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उत्तराखंड: वित्तीय प्रबंधन दावों में जमीनी हकीकत से कोसों दूर !

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योगेश भट्ट
देहरादून । तकरीबन ढाई हजार करोड़ रुपये की आमदनी से शुरूआत करने वाला उत्तराखंड आज 25 हजार करोड़ से अधिक की सालाना आमदनी वाला प्रदेश बन चुका है । इस लिहाज से देखें तो उत्तराखंड ने खासी तरक्की की है, लेकिन हालात कई मौकों पर आज पहले से भी बदतर नजर आते हैं ।

राज्य का खर्च बढक़र 45 हजार करोड़ से ऊपर पहुंच चुका है, और कर्ज लेकर घी पीने की प्रवृति लगातार बढ़ती जा रही है। प्रदेश बुरी तरह कुप्रबंधन का शिकार है, हर साल पांच हजार करोड़ के करीब कर्ज से जुटाया जा रहा है। इस बार तो हालात यह हैं कि तकरीबन दस हजार करोड़ रुपये का कर्ज उठाना होगा । आश्चर्य यह है कि इसके बावजूद सरकार के पब्लिसिटी स्टंट में कोई कमी नहीं है। वित्तीय प्रबंधन सिर्फ दावों में है और दावे जमीनी हकीकत से कोसों दूर हैं ।

दरअसल किसी भी राज्य के लिये सालाना बजट का मतलब है सिर्फ और सिर्फ वित्तीय प्रबंधन। दुर्भाग्यवश इस वित्तीय प्रबंधन में अक्सर हमारी सरकारें फेल होती रही हैं । फेल होने का कारण साफ है कि आमदनी ‘अठन्नी’ और ‘खर्च’ रुपय्या । दोनो के बीच इस खाई को पाटने के लिये सरकारें कर्ज की बैसाखी का सहारा लेती रही हैं ।

हालांकि वित्तीय प्रबंधन के लिये कर्ज का सहारा कोई बुरी बात नहीं । लेकिन तकलीफ तब होती है, जब कर्ज किसी व्यवस्था के लिये लाइलाज मर्ज हो जाए । उत्तराखंड में यही हुआ है । यहां राजकाज चलाने के लिए सरकार को जितनी रकम की जरूरत होती है, उसका साठ फीसदी भी सरकार खुद नहीं जुटा पाती । राज्य की अपनी आमदनी रुपये में मात्र चालीस पैसे की है, इसके अलावा 18 फीसदी के करीब राज्य को केंद्र से केंद्रीय करों में अपने हिस्से से मिल जाता है ।

बाकी की रकम यानी लगभग चालीस फीसदी रकम हर साल कर्ज और केंद्र की इमदाद से जुटायी जाती है। केंद्र की मदद पूरी न मिलने की दशा में कर्ज और बढ़ता है । चौदहवें वित्त आयोग के बाद तो उत्तराखंड में हालात अब दिनोंदिन विकट होते जा रहे हैं। बदले हुए फंडिंग पैटर्न में उत्तराखंड को तकरीबन 1400 करोड़ का नुकसान हुआ है।

आंकड़ों की बाजीगरी भी हकीकत की पर्देदारी नहीं कर पा रही है। राजकोषीय घाटा बढ़ता जा रहा है, मौजूदा वित्तीय वर्ष में यह 5000 करोड़ के पार जा पहुंचेगा । दूसरी ओर कर्ज की स्थिति भयावह बनी हुई है । कोई बड़ी बात नहीं कि इस साल के अंत तक कर्ज का यह आंकड़ा 50 हजार करोड़ को छूने लगे ।

प्रदेश की सरकार को भले ही डबल इंजन सरकार का तमगा मिला हुआ है, लेकिन अंदरूनी हालात वाकई चिंताजनक हैं। केंद्र की इमदाद भी लगातार कम हो रही है। तमाम योजनाओं, केंद्र की उपेक्षा को आल वेदर रोड़ और रेल परियोजना के पीछे छिपाने की कोशिश की जा रही है। कर्ज इसलिये भी लाइलाज मर्ज बन चुका है क्योंकि राज्य में आय के अपने नए साधन संसाधन नहीं बन पा रहे हैं ।

दूसरी ओर सरकार का खर्चों पर कोई लगाम नहीं है, वित्तीय भार बढ़ाने वाले फैसलों से सरकार को कोई परहेज नहीं है। चाहे वह नेता अफसरों की वेतन सुविधाओं पर हों या कर्मचारियों के वेतन बढ़ाने पर । आश्चर्य यह है कि सरकारें न अनुभवों से सबक लेती हैं और न ही अन्य राज्यों से । कड़े कदम की बात सिर्फ अखबारी बयानों में होती हैं,

हकीकत तो यह है कि वेतन बांटने के लिये भी सरकार मोटे ब्याज पर बाजार से कर्ज उठा रही है । बात वित्तीय प्रबंधन की हो रही है तो यहां हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक की उस वित्तीय प्रबंधन पर जारी रिपोर्ट का उल्लेख जरूरी है। इस रिपोर्ट के मुताबिक छत्तीसगढ़ वित्तीय प्रबंधन में एक बार फिर अव्वल रहा है । बताते चलें कि उम्र के लिहाज से उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ के बीच मात्र एक सप्ताह का अंतर है । छत्तीसगढ़ उत्तराखंड से महज नौ दिन बड़ा है ।

लेकिन वित्तीय प्रबंधन में वह उत्तराखंड से सौ गुना अधिक कुशल बन चुका है । आंकड़ों में बात करें तो यह उसकी वित्तीय कुशलता है कि छत्तीसगढ़ में विकास कार्यों में तकरीबन 75 फीसदी धनराशि खर्च की जा रही है। वेतन पेंशन आदि पर लगभग 21 फीसदी और कर्ज के ब्याज भुगतान में मात्र चार फीसदी खर्च होता है। इसीलिये छत्तीसगढ़ लगातार वित्तीय प्रबंधन में देश में पहले स्थान पर है । इसके वपरीत उत्तराखंड में 55 फीसदी बजट सिर्फ वेतन पेंशन और अनुदान पर खर्च होता है ।

कर्ज के ब्याज भुगतान में ही उत्तराखंड को कुल बजट का 11 फीसदी से अधिक खर्च करना पड़ता है, जबकि छत्तीसगढ़ में यह आंकड़ा मात्र चार फीसदी है। विकास के हिस्से उत्तराखंड में ‘चवन्नी’ भी पूरी नहीं आती, कुल बजट का मात्र 13 फीसदी हिस्सा विकास कार्यों के लिये रखा जाता है। एक साथ जन्मे दो प्रदेशों के बीच का यह फासला अपने आप में उत्तराखंड के कुप्रबंधन की कहानी बयां करने के लिये पर्याप्त है । इस बार के बजट के भी हाल यही हैं । बजट में विकास हाशिये पर नजर आता है ।

पूरा बजट तनख्वाह, पेंशन, कर्ज के ब्याज और सरकार के खर्च जुटाने के इर्द गिर्द घूम रहा है। सियासत देखिये हालात बेहद नाजुक हैं, लेकिन सियासतदां के सुरों में कोई बदलाव नहीं । मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री के मुताबिक उन्हें साल भर पहले राज्य बेहद खराब स्थिति में मिला, लेकिन अब उन्होंने सब दुरुस्त कर दिया है । काश, उत्तराखंड की सरकार छत्तीसगढ़ से ही सबक ले पाती ।