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उत्तराखंडः पहाडों में मौत का ताडंव को रोकेगा डॉप्लर रडॉर

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देहरादून । उत्तराखण्ड का जन्म हुए 17 साल का समय हो गया और इस कार्यकाल में राज्य के अन्दर आई दैवीय आपदा में हजारों श्रद्धालुओं व प्रदेशवासियों की आकाल मौत हो चुकी है लेकिन किसी भी सरकार को इंसानों की मौत का दर्द नहीं दिखाई देता जिसके चलते हर साल मानसून के मौसम में पहाडों पर आने वाली दैवीय आपदा में दर्जनों लोगों को हमेशा के लिए मौत की नींद सो जाना पडता है।

 

उत्तराखण्ड में त्रिवेन्द्र सरकार सिर्फ शराब व खनन प्रेम को लेकर अपनी पूरी ताकत झोंके हुए है जबकि गढवाल/कुमांऊ में एक-एक डॉप्लर रडार लगने से हर साल आने वाली दैवीय आपदा में मरने वाले इंसानों को बचाया जा सकता है। हैरानी वाली बात है कि सरकार के इर्दगिर्द सलाहकारों की लम्बी चौडी फौज खडी हुई है लेकिन कोई भी सलाहकार मुखिया को यह सलाह देने के लिए आगे नहीं आ रहा कि एक डॉप्लर रडार लगाने से पहाडों में हर साल होने वाली तबाही को रोका जा सकता है।

 

सरकार को अगर इंसानों की मौत का दर्द होता है तो उसे आगे आकर गढवाल व कुमांऊ में किसी भी कीमत पर जल्द डॉप्लर रडार लगाने के लिए आगे आना चाहिए जिससे कि अगले यात्रा सीजन से पहले पहाड के लोगों को दैवीय आपदा से बचाने के लिए सुरक्षित खाका खींचा जा सके। सरकारों की नाकामी ही है कि 2013 में केदारनाथ में आई दैवीय आपदा के बाद भी उसकी आंखे नहीं खुली क्योंकि आपदा में देशभर के हजारों श्रद्धालुओं को मौत की नींद सोना पडा और सैकडों के शव आज तक लापता हो रखे हैं जिनका इंतजार आज भी उनके परिजन करने में लगे हुए हैं। ऐसे दर्द को कब सरकार अपना दर्द समझकर गढवाल व कुमांऊ में डॉप्लर रडार लगाने के लिए आगे आयेगी इसको लेकर अब प्रदेश भर में एक नई बहस शुरू हो गई है।

 

उल्लेखनीय है कि चारधाम यात्रा अगले सीजन तक रुकी रहेगी, बरसात भी खत्म हो गयी, कल परसो में हम ये भी भूल जाएंगे कि पहाड़ो में आपदा हर बारिश में आती है,लोग मरते है ये सिलसिला अब कुछ दिनों के लिए थम जाएगा इवेंट मीडिया मैनेजमेंट के दौर में और परसो खाया ये भूल जाने की इंसानी फितरत में आवाम सरकार के मुखिया से अनुरोध कर रहा है कि वे कुमाऊं गढ़वाल में डॉप्लर रडार लगवाने के लिए कार्ययोजना को अब अंतिम रूप दे, डॉप्लर रडार बेहद जरूरी है कई सालों से पहाड़ के लोगो को इसकी जरूरत है, इस रडार से ही पता चल पाएगा कि पहाड़ में कहां ज्यादा तेज बारिश या बादल फटने की घटना हो सकती है,

 

उत्तराखंड बनने से अब तक सत्रह सालो में पांच हजार से ज्यादा लोगो को आपदा लील गयी,इसमे केदारनाथ त्रासदी की संख्या अलग है, हर साल बारिश का पानी देख अब पहाड़ के लोगो मे दहशत होती है,क्या हम पहाड़ के लोगो के लिए मौसम चेतवानी का प्रबंधन तंत्र मजबूत कर रहे है? हालांकि एक उपग्रह चित्र से हमे काफी मदद मिल रही है लेकिन जानमाल की सुरक्षा के लिए डॉप्लर रडार बेहद जरूरी है जरूरी तो और भी विकसित मौसम विज्ञान तन्त्र को स्थापित करने की है,

 

जिससे आपदा प्रबंधन को मदद मिल सके पर क्या सरकार के मुखिया इस पर गंभीर होंगे इसपर सन्देह है? क्योंकि उनके इर्द गिर्द बैठे सलाहकारों को ये विषय फिजूल खर्चे का लगेगा क्योंकि ये तर्क दिया जाएगा कि आपदा तो प्राकृतिक है इसे कोई रोक नही सकता, ये सच भी है लेकिन आपदा के जानमाल के नुकसान को कम तो किया जा सकता है।