योजनाओं के क्रियान्वयन हेतु एक बड़ी कार्य योजना लॉन्च करेगी

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देहरादून : मुख्यमंत्री श्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने शुक्रवार को मुख्यमंत्री आवास में ग्रामीण विकास एवं पलायन आयोग उत्तराखंड द्वारा जनपद पौड़ी की सिफारिश रिपोर्ट का विमोचन किया। मुख्यमंत्री श्री त्रिवेंद्र ने कहा कि पलायन रोकने व जनपद में विकास को सुनिश्चित करने के लिए क्या किया जाना चाहिए इसका विश्लेषण सिफारिश रिपोर्ट में किया गया है। सबसे अधिक पलायन प्रभावित जनपद पौड़ी के बाद क्रमशः अल्मोड़ा व अन्य जिलों का अध्ययन किया जाएगा।
इसके साथ ही राज्य सरकार ग्रामीण विकास से संबंधित सभी विभागों के साथ संयुक्त प्रयास के साथ  पलायन  प्रभावित जिलों में विकास की कार्ययोजना पर कार्य करेगी। उन्होंने कहा कि सहकारिता विभाग ने ग्रामीण विकास की दृष्टि से 3600 करोड़ की योजना बनाई है, जिसे भारत सरकार ने भी संस्तुति दे दी है। यह ऋण व्यवस्था है जिसमें 80 राज्य  तथा 20 केंद्र सरकार द्वारा वहन किया जाता था। अब इसे 60 व 40 कर दिया गया है।राज्य सरकार जल्द ही ग्रामीण विकास की दृष्टि से तमाम योजनाओं के क्रियान्वयन हेतु एक बड़ी कार्य योजना लॉन्च करेगी।
ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग की यह सिफारिश रिपोर्ट आयोग की वेबसाइट पर भी उपलब्ध है।इस अवसर पर प्रमुख सचिव श्रीमती मनीषा पवार, ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग के उपाध्यक्ष डॉ एसएस नेगी सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे। इस सम्बन्ध में पलायन आयोग के उपाध्यक्ष डॉ एसएस नेगी ने जानकारी दी कि ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग, जनपद पौड़ी गढ़वाल के ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक-आर्थिक विकास को सुदृढ़ बनाने के लिए सिफारिशों पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत की गई है। रिपोर्ट में जनपद के ग्रामीण क्षेत्रों से हो रहे पलायन को कम करने के लिए आयोग द्वारा सामाजिक-आर्थिक स्थिति का विस्तृत विश्लेषण कर इसे सुदृढ़ करने की सिफारिशें शामिल हैं।
2011 की जनगणना के अनुसार जिले की कुल जनसंख्या 6,86,527 है, जिसका 83.59 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में तथा 16.41 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों में निवास करती है। पिछली चार जनगणना के अनुसार इस जिले की जनसंख्या में लगातार गिरावट पायी गयी है तथा 2011 की जनगणना में भी (-1.51) की ऋणात्मक वृद्धि दर अंकित की गई है।
जनपद पौड़ी गढ़वाल की जनसंख्या में पिछले चार जनगणनाओं में गिरावट की प्रवृत्ति देखी गई है। 2011 की जनगणना में, कुल जनसंख्या वृद्धि -1.41 प्रतिशत ऋणात्मक रही थी। उपरोक्त तालिका 2.1 से पता चलता है कि नगरी क्षेत्रों की जनसंख्या (2001-2011) दशक में 25.40 प्रतिशत वृद्धि हुई है और ग्रामीण जनसंख्या में (-5.37) प्रतिशत की उल्लेखनीय कमी हुई है।
