सरहद पार व्यापार, कभी था गुलजार अब है वीरान

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देश की सीमा पर अत्यंत संवेदनशील रणनीतिक क्षेत्र माना गया भारत-चीन सीमा का चमोली क्षेत्र तमाम तरह की उपेक्षाओं के चलते आज पलायन की तरफ अग्रसर है। गांवों से शहर की तरफ आने वाली आबादी में पिछले पांच सालों में तीव्र वृ(ि हुई है। सीमा के गांव अचानक तेजी से खाली होने शुरू हुए हैं। अपने बेहतर भविष्य की तलाश में ये संक्रमण तेजी से फैल रहा है। राज्य बन्ने के बाद एक एक कर टूटते सपनों के साथ व विकास की जन विरोधी नीतियों के चलते ये बढ़ेगा ही।फिर शायद हाशिए तो रहेंगे पर हाशिए पर रहने वाले ना रहें। इस दर्रें पर व्यापार और भारत-चीन यु( के बाद पनपे हालात पर प्रेेम पंचोली का यह विशेष आलेख। संपादक
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जोशीमठ नीति माना के दर्रों को जाने व जोड़ने का संधिस्थल होने से व्यापारिक मार्ग की वजह से व मुख्य पड़ाव तो था ही। मुख्य व्यापारिक मंडी भी था, जिससे यहाँ के भोटया समुदाय व खेती पर निर्भर अन्य लोगों में समृधि थी। बदरीनाथ यात्रा का पड़ाव होने से इसका और भी महत्व रहा होगा। किन्तु भारत चीन यु( के उपरान्त इस स्थिति में बदलाव आया। भोटिया समुदाय जो पूरी तरह इस वयापार पर निर्भर था उसके सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया। उसे मजबूरन खेती की तरफ रुख करना पडा। जोशीमठ के आस पास अधिकाँश जनजाति गांव आज भी इस झटके से नहीं उबरे। आज भी अधिकाँश भोटिया बहुल गांवों की स्थिती आदिम जमाने के गांवों जैसी है। लाता से ऊपर के गांवों में जाइए तो आप बाकी दुनिया के हिस्से ही नहीं रह जाते। १९९८ में भूकंप की त्रासदी के बाद बहुत से गांव जर्जर हो गए। उसके बाद की बरसातों की आपदा के चलते गांव बसावट लिहाज से असुरक्षित हो गए।

किसी ने कहा है जहां हम खड़े हैं देश वहीं से शुरू होता है। परन्तु मैं जहां रहता हूँ वहाँ देश खत्म होता है और यह सिर्फ मुहावरे के तौर पर ही नहीं बल्कि सचमुच ही। जोशीमठ भारत के सीमा का आखिरी प्रखंड है। इसकी सीमा फिर तिब्बत या चीन से मिलती है और जिस तरह यह भौगोलिक तौर पर हाशिए पर यानी सीमान्त पर है उसी तरह विकास के पैमाने पर भी हाशिए पर ही है। कुछ समय पहले हम थैंग गांव के लोगों के साथ जोशीमठ के उपजिलाधिकारी से मिले। सवाल था कि पिछले पांच साल में थैंग मोटर मार्ग तीन किलोमीटर भी पूरा नहीं बन पाया है जबकि इसे २0११ में १0 किलोमीटर बन कर पूर्ण हो जाना था। इस सडक के लिए दी गयी राशि जबकि आधी से ज्यादा भुगतान की जा चुकी है, जो सडक बनी भी है उसका हाल ये कि पैदल चलना मुश्किल हो गया है। थैंग गांव जोशीमठ से २२ किलोमीटर की दूरी पर बसा गांव है। सडक से लगभग १0 किलोमीटर की दूरी है। वैसे जोशीमठ से चाहें तो थोडा नजरों पर जोर डालने पर दिखाई भी देता है परन्तु आजादी के इतने साल बाद भे सड़क नहीं। जिस सड़क के पूरा होने की बात लोग जोह रहे हैं, इस सडक के लिए सन २00५ में गांव के लोगों ने आंदोलन किया। आंदोलन