udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news तृतीय केदार भगवान तुंगनाथ के कपाट शीतकाल के लिए बंद

तृतीय केदार भगवान तुंगनाथ के कपाट शीतकाल के लिए बंद

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दुनिया का यह सबसे उचा शिवालय, यहां से ले सकते हैं प्रकृति के सौन्दर्य का भरपूर आनंद

रुद्रप्रयाग। पंच केदारों में तृतीय केदार के रूप में विख्यात भगवान तुंंगनाथ के कपाट कर दिए गए। आज उत्सव डोली अपने शीतलाल प्रवाल के लिए रवाना हुई। तुंगनाथ के जयकारों के साथ कपाट शीतकाल के लिए बंद किए गए।भगवान तुंगनाथ की चल विग्रह उत्सव डोली प्रथम रात्रि प्रवास के लिये चोपता पहुंचेगी और तीस अक्टूबर को शीतकालीन गददीस्थल मक्कूमठ में विराजमान होगी।

 

तुंगनाथ धाम के प्रबंधक प्रकाश पुरोहित ने बताया कि पंच केदार में तृतीय केदार भगवान तुंगनाथ के कपाट सुबह साढ़े दस बजे छह माह के लिये बंद किए गए।। कपाट बंद होने से पूर्व भृंगराज, भष्म, ब्रम्हकमल सहित विभिन्न पूजार्थ सामाग्रियों से भगवान तुंगनाथ के स्वयंभू लिंग को समाधि दी गयी और भगवान तुंगनाथ यहां परछह माह विश्व कल्याण के लिये तपस्यारत हो गये।।

 

 

कपाट बंद होने के बाद भगवान तुंगनाथ की चल विग्रह उत्सव डोली तुंगनाथ धाम से रवाना होकर यात्रा पड़ावों पर श्रद्घालुओं को आशीष देते हुये प्रथम रात्रि प्रवास को चोपता , बनियाकुंड, दुगलविटटा, मक्कूबैंड होते हुये हुडडगू गांव  और वनातोली में हुडडु व कांडा के ग्रामीणों द्वारा भगवान तुंगनाथ को सामूहिक अघ्र्य लगाया जायेगा .

 

 

डोली दो रात्रि प्रवास के लिये भनकुंड पहुंचेगी। 30 अक्टूबर को भगवान तुंगनाथ की डोली भनकुंड से प्रस्थान कर राकसी नदी पहुंचेगी और गंगा स्नान कर शीतकालीन गददीस्थल मक्कूमठ के लिये रवाना होगी। लगभग दोपहर दो बजे डोली के मक्कूमठ पहुंचने पर भगवान तुंगनाथ शीतकालीन गददीस्थल में विराजमान होंगे।

 

 

तुंगनाथ  मंदिर १,००० वर्ष पुराना

तुंगनाथ उत्तराखण्ड के गढ़वाल के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित तुंगनाथ पर्वत पर स्थित है तुंगनाथ मंदिर, जो ३,६८० मीटर की ऊँचाई पर बना हुआ है और पंच केदारों में सबसे ऊँचाई पर स्थित है। यह मंदिर १,००० वर्ष पुराना माना जाता है और यहाँ भगवान शिव की पंच केदारों में से एक के रूप में पूजा होती है। ऐसा माना जाता है की इस मंदिर का निर्माण पाण्डवों द्वारा भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए किया गया था, जो कुरुक्षेत्र में हुए नरसंहार के कारण पाण्डवों से रुष्ट थे।

 

 

