर में याद किए जाते हैं। आदमखोर बाघो पर लिखी उनकी किताबें भी काफी लोकप्रिय हुई हैं। कार्बेट को तो जनता और तत्कालीन ब्रिटिश सरकार से सम्मान मिला। लेकिन उत्तराखण्ड में जनता को आज आदमखोरों बाघो से निजात दिलाने वाले एक ऐसे शख्स हैं जिन्हें सम्मान मिलना तो दूर सम्मान के नाम पर छला जाता रहा है। इस शख्स का नाम लखपत सिंह रावत है। पेशे से वह एक अध्यापक हैं मगर इससे भी बड़ा काम वह अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर दूसरों की जिंदगी बचाने का कर रहे हैं। कुमाऊं और गढ़वाल में जब कभी भी नरभक्षी बाघ या गुलदार का आतंक होता है तो वन विभाग सबसे पहले लखपत रावत को याद करता है।

49 साल की उम्र में उन्होंने 50 से भी अधिक आदमखोरों का खात्मा कर दिया है।लेकिन आज भी इन्हें वो सम्मान नहीं मिला जिसके ये हकदार थे। मौत के मुंह में जाकर हिंसक जानवरों को ललकारने वाले इस शिकारी का उस समय भी जीवन बीमा नहीं कराया जाता है जब वह ऑपरेशन आदमखोर पर होते हैं। यही नहीं उत्तराखण्ड सरकार उन्हें सम्मानित करने के नाम पर लॉलीपॉप देती रही है। लखपत को कभी राज्य पुरस्कार तो कभी कार्बेट पार्क के प्लेटिनयम जुबली समारोह में सम्मानित करने की बात कही जाती रही है। कभी कहा जाता है कि उनको जीवन रक्षक पुरस्कार दिया जाएगा। लेकिन आज तक सरकार की तरफ से न तो पुरस्कार मिला है और न ही प्रशंसा बावजूद इसके वह आदमखोर से इंसानियत को महफूज रखने के मिशन को बदस्तूर जारी रखे हुए हैं।

चमोली जिले में गैरसैंण के गांव ग्वाड़ मल्ला निवासी लखपत सिंह रावत के पिता त्रिलोक सिंह अध्यापक थे। लखपत के दादा लक्षम सिंह अंग्रेजों के जमाने के मशहूर शिकारी थे। बताते हैं कि उस समय अंग्रेज जब लक्षम सिंह से आदमखोर को मरवाते थे तो इस के एवज में दो आने देते थे। इसके अलावा शिकार करते समय लक्षम सिंह की सुरक्षा की पूरी गारंटी दी जाती थी और उन्हें उचित इनाम दिया जाता था। १९१२ से १९२५ के बीच उन्होंने कई हिंसक बाघो को मार गिराया था।

अंग्रेजों के दिए हुए उस वक्त के कई प्रशंसा पत्र आज भी उनके पोते लखपत सिंह रावत के घर सहेजकर लगाए गए हैं। अपने दादा से प्रेरणा लेकर ही लखपत ने निशानेबाजी और शिकारी बनने की तरफ ध्यान केंद्रित किया। १५ मार्च २००२ के दिन लखपत सिंह ने पहला नरभक्षी बाघ मारा था। वर्ष २००० से २००२ के बीच गढ़वाल के चमोली जनपद में जब नरभक्षी बाघ का आतंक चरम पर था तो तब दो साल में नरभक्षी ने १२ स्कूली बच्चों को निवाला बना डाला था। इन बच्चों की उम्र ५ से १० साल के बीच थी।

नरभक्षी बाघ की विशेषता यह थी कि क्षेत्र में जहां कहीं भी बारात आती थी वह वहां पहुंच जाता था। जिस घर में बारात आती थी उसके आस-पास घात लगाकर बैठ जाता था। जैसे ही कोई बच्चा अपने परिजनों से दूर अकेला हो जाता वह झट से उसे दबोच लेता था। इस तरह चमोली जिले में नरभक्षी बाघ ने खुशियों को मातम में बदलने का काम कर सबको हैरत में डाल दिया था।

इसके चलते लोगों ने बच्चों को शादी-ब्याह में भेजना बंद कर दिया था। इस शातिर बाघ को मारने में लखपत सिंह को पूरे आठ माह लगे थे। वह इतना तेज था कि बच्चों को मौत के घाट उतारने के बाद तुरंत क्षेत्र बदल देता था। अंतिम बार बुंगा में उसने एक बच्चे को मारा और एक घटे में ही वह १४ किलोमीटर दूर आदि बदरी मंदिर के पास पहुंच गया। जहां वह मंदिर से महज १०० मीटर दूर एक मुस्लिम मजदूर के बच्चे को निशाना बनाने की ताक में था। बकौल लखपत सिंह रावत खाना खाने के बाद बच्चा वर्तन धो रहा था तो बाघ महज १० मीटर दूर ही खड़ा उसे ताड़ रहा था। जैसे ही मैंने टार्च की रोशनी की तो उसकी आंखें चमक गईं।