के दौर में जब किसी तरह सुनवाई नहीं हुई तो लोगों ने सड़क पर जाम लगा दिया, जिस पर तत्कालीन उपजिलाधिकारी के आदेश पर पुलिस ने ग्रामीणों पर लाठीचार्ज कर दिया जिसमें कई महिलाएं व पुरुष घायल हुए। १७ ग्रामीणों पर मुकदमें हुए, आज भी लोग मुकदमों के फैसले के इन्तजार में हैं। लेकिन जिस के लिए ये सब झेला वो सड़क आज तक नहीं बनी, ऐसा ही गांव है-किमाना सडक से ८-९ किलोमीटर की पैदल खड़ी चढ़ाई वाली दूरी पर इसके बगल का गांव पल्ला,जखोला,ऐसे कई गांव हैं। १९६२ से पहले जबकि भारत चीन यु( नहीं हुआ था,
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जोशीमठ के रास्ते सीमापार व्यापार होता था। यहाँ से भोटिया ब्यापारी उन और अन्य सामान लेकर जाते और वहाँ से नमक लेकर आते। जोशीमठ नीति माना के दर्रों को जाने व जोड़ने का संधिस्थल होने से व्यापारिक मार्ग की वजह से व मुख्य पड़ाव तो था ही। मुख्य व्यापारिक मंडी भी था, जिससे यहाँ के भोटया समुदाय व खेती पर निर्भर अन्य लोगों में समृधि थी। बदरीनाथ यात्रा का पड़ाव होने से इसका और भी महत्व रहा होगा। किन्तु भारत चीन यु( के उपरान्त इस स्थिति में बदलाव आया। भोटिया समुदाय जो पूरी तरह इस वयापार पर निर्भर था उसके सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया। उसे मजबूरन खेती की तरफ रुख करना पडा। जोशीमठ के आस पास अधिकाँश जनजाति गांव आज भी इस झटके से नहीं उबरे। आज भी अधिकाँश भोटिया बहुल गांवों की स्थिती आदिम जमाने के गांवों जैसी है। लाता से ऊपर के गांवों में जाइए तो आप बाकी दुनिया के हिस्से ही नहीं रह जाते। १९९८ में भूकंप की त्रासदी के बाद बहुत से गांव जर्जर हो गए। उसके बाद की बरसातों की आपदा के चलते गांव बसावट लिहाज से असुरक्षित हो गए। लोगों के विस्थापन की मांग करने पर, सरकार द्वारा सर्वे करवाया गया। सन २00७ में प्रशासन द्वारा बनाई गयी सूची के अनुसार जोशीमठ प्रखंड के ३0 गांव विस्थापन की श्रेणी में रखे गए। १६ -१७ जून २0१३ की आपदा के बाद विस्थापित किये जाने वाले गांवों की संख्या बढ़कर ३६ हो गयी। जोशीमठ प्रखंड में कुल गांवों की संख्या ५२ ही है, जब ५२ में से ३६ गांव विस्थापन की श्रेणी में हों तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि भौगोलिक ,भूगर्भिक तौर पर इस क्षेत्र की क्या स्थिति है। प्रशासनिक व शासन की हील हवाली का ये हाल है कि जो गांव पिछले कई सालों से विस्थापन की मांग कर रहे हैं व बहुत दयनीय दशा में गांव में रह रहे हैं उनकी कोई सुनवाई नहीं है। इन्ही में एक गांव है गनाई, यहां के लोग पिछले कई वर्षों से विस्थापन की मांग कर रहे हैं। पिछले छ माह से लगातार आंदोलन के बावजूद कोई ठोस पहल इनके विस्थापन को लेकर नहीं हुई। गांव की हालत ये है कि ठोड़ी सी भी बरसात होने पर लोग जाग कर रात काटते हैं। गांव के एक हिस्से दाड्मी में कुछ लोग दो बार घर बना चुके है और दोनों बार उजाड गए। जब आंदोलन तेज हुआ तो स्थानीय विधायक राजेन्द्र भंडारी राहत के हेलीकाप्टर से गांव पहुँच गए और १५ दिन में विस्थापन कर