15 विकासखण्डों में से 12 विकासखण्डों के अन्र्तगत पिछले दशक (जनगणना 2011) में ऋणात्मक वृद्धि दर है। वित्तीय वर्ष 2016-17 के दौरान निरंतर मूल्य पर, राज्य की विकास दर 6.95 प्रतिशत थी, और जनपद पौड़ी गढ़वाल के लिए 6.96 प्रतिशत थी। राज्य का सकल घरेलू उत्पाद 1,95,606 करोड रूपये था और जिला पौड़ी गढ़वाल के लिए यह वित्तीय वर्ष 2016-17 के लिए वर्तमान मूल्य पर 8,283.56 करोड़ रूपये था। जनपद का जीडीपी, राज्य के जीडीपी में लगभग 4.23 प्रतिशत योगदान देता है। जनपद पौड़ी द्वारा राज्य जीडीपी में हरिद्वार, देहरादून, उधम सिंह नगर और नैनीताल के बाद पांचवे स्थान का योगदान दिया है। यद्यपि राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र में जनपद 10.17 प्रतिशत का भागीदारी है और पांचवा सबसे अधिक जनसंख्या वाला जनपद है, यह राज्य जीडीपी में केवल 4.23 प्रतिशत का महत्व रखता है। इसके अलावा, पौड़ी (ग्रामीण) के लिए एम0पी0सी0ई0 (मासिक प्रति व्यक्ति उपभोक्ता व्यय) 1294.87 रूपये है और पौड़ी (नगरीय) के लिए 2145.62 रूपये है, जो राज्य और राष्ट्रीय औसत से कम है। जनपद पौड़ी गढ़वाल की औद्योगिक रूपरेखा के अनुसार, एम0एस0एम0ई0 मंत्रालय के अन्तर्गत वर्ष 2016 तक पौड़ी में कुल 6272  पंजीकृत ईकाईयां है, जो लगभग 20,000 लोगों को स्थायी और अर्थ-स्थायी रूप से रोजगार प्रदान करते हैं। पौड़ी में लगभग 29.36 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे है, जो राज्य मे सबसे अधिक है, जबकि टिहरी गढ़वाल का न्यूनतम 10.15 प्रतिशत है। डी.ई.एस. पौड़ी द्वारा दिए गए आंकडों से पता चलता है कि बागवानी फसलों के तहत उपयोग में लाये जाने वाले क्षेत्रफल, पूरे रूप में बागवानी के कुल क्षेत्रफल वर्ष 2015-16 की तुलना में वर्ष 2016-17 में काफी कम हो गया है, जिससे जनपद में फलों का उत्पादन भी काफी घट गया है।
सिफारिशें
आंकडें दर्शाते हैं कि जिले के ग्रामीण क्षेत्रों से चिन्ताजनक पलायन हुआ है। 1212 ग्राम पंचायतों (2017-18) में से 1025 ग्राम पंचायतों से पलायन हुआ है। लगभग 52 प्रतिशत पलायन मुख्य रूप से आजीविकाध्रोजगार की कमी के कारण हुआ है। जिले से पलायन करने वालों की आयु वर्ग मुख्यतया 26 से 35 वर्ष है। लगभग 34 प्रतिशत लोगों ने  राज्य से बाहर पलायन किया है, जो कि अल्मोड़ा जिले के बाद सबसे अधिक है। आयोग द्वारा किए गए सर्वेक्षण के मुताबिक 2011 के बाद जिले में 186 गांवध्तोक गैर आबाद हुये हैं, जो कि 2011 के पश्चात गैर आबाद ग्रामांे का 25 प्रतिशत है। वहीं दूसरी तरफ जिले में 112 ग्रामध्तोकध्मजरे ऐसे हंै जिनकी जनसंख्या 2011 के पश्चात 50 प्रतिशत से अधिक कम हुयी है। पूरे राज्य में ऐेसे 565 ग्रामध्तोक है।
2001 से 2011 के बीच खिर्सू, दुगड्डा और थलीसैंण विकासखण्ड़ों की आबादी में वृद्धि हुई है, हालांकि अन्य विकास खण्ड़ों की आबादी घटी है या यह वृद्धि बहुत धीमी हुयी है।
