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पानी से स्नान करने से त्वचा जैसे रोगों से मिलती है मुक्ति

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.वैसे तो

हिमालय के शिवालिक क्षेत्र में गंधकयुक्त पानी के चश्मे मिलते ही है परन्तु उत्तराखण्ड की अस्थायी राजधानी देहरादून में इन चश्मों ने अपनी सुन्दरता के बरख्त लोगों को सरेआम अपनी ओर आकर्षित किया है। अब हालात इस कदर है कि ये गंधकयुक्त पानी के चश्में अपने प्राकृतिक स्वरूप खोते ही जा रहे हैं। भले देहरादून से 10 किमी के फासले पर सहस्त्रधारा जैसे पर्यटन स्थल पर्यटकों को वर्ष भर यहाँ आने के लिये आमंत्रण क्यों न देता हो पर वर्तमान में सहस्त्रधारा की ‘गंधकयुक्त जल धारा’ प्रतिवर्ष कम होती ही जा रही है।

सहस्त्रधारा के अलावा देहरादून से लगभग 30 किमी के फासले पर एक गंधकयुक्त पानी का चश्मा है जिसे स्थानीय लोग ‘घुत्तू गंधक पानी’ कहते हैं। यानि घुत्तू नामक स्थान पर यह गंधक के पानी का चश्मा इन दिनों प्राकृतिक आपदा की मार झेल रहा है।

बता दें कि सहस्त्रधारा ही क्यों इसके अलावा देहरादून से मात्र 30 किमी घुत्तू गाँव के पास में बांदल नदी के जल ग्रहण क्षेत्र में सहस्त्रधारा से ज्यादा गंधक की मात्रा वाला पानी का दूसरा चश्मा है जो अब तक उपेक्षित पड़ा है। तात्पर्य यह है कि ना तो इस चश्में के पानी के संरक्षण के लिये कोई कारगर योजना बनी ना ही इसके मरम्मत पर कोई काम हुआ और ना ही इस चश्में को पर्यटन के रूप में विकसित कर पाये हैं।

वर्ष 2013 की आपदा और मौसम परिवर्तन के कारण इस गंधकयुक्त पानी के चश्में का प्राकृतिक स्वरूप बिगड़ता ही जा रहा है। इसमें पानी की मात्रा कम होती जा रही है। यह चश्मा आपदा और अन्य प्राकृतिक घटनाओं के कारण अब गाद से भरने लग गया है।

‘घुत्तू गंधक पानी’ तक पहुँचने के लिये प्राकृतिक सौन्दर्य का नजारा, एक छोटा सा ट्रैकिंग रूट, बांदल नदी का किनारा जैसे लोगों को बरबस आकर्षित करती है वैसे माल देवता के पास सत्यौ गाड़ और बांदल नदी का संगम भी देखते ही बनता है। सत्यौ गाड़ और बांदल नदी, माल देवता के पास संगम बनाने के बाद सौंग नदी का रूप ले लेती है। वैसे भी बांदल नदी के पानी में सर्वाधिक पानी की मात्रा ‘घुत्तू गंधक पानी’ की ही कही जाती है। सत्यौ गाड़ का पानी गर्मियों में नाम मात्र का रह जाता है परन्तु बांदल नदी के कारण माल देवता से आगे का प्रवाह सौंग नदी का बना रहता है। अर्थात सौंग नदी में भी गंधक की मात्रा है।देहरादून से 30 किमी दूर बांदल घाटी में ग्राम पंचायत घुत्तू की सरहद में यह गंधकयुक्त पानी का चश्मा पर्यटकों की नजरों से आज भी ओझल बना हुआ है। विडम्बना ही है कि पर्यटन की अपार सम्भावनाओं के बावजूद इस तरफ ध्यान नहीं दिया जा रहा है। यही नहीं यह चश्मा जहाँ पर्यटकों के लिये आकर्षण का केन्द्र है वही इसके पानी से स्नान करने से त्वचा जैसे रोगों से मुक्ति मिलती है।

घुत्तू, द्वारा, तमोली, क्यारा गाँवों के अलावा नजदीक के हल्द्वाड़ी, रंगड़गाँव समेत क्षेत्र के तमाम गाँवों के लोग त्वचा सम्बन्धी बीमारियाँ होने पर इसी स्रोत की शरण में जाते हैं। इस चश्मे से गंधकयुक्त पानी निकलने के कारण क्षेत्रवासियों ने इस जगह का नाम ‘गंधक पानी’ ही रख दिया है।