देने की घोषणा कर आंदोलन बंद करने को कह कर हवा हो गए। तबसे चार माह हो जाने पर लोग फिर सड़क पर हैं। यही हाल बाकी के विस्थापित होने वाले गांवों का है। १६-१७ जून को पूरी तरह तबाह हो गए गांव भ्युडार के लोग भी लड़ हार कर थक गए। किन्तु उनके लिए विस्थापन हेतु भूमि का प्रबंध नहीं हुआ। आज वे उजाड गए गांव पुलना में ही किसी तरह गुजारा करने को मजबूर कर दिये गए हैं। सन २00१ में जोशीमठ के लोग विष्णुप्रयाग परियोजना, जिसे कि जयप्रकाश कंपनी बना रही थी का विरोध करने सडक पर उतरे। लोगों की मुख्या चिंता इस परियोजना की सुरंग बनाये जाने के लिए किये जा रहे विस्फोटन से क्षेत्र को पैदा हो रहे खतरे को लेकर थी। कुछ दिनों बाद नेतृत्वकारियों का कम्पनी से समझौता हो गया और विस्फोट अबाध जारी रहे। पूरा क्षेत्र हिलता रहा। आन्दोलन इसकी बाद भी हुए।

वादे आश्वासन भी हुए पर .. ..परियोजना पूरी हो गयी। और कुछ समय बाद २00७ में इन विस्फोटों के परिणाम स्वरूप चाई गांव उजड़ गया। आज भी गाँव इन दरारों के खतरे में है। किन्तु इसके बाद सन २00४ में एक और परियोजना तपोवन विष्णुगाड जल विद्युत परियोजना का सर्वे यहाँ प्रारम्भ कर दिया गया। सर्वे की शुरुआत से ही जनता में इस परियोजना को लेकर आक्रोश था, जिस कारण इसका तभी से तीव्र विरोध होने लगा जिसकी वजह जोशीमठ की भूगर्भीय स्थिति को लेकर लोगों में आशंका थी। जिसको लेकर १९७६ में बनी सतीश चन्द्र मिश्रा कमेटी की रिपोर्ट ने आगाह किया था। इसके बावजूद जोशीमठ के नीचे से सुरंग बनाया जाना जनता को गवारा ना था। लिहाजा जबर्दस्त आंदोलन हुआ। इस आंदोलन की वजह से परियोजना का उद्घाटन,जो कि जोशीमठ में होना था और मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी द्वारा किया जाना था। सारी तैयारियों के बावजूद निरस्त करना पडा।बाद में इस परियोजना का उद्घाटन परियोजना स्थल से ३00 किलोमीटर दूर देहरादून में किया गया और ये सिलसिला यहीं नहीं रुका, इसके बाद कई अन्य परियोजनाओं को स्वीकृति मिली।

आज जोशीमठ प्रखंड में दर्जन भर परियोजनाएं या तो प्रस्तावित हैं अथवा कार्य कर रही हैं जिन सभी पर स्थानीय लोगों की स्वीकृति बस नाम भर को कागजी खानापूर्ति के बतौर ही ली गयी। इनमें से लगभग सभी पर जनता की आपत्तियां हैं आंदोलन हैं। शिक्षा और स्वस्थ्य के सवाल पर भी हाशिए पर ही है जोशीमठ। सुदूर गांवों की शिक्षा की हालत का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि अधिकाँश वहन कर पाने वाले लोग बच्चों को जोशीमठ नगर में लाकर पढाते हैं और नगर की शिक्षा प्राइवेट शिक्षण संस्थाओं के हवाले है। ५0 -६0 हजार की आबादी वाले जोशीमठ ब्लोक का एक मात्र प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र जोशीमठ में है। जिसमें चिकित्सकों का अभाव है। एक भी सर्जन नहीं है। महिलाओं के लिए बना अस्पताल वीरान बाजार पडा है। जबकि यात्रा काल में सडक दुर्घटनाओं के लिए अत्यंत संवेदनशील ये क्षेत्र इसी अस्पताल के भरोसे है जो सामान्य दिनों में ही रेफेरिंग सेंटर की तरह काम करता है।