सामान्य सिफारिशें
गांव की अर्थव्यस्थाध्विकास को वृद्वि देना-ग्राम स्तर पर आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए विशिष्ठ रणनीतियों को तैयार करने और कार्यान्वित करने की आवश्यकता है, इससे स्थानीय निवासियों के लिए अतिरिक्त आय उत्पन्न होगी, जिससे पलायन में कमी आयेगी तथा प्रवासियों में अपने गांव की तरफ लौटने का उत्साह रहेगा।  ग्रामों अथवा ग्रामों के क्लस्टर के स्तर पर एक जीवंत अर्थव्यवस्था ग्राम पंचायतध्ग्राम पंचायतों के समूह में सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए एक केंद्र के रूप में कार्य करेगी। सामान्य कमियों को सुधारने की कोशिश करने के बजाय प्रत्येक क्षेत्र की अद्वितीय ताकत पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।
कृषि एवं गैर-कृषि आय में बढावा देने की आवश्यकता-कृषि एवं गैर-कृषि आय को बढ़ावा देने की आवश्यकता है क्योंकि पांरपरिक कृषि आय एवं गैर-परंपरागत कृषि आय की अपेक्षा सेवा क्षेत्र से आय बढ़ी है।
ग्राम केन्द्रित योजना -वे ग्राम जिनकी भौगोलिक स्थिति, वातावरण की परिस्थितियां, भूमि उपयोगिता, सिचाई एवं पेयजल की उपलब्धता, पलायन का स्तर आदि समान हो उनकी क्लस्टर बनाकर विशेषज्ञों, रेखीय विभाग तथा स्थानीय लोगो की सलाह पर कार्य योजना तैयार की जाय।
बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता-पानी की कमी, पक्की सड़कंे, अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य आदि बुनियादी सुविधाएं हैं जिन्हें गावों तक पहुचाना है, प्रमुखतः उन गावों में जहाँ से अधिक पलायन हुआ है।
जलवायु परिवर्तन-जलवायु परिवर्तन चिंता का एक प्रमुख कारक है, खासकर पौड़ी जिले में जहाँ ग्रामीण क्षेत्रों का एक बड़ा हिस्सा उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में स्थित है। जलवायु परिवर्तन से कृषि अर्थव्यवस्था सबसे ज्यादा प्रभावित होती है।
कर्मचारियों और स्थानीय समुदायों का पुनः अभिविन्यास-सभी रेखीय विभागों के कर्मचारियों को फिर से प्रेरित और प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है ताकि वे उन ग्रामीण क्षेत्रों में केन्द्रित सामाजिक-आर्थिक विकास को बढावा दे सकें जो पलायन से प्रभावित हैं। अगले पांच से दस वर्षांे तक रेखीय विभागों का ध्यान ग्रामध्ग्राम पंचायत की अर्थव्यवस्था को सुधारने पर केन्द्रित होना चाहिए,कौशल विकास-स्थानीय अर्थव्यवस्था की जरूरतों के अनुसार कौशल विकास कार्यक्रमों को तैयार करना चाहिए जैंसे कि कृषि सम्बन्धी प्रोद्योगिकी में सुधार, गैर मौसमी खेती, खाद्य, फल प्रसंस्करण दुग्ध उद्योग आदि।
युगपितीकरण  ¼Convergence)  -सभी सरकारी कार्यक्रमों और योजनाओं का ध्यान गांवों की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने पर केंद्रित करना होगा। उन्हें जरूरतों के हिसाब से कार्यक्रमों का युगपतीकरण ¼Convergence)   करना होगा ताकि ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन पर अंकुश लगे।
