udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news उत्तराखंड में है विश्व का अनोखा अनाज बैंक , यहां की मेहमाननवाजी सबसे अलग !

उत्तराखंड में है विश्व का अनोखा अनाज बैंक , यहां की मेहमाननवाजी सबसे अलग !

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उदय दिनमान डेस्क: उत्तराखंड में है विश्व का अनोखा अनाज बैंक , यहां की मेहमाननवाजी सबसे अलग !जी हां यह सत्य है आज की यह खास स्टोरी युवा पत्रकार मोहित डिमरी की है और मोहित डिमरी बता रहे हैं कि क्या है यहां खास।

 

उत्तरकाशी के कंवा गांव में मुझे कुठार (अनाज बैंक) ने खासा आकर्षित किया। कुठार आज भी परंपरा को संजोए हुए है। जब मैं इस गांव में पहुंचा तो ग्रामीण गेहूं की मंडाई कर रहे थे। गांव के कुछ परिवार थ्रेसर पर गेहूं साफ कर रहे थे तो अधिकांश परिवार आज भी गेहूं की पकी हुई बालियों को बैलों और खच्चरों के पैरों तले रौंद कर मंडाई कर रहे थे। यह पहाड़ की परंपरागत विधि है।
गांव में एक कुठार यानी अनाज बैंक है। कुठार झोपड़ीनुमा होता है। इसमें पहले के जमाने में अन्न का भंडारण किया जाता था। देवदार की लकड़ी से कुठार का निर्माण किया गया है। इस लकड़ी की यह खासियत है कि यह बारिश में भी खराब नहीं होती और ना ही इस पर दीमक या पुतले लगते हैं। कुठार के अंदर छह खाने बने होते हैं। हर खाने में पांच क्विंटल तक अनाज स्टोर किया जा सकता है।

 

पुराने जमाने में संपंन लोग इसी तरह कुठार बनाते थे। चूंकि उसे जमाने में ताले नहीं होते थे तो कुठार से कोई अनाज न चुराए, इसके लिए कुठार के खिड़कीनुमा प्रवेश द्वार से सांकल यानी लोहे की चेन को जोड़ दिया जाता था। इसका एक सिरा कुठार मालिक के घर में होता था, जिसमें घंटी बंधी होती थी। जैसे ही चोर कुठार में प्रवेश करता, घंटी बज उठती।

 

कंवा गांव में अब यही एकमात्र कुठार है। यह कुठार गांव के बिशना सेठ की है। बिशना सेठ का लगभग 50 वर्षीय पोता चंदन नैथानी बताता है कि यह कुठार लगभग सौ साल पुराना है। उनके दादा ने इसे बनवाया था। यह कुठार पूरी तरह से भूकंपरोधी है। चंदन के अनुसार, 1991 के विनाशकारी भूकंप में उनका पूरा परिवार इसी कुठार के शरण में रहे।

 

 

ग्रामीणों के लिए देवदूत बने कर्नल कोठियाल
निम के प्राचार्य और केदारनाथ पुनर्निर्माण कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे कर्नल अजय कोठियाल ने कंवा गांव के एक युवक को जीवन देने की कवायद की है। यह युवक कुलवीर राणा दो साल पहले पेड़ से गिर गया था। उसकी रीढ़ की हड‍्डी टूट गई थी। देहरादून के इंद्रेश अस्पताल में दो महीने कराने में परिवार की कमर टूट गई। सो, पैसा नहीं था तो कुलवीर को घर ले आए।

 

कुलवीर दो साल से बिस्तर पर ही था। जब इसकी जानकारी कर्नल कोठियाल को मिली तो उन्होंने इसके इलाज की जिम्मेदारी ली और आज कुलवीर का इलाज दिल्ली के लेडी हार्डिंग अस्पताल में चल रहा है। कुलवीर की हालत में सुधार हो रहा है।
पहाड़ों में पेड़ से गिरना और घास-लकड़ी लेने गई महिला के फिसल कर गिरने से रीढ़ की हड्डी टूट जाना या मौत होना आम बात है। क्योंकि यहां न तो समय पर इलाज मिलता है और न ही परिवार इतना संपंन होता है कि इलाज करा सके। कर्नल कोठियाल इस इलाके में देवदूत बनकर आए हैं। जहां उन्होंने आसपास के युवाओं को सेना में भर्ती की निशुल्क ट्रैनिंग देने का बीड़ा उठाया है, वहीं उन्होंने कई पीड़ियों की यथासंभव मदद की है।

 

कर्नल कोठियाल की अभिनव पहल
गांव में एक प्राइमरी स्कूल है। इसमें 60 बच्चे हैं और तीन शिक्षक हैं। लेकिन इंटर के बाद उत्तरकाशी जाना पड़ता है। शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल बरकरार है। युवाओं को स्किल्ड रोजगार देने की कवायद की जा रही है। इसके लिए यूथ फाउंडेशन ने एक प्रोजेक्ट तैयार किया है। कंवा गांव ने 35 नाली भूमि प्रोजेक्ट के लिए दी है। इस प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी कंवा गांव के प्रधान को सौंपी गई है। इसके तहत यूथ फाउंडेशन गांव के युवाओं को सेना में भर्ती ट्रेनिंग देगा और महिलाओं को हस्तशिल्प का काम सिखाया जाएगा। यह निम के प्राचार्य कर्नल कोठियाल की पहल है।

 

फार्मासिस्ट ही है डॉक्टर
गांव में स्वास्थ्य केन्द्र तो है, लेकिन डॉक्टर की तैनाती नहीं हुई है। फार्मासिस्ट को ही ग्रामीण डॉक्टर कहते और मानते हैं। फार्मासिस्ट भी अपनी योग्यतानुसार ग्रामीणों की सेवा कर रहे हैं।

 

रिंगाल का काम छूटा
इस गांव में अनुसूचित जाति के लोग भी बड़ी संख्या में रहते हैं। ग्रामीणों के अनुसार, पहले यहां रिंगाल के कई उत्पाद बनते थे। अनुसूचित जाति के लोगों को इसमें महारत हासिल थी। लेकिन धीरे-धीरे इसमें कमाई कम होने से इन लोगों ने रिंगाल का काम करना बंद कर दिया है। ग्रामीणों के अनुसार इस कला को पुनर्जीवित किया जा सकता है।

 

मेहमाननवाजी की परंपरा अब भी बरकरार
उत्तराखंड की विशेषता है कि यहां कोई अपरिचित गांव में पहुंच जाता है तो उसके सत्कार में किसी तरह की कमी नहीं होती है। ऐसे समय में जब गाय का दूध दुर्लभ होता जा रहा है, यहां सुनील उनियाल के घर पर गिलास भर दही पीने को मिली तो ग्राम प्रधान के घर जैविक खाद्यान्न से बना लजीज भोजन। यहां आज भी जैविक खेती होती है।

 

मोहित डिमरी
की वाल से साभार