चोपता दुनिया में अकेला क्षेत्र है जहां जाती है बस
बारह से चौदह हजार फुट की ऊंचाई पर बसा ये क्षेत्र गढ़वाल हिमालय के सबसे सुंदर स्थानों में से एक है। जनवरी-फरवरी के महीनों में आमतौर पर बर्फ की चादर ओढ़े इस स्थान की सुंदरता जुलाई-अगस्त के महीनों में देखते ही बनती है। इन महीनों में यहां मीलों तक फैले मखमली घास के मैदान और उनमें खिले फूलों की सुंदरता देखने योग्य होती है। इसीलिए अनुभवी पर्यटक इसकी तुलना स्विट्जरलैंड से करने में भी नहीं हिचकते। सबसे विशेष बात ये है कि पूरे गढ़वाल क्षेत्र में ये अकेला क्षेत्र है जहां बस द्वारा बुग्यालों की दुनिया में सीधे प्रवेश किया जा सकता है। यानि यह असाधारण क्षेत्र श्रद्धालुओं और पर्यटकों की साधारण पहुंच में है।

 

बुग्यालों की सुंदर दुनिया से साक्षात्कार
चोपता की ओर बढते हुए रास्ते में बांस और बुरांश का घना जंगल और मनोहारी दृश्य पर्यटकों को लुभाते हैं। चोपता समुद्रतल से बारह हज़ार फुट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां से तीन किमी की पैदल यात्रा के बाद तेरह हज़ार फुट की ऊंचाई पर तुंगनाथ मंदिर है, जो पंचकेदारों में एक केदार है। चोपता से तुंगनाथ तक तीन किलोमीटर का पैदल मार्ग बुग्यालों की सुंदर दुनिया से साक्षात्कार कराता है। यहां पर प्राचीन शिव मंदिर है। इस प्राचीन शिव मंदिर से डेढ़ किमी की ऊंचाई चढ़ने के बाद चौदह हज़ार फीट पर चंद्रशिला नामक चोटी है।

 

 

चौखंभा, नीलकंठ आदि हिमाच्छादित चोटियों के प्रतिबिंब

जहां ठीक सामने छू लेने योग्य हिमालय का विराट रूप किसी को भी हतप्रभ कर सकता है। चारों ओर पसरे सन्नाटे में ऐसा लगता है मानो आप और प्रकृति दोनों यहां आकर एकाकार हो उठे हों। तुंगनाथ से नीचे जंगल की सुंदर रेंज और घाटी का जो दृश्य उभरता है, वो बहुत ही अनूठा है। चोपता से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद देवहरिया ताल पहुंचा जा सकता है जो कि तुंगनाथ मंदिर के दक्षिण दिशा में है। इस ताल की कुछ ऐसी विशेषता है जो इसे और सरोवरों से विशिष्टता प्रदान करती है। इस पारदर्शी सरोवर में चौखंभा, नीलकंठ आदि हिमाच्छादित चोटियों के प्रतिबिंब स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं। इस सरोवर का कुल व्यास पांच सौ मीटर है। इसके चारों ओर बांस व बुरांश के सघन वन हैं तो दूसरी ओर एक खुला सा मैदान है।

 

 

सौन्दर्य अद्भुत और कस्तूरी मृग प्रजनन फार्म
चोपता से गोपेश्वर जाने वाले मार्ग पर कस्तूरी मृग प्रजनन फार्म भी है। यहां पर कस्तूरी मृगों की सुंदरता को निकटता से देखा जा सकता है। मार्च-अप्रैल के महीने में इस पूरे मार्ग में बुरांश के फूल अपनी अनोखी छटा बिखेरते हैं। जनवरी-फरवरी के महीने में ये पूरा क्षेत्र बर्फ से ढका रहता है। चोपता के बारे में ब्रिटिश कमिश्नर एटकिन्सन ने कहा था कि जिस व्यक्ति ने अपने जीवनकाल में चोपता नहीं देखा उसका इस पृथ्वी पर जन्म लेना व्यर्थ है। एटकिन्सन की यह उक्ति भले ही कुछ लोगों को अतिरेकपूर्ण लगे लेकिन यहां का सौन्दर्य अद्भुत है, इसमें किसी को संदेह नहीं हो सकता। किसी पर्यटक के लिए यह यात्रा किसी रोमांच से कम नहीं है।