महिलाओं की भूमिका पर ध्यान केंद्रित करना-सामाजिक-आर्थिक विकास में महिलाओं की भागीदारी पर ध्यान केन्द्रित करना होगा जिनसे उनकी कठिनाइयों में कमी आये। विकास केन्द्र-हाल ही में उत्तराखण्ड सरकार ने विकास केन्द्रांे (ग्रोथ सेन्टर) को बढ़ावा एवं सुुविधा प्रदान करने की प्रक्रिया शुरू की है। ग्राम्य विकास विभाग और विकास केन्द्रों को एक साथ मिलकर काम करना होगा।
जिला नीति, ग्रामीण अर्थव्यवस्वथा को बढाने के लिए रणनीति और दृष्टिकोण-जिला मजिस्ट्रेट और मुख्य विकास अधिकारी को जिले की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए मुख्य भूमिका निभाते हुए रणनीति तैयार कर विकास खण्ड एवं ग्राम पंचायत स्तर पर कार्य योजना बनाने पर ध्यान केन्द्रित करना होगा।
क्षेत्र वार सिफारिशें
ग्राम्य विकास-
ग्राम्य विकास विभाग द्वारा कई योजनाओंध्कार्यक्रमों के माध्यम से ग्रामों में विकास कार्य किया जा रहा है। साथ ही राज्य वन विभाग के अनुपालन में जे.आई.सी.ए और वाटरशेड निदेशालय वित्त परियोजना के माध्यम से विकास कार्य किया जा रहा है।
 आजीविका योजना के अन्तर्गत जनपद में 2350 स्वयं सहायता समूह का गठन किया गया है, जिनमें से सबसे अधिक 560 स्वयं सहायता समूह का गठन विकास खण्ड़ दुगड्डा में हुए हैं। जबकि विकासखण्ड़ नैनीडांडा में सबसे कम  9 स्वयं सहायता समूह गठित हुए हैं।
(क) उन विकासखण्ड़ों की ओर अधिक ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता है जिन विकासखण्ड़ों ने ग्रामीण विकास की योजनाओं में दूसरे विकासखण्ड़ों की अपेक्षा बहुत कम प्रगति हुई हो।
(ख) उन सभी विकासखण्ड़ों का ध्यान ग्रामीण आजीविका योजना की ओर किया जाना अपेक्षित होगा जिनकी प्रगति ग्रामीण आजीविका मिशन में कम है। आजीविका मिशन ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका उत्पन्न करवाने में अहम भूमिका निभा रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वयं सहायता समूह के अन्र्तगत बहुत कम मात्रा में ग्राम-संगठनों का गठन किया गया है यदि हैं भी तो सशक्त रूप से कार्य नहीं कर रहें हैं, जिन्हें मजबूत करने की अति आवश्यकता है, इस प्रकार पहाड़ी क्षेत्रों में हो रहे पलायन को रोका जा सकता है।
(ग) ग्राम पंचायत स्तर पर आजीविका पैदा करने के लिए प्रत्येक विकासखण्ड़वार विस्तृत कार्ययोजना तैयार की जाय, जिससे ग्रामवासियों को आय उत्पन्न करने हेतु आजीविका मिल सकें। इन योजनाओं के क्रियान्वयन में ग्राम्य विकास विभाग एवं अन्य रेखीय विभागों का सहयोग लिया जाय।
(घ) वर्तमान समय में विभाग में फील्ड़ स्टाफ की कमी है, जिस वजह से एक ग्राम विकास अधिकारी द्वारा वर्तमान में 35 से अधिक ग्राम पंचायतों का कार्यभार का निर्वहन किया जा रहा है, जिससे उनके द्वारा अपने कार्य का सही रूप से निर्वहन नहीं कर पाते है। अतः उक्त विषय का तुरन्त निस्तारण किया जाय।
कृषि-
