udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news उत्तराखंड: राजनैतिक दलों के सामने अबकी दफा भी मुद्दों का अकाल

राजनैतिक दलों के सामने अबकी दफा भी मुद्दों का अकाल

Spread the love

har-ki-doon1
देहरादून। मिशन 2017 के लिए कांग्रेस और भाजपा समेत तमाम राजनैतिक दलों ने तैयारियों को अमलीजामा पहनाना तेज किया हुआ है। भाजपा जहां केंद्र सरकार की कामयाबी का सेहरा सिर पर बांधे हुए प्रदेश की जनता के बीच वोट की अपील करने की मंशा पर काम कर रही है। वहीं कांग्रेस अपने बूते प्रदेश में विकास की गंगा बहाने का दावा करते नहीं अघा रही। वहीं कांग्रेस की ओर से केंद्र की नीतियों को भी उत्तराखंड के विकास में आड़े आना बताया जा रहा। उधर दूसरे राजनैतिक दलों के सामने हमेशा की तरह अबकी दफा भी मुद्दों का अकाल नजर आ रहा है। पूर्व की भांति इन तमाम दलों के पास सिवाय भाजपा और कांग्रेस को उत्तराखंड का विकास रोकने वाली पार्टी बताने के और कोई चारा नहीं रह गया है।
परिवर्तन यात्रा के जरिए प्रदेश में सत्ता परिवर्तन की बयार बहाने का दावा करने वाली भाजपा और सतत संकल्प विकास यात्रा को लेकर राज्य विकास का श्रेय लेने को आतुर कांग्रेस दोनों ही दल यह भूल रहे हैं कि चुनावी समय ऐसे ढोल पीटने की परिपाठी को जनता अब समझने लगी है। प्रदेश विकास में रोड़ा बताते हुए एक दूसरे को कोसने की परिपाठी शुरू कर चुके ये दोनों राजनैतिक दल भूल रहे हैं कि उत्तराखंड गठन के बाद भी प्रदेश में रोजगार के अवसर उस पैमाने पर उपलब्ध नहीं हो सके हैं, जिसकी की राज्य के युवाओं को दरकार थी। आज भी युवा और विशेषकर पर्वतीय इलाकों के युवा रोजगार तो रोजगार, पठन-पाठन के लिए भी पहले तो मैदानी इलाकों का रूख करते हैं और पढ़ाई पूरी करने के बाद वापस या तो मैदानी इलाकों या फिर बाहरी जिलों का रूख सिर्फ इसलिए कर रहे हैं कि पर्वतीय जिलों में आज भी रोजगार के भरपूर अवसरों की कमी है।
हालांकि राज्य सरकार दावा तो कर रही है कि भाजपा शासित राज्यों की तुलना में उत्तराखंड में हर क्षेत्र में बेहतरी है। मगर मौजूदा सरकार के पास क्या इस बात का कोई जबाव है कि आखिर प्रदेश के युवाओं में रोजगार की तलाश में दूसरे जिलों की ओर दौड़ लगाने का आखिर कारण क्या है। प्रदेश सरकार युवाओं को उद्यम से जोडने की जरूरत तो बताती है, इस ओर सरकारी स्तर पर घोषणाएं भी बहुतेरी की जाती रही हैं। मगर सरकार की हजारों घोषणाएं या तो हवा में तैरती नजर आ रही हैं, या फिर शासन में बाबुओं की टेबल पर रखी फाइलों में कैद होकर रह गई हैं। उत्तराखंड आंदोलन में अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वालों के साथ साथ प्रदेश की जनता को आज भी स्थाई राजधानी के लिए तरसना पड़ रहा है। गैरसैंण का नाम हर बार विधानसभा चुनाव के पूर्व ही राजनैतिक गलियारों से उछाला जाता है और राजनीति की भेंट चढने के सिवाय कुछ नहीं होता। निर्विवाद सत्य है कि जहां एक ओर सत्ताधारी दल जनता की जमीनी जरूरतें पूरी करने में नाकाम रही हैं। वहीं विकास की जगह घोषणाओं से छला जा रहा। इन सोलह सालों में सबने देखा है कि गैरसैंण भी राजनैतिक अखाड़े की भेंट चढ़ चुका है। यानि घोषणा पर घोषणा लेकिन धरातल पर कुछ नहीं।
suneta-perkash
सुनीता प्रकाश, समाजसेवी।
जनहित में घोषणा करना अच्छी बात है। हर कोई चाहता है उसके क्षेत्र का विकास हो, उसकी मांग पूरी हो। लेकिन घोषणा करते वक्त इस बात का ध्यान जरूर रखना चाहिए कि केवल वाह-वाही लूटने के लिए घोषणा न हो। घोषणा नीति संगत है कि नहीं, बजट का प्रावधान किस प्रकार से होगा। पहले की गई घोषणाओं में से कितनी धरातल पर उतरी, कितनी के लिए बजट की व्यवस्था हुई। अगर इन सब बातों का ख्याल सत्ता चलाने वाले रखेंगे तो जनता के साथ कभी छलावा नहीं हो सकता है।