बांदल नदी के जल ग्रहण क्षेत्र से लगी पहाड़ी से निकलने वाले इस चश्मे का गंधकयुक्त ठंडा जल और उसके आसपास की नैसर्गिक छटा मन को आनन्दित कर देती है।

मालदेवता से बांदल नदी के किनारे-किनारे 15 किमी की दूरी तय कर इस स्थल तक पहुँचा जा सकता है। परन्तु यह ध्यान रखना होता है कि माल देवता से ‘घूत्तू गंधक पानी’ तक पहुँचने के लिये जाने वाली सड़क थोड़ी सी बारिश होने पर कभी भी नदी में तब्दील हो सकती है। इसलिये ‘घुत्तू गंधक पानी’ तक पहुँचने के लिये पैदल जाना ही ज्यादा सुरक्षित है। यह एक बेहतर ट्रैकिंग रूट भी है। प्राकृतिक नजारों से भरा यह स्थल अभी तक पर्यटकों की निगाह से दूर है।

गौरतलब हो कि शासन-प्रशासन की ओर से इस दिशा में कोई प्रयास भी होते नजर नहीं आ रहे हैं। रंगड़गाँव के प्रधान भरत सिंह बताते हैं कि इस चश्में के पानी में सहस्त्रधारा की अपेक्षा गंधक की मात्रा अधिक है। उन्होंने बताया कि दो दशक पूर्व पर्यटन विभाग के तत्कालीन महानिदेशक एसएस पांगती ने इस स्थल पर पहुँचकर इसे पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने की बात कही थी, लेकिन यह कोरी साबित हुई।

घुत्तु गाँव के बगल से निकलती हुई बांदल नदीइसके अलावा उत्तराखण्ड बनने के बाद दो मंत्रियों नवप्रभात और मातबर सिंह कंडारी ने क्षेत्र के लोगों को ऐसा ही भरोसा दिया था, लेकिन अब तक कुछ होता नजर नहीं आ रहा। कहा कि यदि इस चश्में के संरक्षण बाबत समय पर कार्य नहीं हुआ तो जल्दी ही सूखने की कगार पर आ जाएगा।

ग्रामीण विक्रम सिंह पंवार का कहना है कि उनके लिये तो यह पानी का चश्मा प्रकृति का दिया हुआ महत्त्वपूर्ण उपहार है। क्योंकि उनके क्षेत्र में त्वचा जैसी बिमारी इस चश्में के कारण पनप नहीं सकती और ना ही इस क्षेत्र में त्वचा से सम्बधित रोगी हैं। वह आगे कहते हैं कि जिस तरह से इस चश्में का प्राकृतिक स्वरूप बिगड़ता जा रहा है वह आने वाले दिनों में क्षेत्र के लिये सबसे बड़ी दुर्घटना कहलाएगी।

उल्लेखनीय तो यह है कि जैसे-जैसे लोगों के नजदीक चिकित्सा स्वास्थ्य की सुविधाएँ बढ़ती गई वैसे-वैसे यह गंधक युक्त चश्मा भी अपना प्राकृतिक स्वरूप खोता गया। कारण इसके कि पहले-पहल लोग अपने इस चश्में की नियमित सफाई भी करते थे और इसके जल ग्रहण क्षेत्र में कोई अप्राकृतिक काम भी नहीं करते थे।

अब इस क्षेत्र में एक तरफ पर्यटकों का आना-जाना और दूसरी तरफ वन कानूनों की सख्ती से भी यह प्राकृतिक जलस्रोत लोगों के अधिकार क्षेत्र से बाहर होने लग गया है। लोग बिना ‘वन विभाग’ के इस क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और दोहन नहीं कर सकते।

हाल में हुई भारी बरसात के कारण बांदल नदी का जलस्तर इतना बढ़ गया था कि इस क्षेत्र में जान-माल की तो कोई हानि नहीं हुई परन्तु प्राकृतिक संसाधन जैसे जलस्रोतों ने अपना रास्ता बदल दिया। जिसकी मार ‘घुत्तू गंधक पानी’ यानि इस चश्में पर भी पड़ी।

घुत्तु गाँव में गंधक के पानी का चश्मा से निकलती हुई नदीहालात इस कदर है कि ना तो लोग इस चश्में की नियत समय में मरम्मतीकरण का काम कर पा रहे हैं और ना ही सरकार द्वारा कोई खास कदम उठाए जा रहे हैं। कुल मिलाकर वन कानूनों के कारण ‘घुत्तू गंधक पानी’ का चश्मा भविष्य में अपने प्राकृतिक स्वरूप में आएगा कि नही जो अहम सवाल है।