जनपद पौड़ी के अन्तर्गत वर्ष 2013-14 में शुद्ध बोया गया क्षेत्रफल 64,824 हेक्टेयर से घटकर वर्ष 2015-16 में 62,097 हेक्टेयर हो गया है, जो कि एक से अधिक बार बोये गये क्षेत्रफल का एक तिहाई है। धान की फसल के लिए वर्ष 2013-14 में बोया गया क्षेत्रफल 13,923 हेक्टेयर, वर्ष 2015-16 में घटकर 12,517 हेक्टेयर हो गया है इसी प्रकार गेहंू के लिए 2013-14 में 22,431 हेक्टेयर से 2015-16 में घटकर 16,779 हेक्टेयर एवं मंडुआ के लिए 2013-14 में 19,798 हे0 से घटकर 2015-16 में 19,421 हे0 तथा दालों की फसलों के लिए 2013-14 में 13,923 हे0 से 2015-16 में 12,517 हो गया है जबकि तिलहन और आलू आदि की फसलों के लिए बोया गया क्षेत्रफल क्रमशः 53,000 हैक्टेयर तथा 62,000 हैक्टेयर पर स्थिर है।
विकासखण्ड़ थलीसैंण और खिर्सू में कृषकों द्वारा सब्जियों के उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है परन्तु जनपद के कई क्षेत्रों में कृषकों द्वारा अपनी कृषि भूमि को नेपाली मूल के किसानों को किराये पर दी जा रही हैं, परन्तु उत्पादन क्षमता इतनी मात्रा में नहीं है कि बड़ी मण्ड़ियों तक पहुंचाया जा सकें।
जनपद के अन्तर्गत कृषि क्षेत्र में बढ़ावा देने के लिए निम्नलिखित सिफारिशें प्रस्तुत की जाती हैं –
अ-  कृषक समूह को आलू सहित अन्य सब्जियों के वृहद उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया जाय तथा उनके उत्पादन के लिए, बाजार उपलब्धता में उनकी सहायता की जाय। थलीसैंण विकासखण्ड़ के अन्तर्गत सालौन ग्राम का उदाहरण लिया जा सकता है। सहकारी खेती तथा बाजार की उपलब्धता ही एकमात्र राह है।
ब-  कृषि विभाग द्वारा प्रत्येक विकासखण्ड में वर्तमान में चल रहे विपणन प्रक्रिया का अध्ययन करने के उपरान्त ठोस रणनीति तैयार करनी चाहिए, जिसके लिए विकासखण्डध्स्थानीय स्तर पर छोटी-छोटी ई-मंडियां स्थापित की जाऐं।
फल
जनपद में बागवानी के अन्तर्गत सेब, अखरोट, लीची, नाशपाती, अनार, माल्टा, संतरा, नींबू, आडू, आलूबुखारा, जामुन, खुमानी, नाशपाती इत्यादि फलों का उत्पादन किया जा रहा है। पौड़ी जनपद के अन्तर्गत वर्ष 2016-17 में 4047 हे0 क्षेत्रफल में बागवानी की जाती है। पिछले 10 वर्षों में सेब का उत्पादन क्षेत्र 1100 हे0 से घटकर 212 हे0 तक हो गया है।
अ-जनपद में बागवानी के क्षेत्रफल को बढाने की काफी अच्छी सम्भावनायें हैं। फलों की अच्छी मांग हेतु बाजार उपलब्ध है परन्तु इसके लिए उन्नत किस्मों की रोपण सामाग्री उपलब्ध कराना होगा।
ब-स्थानीय उद्यमियों के लिए फलों की नर्सरी स्थापित कर रोपण सामग्री उपलब्ध करवाना एक फायदेमंद आजीविका सिद्ध हो सकती है।
स-वर्तमान में (2016-17) में पूरे जनपद में मात्र 9 नर्सरियां है जो रोपण सामाग्री उपलब्ध करवाती हैं। विकासखण्ड़ कल्जीखाल, पाबौं, थलीसैंण, बीरौंखाल, द्वारीखाल, यमकेश्वर और पोखड़ा में कोई फल नर्सरी नहीं है। बाकी शेष में एक-एक तथा दुगड्डा में दो नर्सरियां है। इनकी संख्या काफी कम है, इन्हें और बढाए जाने की आवश्यकता है।