मैंने देर किए बिना ही तुरंत फायर कर उसे ढेर कर दिया। अगर मैंने उस समय एक पल की भी देर की होती तो बाघ का तेरहवां शिकार हो जाता। उस समय चमोली के जिलाधिकारी मदन सिंह थे। जिन्होंने लखपत को न केवल ५००० रुपए का इनाम दिया बल्कि शिकार में उपयोगी साबित होने वाली राइफल का लाइसेंस भी बनवा दिया। हालांकि इससे पहले लखपत को दोनाली बंदूक का भी लाइसेंस मिल चुका था। यह लाइसेंस कैसे मिला? इसकी भी एक रोचक कहानी है। वर्ष १९८४ में एसएसबी क्षेत्र में गुरिल्ला युद्ध का अभ्यास करा रही थी। प्रैक्टिस के दौरान राइफल से फायरिंग करने में लखपत सिंह रावत प्रथम स्थान पर आए जबकि दूसरे स्थान पर चमोली के तत्कालीन जिलाधिकारी उमाकांत पवार रहे। पंवार ने रावत की निशानेबाजी से खुश होकर उन्हें इनाम स्वरूप दोनाली बंदूक का लाइसेंस दिया था। वर्ष २००२ से लेकर अब तक १२ सालों में लखपत ने प्रदेश में कुल ४७ नरभक्षी बाघो और गुलदारों को मौत के घाट उतार लोगों का जीवन बचाने का काम किया है।

इसमें कुमाऊं में १० और गढ़वाल में ३७ हिंसक जानवर मारे गए। जिनमें सबसे ज्यादा चमोली में १३ टिहरी में भी १३ पौड़ी में ६ रुद्रप्रगयाग में ३ उत्तरकाशी में दो अल्मोड़ा में ३ चंपावत में दो बागेश्वर में दो पिथौरागढ़ में २ तथा नैनीताल में एक बाघ शामिल है। उत्तरकाशी में १५ जनवरी २००४ को लखपत द्वारा मारे गए नरभक्षी बाघ ने १४ दिन में ५ बच्चों को उठाकर मौत के घाट उतार दिया था। यह बाघ एक जगह घटना को अंजाम देने के बाद चल देता था और ४०-५० किलोमीटर दूर जाकर अगला हमला करता था। धरासू से भागीरथी पार करते समय वह बाघ रात आठ बजे मारा गया। रावत के अनुसार वह इतना तेज-तर्रार था कि गाड़ी की अवाज सुनकर भाग खड़ा होता था। तब वाइल्ड लाइफ चीफ आनंद सिंह नेगी ने मुझसे कहा कि यह तुम्हारी आवाज यहां तक कि गाड़ी की आवाज को भी पहचानता है। हमने जैसे ही गाड़ी बदली तो वह उसी दिन हमारे हाथों मारा गया। हाल में ६ अक्टूबर को डीडीहाट में मारे गए आदमखोर बाघ की कहानी भी रोंगटे खड़े करने वाली है।

यह बाघ ऐसा था जो केवल शराबी लोगों को ही मारता था। जिस किसी व्यक्ति ने भी शराब पी और वह शोर मचाता हुआ कहीं से निकल रहा होता तो बाघ झट से वहां पहुंच जाता। वह आदमी को मारने के बाद सबसे पहले उसकी आंत और पेट खाता था। कारण कि उसमें से एल्कोहल मिल जाती थी। शायद वह एल्कोहल का आदी हो गया था। इस तरह पिछले एक साल में नशे के दीवाने इस बाघ ने १४ शराबी व्यक्तियों को मार खाया था। पिथौरागढ़ जिले में शराबियों के लिए यह बाघ आतंक का पर्याय बन गया था। डर के मारे वे घरों में कैद होकर रह गए थे। बाघ और गुलदार के आदमखोर होने की असल वजह लखपत सिंह रावत उनके घरों में मनुष्यों की दखल और अवैध शिकार को मानते हैं। जंगलों का सफाया भी जानवरों के हिंसक होने का एक प्रमुख कारण है।

लखपत सिह रावत कहते है कि आदमखोर बाघ और गुलदार की पहचान ये है कि उसका व्यवहार बदल जाता है। आदमी से उसका भय खत्म हो जाता है। उसका मानव बस्तियों की तरफ कूच करने का समय शाम को ६ बजे से रात ८ बजे तक होता है जबकि सामान्य तौर पर बाघ मानव बस्तियों में मध्य रात्रि को ११-१२ बजे आते हैं और सुबह ३ बजे से पहले ही जंगल चले जाते हैं। आदमखोर होने की वजह बाघ का घायल होना या वृद्धवस्था में आना होता है जबकि मादा बाघ किसी भी उम्र में नरभक्षी हो सकती है क्योंकि इनके सामने अपने बच्चों को भोजन कराने की मुख्य वजह हो सकती है। इस समय बाघो का घनत्व क्षेत्र लखपत सिंह टिहरी को बताते बताते हैं। उनके मुताबिक वहां हर एक किलोमीटर पर ४ बाघ हो गए हैं। इसकी वजह वह टिहरी डैम को बताते हैं जिसके कारण करीब ४२ वर्ग किलोमीटर एरिया में जंगल का खात्मा कर पानी की झील बना दी गई है।

संजय चौहान किरूली/ बंड पट्टी / पीपलकोटी / चमोली ।

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