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योजनाओं के निर्माण में कोताही बढ़ा रही है मुसीबत

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अल्मोड़ा। हर साल किल्लत से जूझने के बाद भी पेयजल योजनाओं का नियोजित निर्माण न होने से यह समस्या विकराल रूप धारण करती जा रही है। ऐसे में शासन प्रशासन को जहां लंबित पड़ी पेयजल योजनाओं के निर्माण में तेजी लानी चाहिए। वहीं प्राकृतिक पेयजल स्रोतों को रिचार्ज करने के भी प्रयास करने चाहिए।

पेयजल योजनाओं के निर्माण में बरती जा रही कोताही का ही परिणाम है कि तमाम योजनाओं के बाद भी आज लोगों के हलक सूखे हुए हैं। पेयजल की बर्बादी को रोकने के लिए विभाग द्वारा किए जा रहे प्रयास महज हवाई साबित हो रहे हैं। पेयजल महकमा अगर अपनी कार्यप्रणाली में जरा सा भी परिवर्तन करें तो इस समस्या से हमेशा के लिए निजात पाई जा सकती है।

पिछले कई सालों से पेयजल किल्लत से जूझ रहे अल्मोड़ा नगर की प्यास बुझाने के लिए कोसी नदी में बैराज का निर्माण तो किया गया। लेकिन अभी भी तमाम समस्याएं लोगों की प्यास बुझाने के आड़े आ रही हैं। लेकिन संबंधित महकमा पेयजल योजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी नहीं ला पा रहा है।

अल्मोड़ा शहर की लगभग अस्सी हजार से अधिक की जनता को पेयजल मुहैया कराने के लिए कुछ सालों पहले अल्मोड़ा की कोसी नदी में बैराज का निर्माण किया। लोगों को उम्मीद थी कि बैराज निर्माण के बाद पेयजल समस्या दूर हो जाएगी। लेकिन बरसात के मौसम में सिल्ट की समस्या के कारण पेयजल समस्या फिर विकराल रूप धारण कर लेती है। जिला मुख्यालय के अलावा जागेश्वर और सल्ट विधानसभा में भी तमाम योजनाओं के बाद भी लोगों पानी की कुछ बूदों के लिए तरस रहे हैं। लेकिन इन सब के बाद भी विभाग की कछुवा चाल लोगों को राहत देने का काम नहीं कर पा रही है।

कोसी नदी में सिल्ट की समस्या को दूर करने के लिए यहां इंटकवेल के निर्माण की जरूरत महसूस की गई। जिसके बाद इंटकवेल के लिए धनराशि स्वीकृत भी की गई। लेकिन अभी तक संबंधित महकमा इसके निर्माण का कार्य पूरा नहीं कर पाया है। विभाग ने अगर जल्द इंटकवेल के निर्माण कार्य पूरा नहीं किया तो इस बार भी गर्मियों के मौसम में यहां के लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ेगा।

नदियों के संरक्षण को करने होंगे प्रयास
अल्मोड़ा। नगर के लोगों को पेयजल मुहैया कराने वाली जीवनदायिनी कोसी के अस्तित्व को लगातार खतरा पैदा हो रहा है। वर्ष 1982 की बात करें तो इस नदी का न्यूनतम डिस्चार्ज 790 लीटर प्रति सेकेंड था। जो वर्तमान में महज 50 लीटर प्रति सेकेंड रह गया है। इसी तरह जिले की रामगंगा, नौरड़, विनोद और सुयाल नदियों समेत अन्य छोटी बड़ी नदियों का जल स्तर भी लगातार कम हो रहा है। ऐसे में अगर इन नदियों के संरक्षण के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए तो भविष्य में हालात और गंभीर हो सकते हैं।

जिले में अधूरी पड़ी बड़ी पेयजल योजनाएं
= मानिला बरकिंडा पेयजल योजना
= शशीखाल कोटेश्वर पेयजल योजना
= हंसीढूंगा -गुजडूकोट पेयजल योजना
= सरयू बेलख पेयजल पंपिंग योजना
= पनार पेयजल योजना

जल संरक्षण मद में सिंचाई विभाग द्वारा ल्वेशाल, पच्चीसी, चनौदा, ग्वालाकोट, कोसी और क्वारब के पास जलाशय बनाने के लिए डीपीआर बनाई जा रही है। जबकि इसके अलावा काकड़ीघाट, भुजान और छड़ा में भी जलायशों का निर्माण प्रस्तावित है। इन स्थानों पर जलाशय बनने के बाद भूमिगत जल भंडार में वृद्धि होगी। जिससे आसपास सिंचाई की सुविधा भी मिल सकेगी।
विनोद सिंह अधिशासी अभियंता, सिंचाई खंड