द-बड़ी मात्रा में फलों की सही व उन्नत प्रजातियों के उत्पादन पर ध्यान केेंद्रित करने की आवश्यकता है ताकि जिले के फल दिल्ली जैसे शहरों के बडें बाजारों को निर्यात किए जा सकें। राज्य के बागवानी विभाग में फील्ड़ स्टाफ की कमी है तथा विभाग को मजबूत बनाने के लिए सभी रिक्तियों को भरने की आवश्यकता है।
पशुपालन-
जनपद पौड़ी के अन्तर्गत गायों की संख्या वर्ष 2003 में 3,61,563 से घटकर 2015-16 में 3,00,081 हो गई है, और भैंसों की संख्या 70,115 से घटकर 2015-16 में 40,533 हो गई है। दूसरी तरफ देखें तो बकरियों की संख्या 2003 में 1,15,547 से बढ़कर 2015-16 में 1,78,404 हुई और मुर्गीपालन में 70,125 से बढ़कर 2015-16 में 83,556 हो गयी है।
इस क्षेत्र की मजबूती के लिए निम्नलिखित सिफारिशें उल्लेखित की जाती है रू-
अ- पशुपालन की गुणवत्ता को बढ़ावा दिये जाने की आवश्यकता है क्योंकि इसे कई परिवारों के आय की मुख्य स्रोत बनाया जा सकता है। जनपद को दूध उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ अन्य क्षेत्रों में दुग्ध विपणन करवाने का उद्देश्य भी रखा जाय। संकर प्रजाति के दुधारू पशुओं के पालन हेतु प्रोत्साहित किया जाए।
ब- ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर उद्योग जैसे पनीर, घी, मावा, मक्खन आदि दूध उत्पादों के प्रसंस्करण की बहुत अधिक सम्भावनायें हैं क्योंकि ग्राम स्तर पर ऐसे उद्यमी हैं जो पहले से ही इस प्रकार की गतिविधियों को कर रहें हंै। हालांकि इसे बढ़ावा दिये जाने की आवश्यकता है।
स- भले ही ग्रामीण स्तर पर कुछ दुग्ध केन्द्र हैं जो पौड़ी, श्रीनगर, कोटद्वार और सतपुली जैसे नगरों में दूध की आपूर्ति कर रहें हैं जो कि पर्याप्त नहीं हैं। जनपद के अन्य क्षेत्रों में भी इसी तरह की आर्थिक गतिविधियों की ओर ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता है।
द- बकरीपालन और मुर्गीपालन कई ग्राम पंचायतों में किया जा रहा है परन्तु इसे आजीविका के रूप में बढ़ावा दिये जाने की आवश्यकता है।
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग-
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने और आजीविका प्रदान करने के लिए जनपद में सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्योगों का विकास आवश्यक है। वर्तमान में मुख्य औद्योगिक क्षेत्र सिगड्डी-कोटद्वार में स्थित है जहां रेडीमेड वस्त्र, बुनाई, फर्नीचर और मरम्मत एवं सर्विंसिंग के बड़ी संख्या में सूक्ष्म और लघु इकाइयां हैं। वर्ष 2015-16 तक जनपद में कुल 342.54 करोड़ रूपये का निवेश कर 19,356 व्यक्तियों को रोजगार देते हुए 272 सूक्ष्म और लघु इकाइयां स्थापित की गई। जनपद में सूक्ष्म और लघु इकाइयों की संख्या तथा रोजगार उपलब्ध कराने के अवसरों में क्रमिक वृद्वि हुई है। गणनाएं बताती हैं कि ऐसी इकाइयों में एक करोड़ के निवेश करने के उपरान्त रोजगार दिये जाने की क्षमता 55 व्यक्ति है।
जनपद के ग्रामीण क्षेत्रों की सामाजिक-अर्थव्यवस्था को बदलने की एम.एस.एम.ई. क्षेत्र में उच्च क्षमता है। आकड़ें बताते हैं कि एक करोड़ के निवेश किये जाने पर 55 व्यक्तियों को रोजगार दिया जा रहा है जैसे कृषि आधारित, रेडीमेड वस्त्र, बुनाई, फर्नीचर और मरम्मत एवं सर्विंसिंग जैसे सूक्ष्म और लघु इकाइयों के माध्यम से अपेक्षाकृत बड़ी संख्या में बढ़ाया जा सकता है। जनपद के प्रत्येक विकासखण्ड़ में ऐसी इकाइयों हेतु सम्भावनाओं की तलाश कर सूक्ष्म और लघु उद्यमों को बढ़ावा दिया जाय
अ- सूक्ष्म और लघु इकाइयों के विकास को बढ़ावा देने लिए जिम्मेदार अधिकारियों को स्थानीय परिस्थितियों पर गहन विचार करते हुए विकासखण्ड़वार कार्ययोजना तैयार करने की आवश्यकता है।
ब- आकडों से स्पष्ट होता है कि जनपद के कई विकासखण्ड़ों में एम.एस.एम.ई. के तहत विकास की कमी या लगभग नगण्य है। इस प्रकार के विकासखण्ड़ों में सूक्ष्म और लघु इकाइयों के विस्तार के लिए विशेष ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता है।
स- जनपद में सूक्ष्म, लघु और कारीगर इकाइयों के विकास हेतु क्षमता विकास योजना को आवश्यकता के अनुरूप होना चाहिए।
द- उद्यमशीलता विकास कार्यक्रम, विशेष रूप से ऐसे विकासखण्ड़ोंध्ग्राम पंचायतों में आयोजन किये जाने चाहिए जहां ऐसी इकाइयों की कमी है।
पर्यटन-
जनपद पौड़ी के अन्तर्गत घने जंगल, रमणीक और मनमोहक पर्यटक स्थल, ऊंची-ऊंची सुन्दर चोटियों, पौराणिक मन्दिर, पुरातात्विक महत्व के स्थल समेत 26 प्रमुख पर्यटन स्थल शामिल हैं। वर्ष 2015-16 में 4,17,044 पर्यटकों द्वारा जनपद में भ्रमण किया गया है, जिनमें 21,162 विदेशी पर्यटक थे। यहां 9 पर्यटक अथिति घर, 242 होटल एवं लाॅज, 10 होम-स्टे हैं जो अधिकांश लैन्सड़ाॅन क्षेत्र में ही स्थित हैं।
अ- जनपद के अन्तर्गत एक जिला पर्यटन विकास योजना तैयार की जाय जिसमें विकास खण्ड़वार विशेष स्थलों की पहचान करवाये। यह आजीविका के साधनों में अपनी पहंुच बना चुका है परन्तु इसमें बढ़ावा दिये जाने हेतु क्षमता विकास कार्यक्रमों में भी अभिसरण होने की जरूरत है।
ब- हाल ही में राज्य सरकार द्वारा एक महत्वाकांक्षी योजना होम-स्टे शुरू की गई है जो जनपद के लैन्सड़ाॅन क्षेत्र में केन्द्रित है इसे आसानी से जनपद के अन्य हिस्सों तक बढ़ाया जा सकता है।
चयनित ग्रामों के सामाजिक-आर्थिक विकास को सुदृढ करने हेतु सुझाव-
यह सुझाव दिया जाता है कि इन गांवो के सामाजिक-आर्थिक विकास को सुदृढ़ करने पर ध्यान केंद्रित किया जाए ताकि आगे होने वाले पलायन को कम किया जा सके।
इस पहल का मुख्य उद्देश्य होगारू-
 स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना।
 आर्कषक परिदृश्य और स्थानीय संसाधनों का लाभ उठाने के लिए  Entrepreneurs  को सुविधायें प्रदान करना।
स्थानीय नागरिकों के लिए आजीविका के अवसर प्रदान करना।
 विभिन्न सरकारी विभागीय तथा बाहरी सहायता प्राप्त परियोजनाओं का युगपतिकरण कर आजीविका के अवसर प्रदान करना है।